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दूसरे विश्व युद्ध का गवाह एक गांव, खंडहरों में कैद है सुनहरा अतीत, जहां लोगों का जाना मना है

दूसरे विश्व युद्ध की एक ऐसी कहानी, जो आज भी जिंदा है, लेकिन इंसानों के बिना. खंडहरों, सन्नाटे और इतिहास के बीच छिपे इस भूतिया गांव की कहानी जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही भावुक भी.

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प्रकृति की मार झेलते इम्बर गांव के पुराने घर (Photo: ITG)
प्रकृति की मार झेलते इम्बर गांव के पुराने घर (Photo: ITG)

कल्पना कीजिए एक ऐसे गांव की जहां की गलियों में 82 साल से किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी, जहां के घरों में आठ दशकों से चूल्हा नहीं जला और जहां का वक्त साल 1943 में ही कहीं ठहर गया है. हम बात कर रहे हैं इंग्लैंड के विल्टशायर में स्थित इम्बर (Imber) गांव की. इसे दुनिया 'भूतिया गांव' के नाम से जानती है, लेकिन इसके पीछे की कहानी डरावनी फिल्मों से कहीं ज्यादा दिलचस्प और भावुक है. तो चलिए जानते हैं कि आखिर वो क्या मजबूरी थी कि एक पूरा का पूरा गांव रातों-रात खाली हो गया और आज वहां इंसान नहीं, बल्कि सन्नाटा और खंडहर राज करते हैं.

दरअसल, इस गांव के वीरान होने की कहानी दूसरे विश्व युद्ध से जुड़ी है. साल 1943 में जब नाजी जर्मनी के खिलाफ जंग तेज हुई, तो ब्रिटिश सेना को ट्रेनिंग के लिए एक सुरक्षित जगह की जरूरत थी. तब इम्बर गांव के लोगों को आदेश दिया गया कि वे अपनी जमीन और घर छोड़कर चले जाएं. गांव वालों को लगा था कि जंग खत्म होते ही वे लौट आएंगे, लेकिन अफसोस की बात यह है कि 82 साल बीत जाने के बाद भी एक भी ग्रामीण वापस नहीं लौट सका. हकीकत तो यह है कि आज भी यह पूरा इलाका ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय के कब्जे में है, जिस वजह से इसे आम लोगों के लिए पूरी तरह बंद रखा जाता है.

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जहां खंडहरों के बीच सांस लेता है इतिहास और सेना करती है पहरेदारी

आज इम्बर गांव की शक्ल पूरी तरह बदल चुकी है. प्रकृति की मार और सालों की वीरानी ने इसे एक 'भूतिया' लुक दे दिया है. पुराने घरों की छतें गिर चुकी हैं, दीवारों पर काई जम गई है और खिड़कियों के नाम पर सिर्फ खाली फ्रेम बचे हैं. दिलचस्प बात यह है कि सेना ने यहां ट्रेनिंग के लिए कुछ आधुनिक इमारतें भी बनाई हैं, जिनमें न खिड़कियां हैं और न ही कोई रंग-रोगन. चूंकि यह क्षेत्र सैन्य अभ्यास के लिए इस्तेमाल होता है, लिहाजा यहां की इमारतों पर गोलियों और बमबारी के निशान भी देखे जा सकते हैं. लेकिन इन सबके बीच गांव का 'सेंट जिल्स चर्च' और पुराना पब आज भी मजबूती से खड़ा है. यह चर्च ही इस वीरान गांव की आखिरी धड़कन है.

77 साल के नील स्केल्टन, जो इस चर्च की देखभाल करते हैं, इनका मानना है कि इम्बर सिर्फ खंडहरों का ढेर नहीं है. यह न केवल ऐतिहासिक है बल्कि वन्य जीवों के लिए भी एक सुरक्षित पनाहगाह बन चुका है, क्योंकि यहां इंसानी दखल लगभग शून्य है. नील के मुताबिक, साल में सिर्फ 12 दिन ऐसे होते हैं जब सेना इस गांव के दरवाजे आम जनता के लिए खोलती है. देखा जाए तो इस बार भी 29 दिसंबर से 1 जनवरी 2026 तक लोग इस रहस्यमयी जगह को करीब से देख सकते हैं. हैरान करने वाली बात यह है कि इस 'भूतिया गांव' को देखने के लिए इतनी भीड़ उमड़ती है कि चर्च में बिकने वाले सामानों और दान से ही हर साल लगभग 15,000 से 20,000 पाउंड जुटा लिए जाते हैं, जो इसके रखरखाव में काम आते हैं

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कुल मिलाकर कहें तो इम्बर गांव एक ऐसी जगह है जहां इतिहास सेना के साये में कैद है. यह गांव उन ग्रामीणों की कुर्बानी की याद दिलाता है जिन्होंने देश के लिए अपने घर छोड़ दिए और फिर कभी वापस नहीं आ पाए. भले ही इसे 'हॉरर विलेज' कहा जाए, लेकिन यहां आने वाले सैलानियों के लिए यह किसी टाइम मशीन से कम नहीं है, जो उन्हें सीधे 1943 के उस दौर में ले जाता है जहां वक्त हमेशा के लिए थम गया था.

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