राजस्थान का नाम सुनते ही आंखों के सामने सुनहरे रेगिस्तान और ऊंचे महलों की तस्वीर आ जाती है, लेकिन इसी मरुधरा पर एक ऐसा शहर भी है जिसे दुनिया ऊंटों का देश कहती है. हम बात कर रहे हैं बीकानेर की, जो उत्तर-पश्चिमी राजस्थान में बसा एक ऐसा जीवंत शहर है जहां इतिहास और रोमांच का अद्भुत संगम मिलता है. यहां की रेगिस्तानी संस्कृति इतनी गहरी और समृद्ध है कि ऊंट यहां के लोगों की पहचान और गौरव का हिस्सा बन चुके हैं.
रेतीले टीलों पर शांत ऊंट सफारी से लेकर यहां की शाही वास्तुकला तक, बीकानेर हर सैलानी के लिए एक कभी न भूलने वाला अनुभव लेकर आता है. यहां सिर्फ पर्यटन नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी जीवित देखा जा सकता है. आखिर बीकानेर को यह खास नाम कैसे मिला और इसे इतना विशेष क्यों माना जाता है? चलिए जानते हैं…
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बीकानेर को ऊंटों का शहर यूं ही नहीं कहा जाता, इसके पीछे यहां की विशाल ऊंट आबादी और दुनिया भर में मशहूर ऊंट प्रजनन केंद्र का बड़ा हाथ है. यहां ऊंट सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि बीकानेर की संस्कृति और इसकी अर्थव्यवस्था की असली धड़कन हैं. सदियों से इन 'रेगिस्तान के जहाजों' ने न सिर्फ व्यापारिक काफिलों को मंजिल तक पहुंचाया है, बल्कि युद्ध के मैदान में भी अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया है. आज भी यहां का राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र इनके संरक्षण और महत्व को पूरी दुनिया के सामने मजबूती से रख रहा है. थार के तपते रेगिस्तान और मुश्किल हालातों में ऊंट आज भी सहनशीलता की सबसे बड़ी मिसाल हैं, जो बहुत कम पानी पिए मीलों का सफर तय कर लेते हैं.
विरासत और अजूबों से भरा है यह शहर
बीकानेर की यात्रा तब तक अधूरी है जब तक आप यहां के ऐतिहासिक स्थलों को करीब से न देख लें. यहां का जूनागढ़ किला अपनी अनोखी बनावट के लिए मशहूर है क्योंकि यह पहाड़ी के बजाय मैदानी इलाके में बना है. इसकी बारीक नक्काशी इतनी खूबसूरत है कि इसे देखकर आप दंग रह जाएंगे. वहीं बीकानेर से कुछ दूरी पर देशनोक में करणी माता का मंदिर है, जिसे दुनिया 'चूहों वाले मंदिर' के नाम से जानती है. यहां हजारों चूहे भक्तों के साथ रहते हैं और उन्हें बेहद पवित्र माना जाता है. इसके अलावा लालगढ़ महल और गजनेर झील जैसी जगहें सुकून और राजसी ठाठ-बाठ का अहसास कराती हैं, जो पर्यटकों को पुराने दौर की रईसी में ले जाती हैं.
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अगर आप भी बीकानेर की इन रंगीली गलियों और रेतीले टीलों को करीब से देखना चाहते हैं, तो अक्टूबर से मार्च के बीच यहां आना सबसे बेस्ट रहेगा. दरअसल, गर्मियों में यहां का पारा 45 डिग्री के पार चला जाता है, जो आपकी ट्रिप का मजा किरकिरा कर सकता है. वहीं, सर्दियों की गुलाबी ठंड में ऊंट की सवारी करना और रेगिस्तान की खामोशी के बीच यहां के लोक संगीत में डूब जाना, अपने आप में एक जादुई अहसास देता है. ढलते सूरज की रोशनी में जब रेगिस्तान सुनहरा होने लगता है, तो बीकानेर की खूबसूरती दोगुनी हो जाती है.
कैसे पहुंचें बीकानेर?
बीकानेर पहुंचना बेहद आसान है क्योंकि यह शहर सड़क, रेल और हवाई मार्ग से देश के प्रमुख हिस्सों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. दिल्ली या जयपुर जैसे बड़े शहरों से आप बस, ट्रेन या अपनी गाड़ी के जरिए यहां आसानी से पहुंच सकते हैं. याद रखिये, बीकानेर की यह यात्रा सिर्फ एक आम रेगिस्तानी सैर नहीं है, बल्कि यहां का हर कोना आपको इतिहास की किसी न किसी बड़ी गाथा से रूबरू कराएगा.