भारतीय व्यंजनों में कचौड़ी (Kachori) एक ऐसा लोकप्रिय स्नैक है, जिसका नाम सुनते ही स्वाद और खुशबू मन में उतर जाती है. यह उत्तर भारत से लेकर राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल तक अलग-अलग रूपों और स्वादों में बनाई जाती है. गरमा-गरम कचौड़ी का मजा नाश्ते में हो या शाम की चाय के साथ, हर उम्र के लोगों को पसंद आता है.
कचौड़ी की उत्पत्ति भारत में ही हुई मानी जाती है. कहा जाता है कि यह व्यंजन मौर्य काल से ही खाया जाता रहा है. पुराने समय में इसे गेहूं के आटे में दाल या मसाले भरकर तलकर तैयार किया जाता था. धीरे-धीरे इसमें क्षेत्रीय स्वाद और प्रयोग जुड़ते गए और आज यह अनेक प्रकार की मिलती है.
राजस्थान की प्याज कचौरी- इसमें मसालेदार प्याज का भरावन होता है, जो खासकर जोधपुर और जयपुर की पहचान है.
मूंग दाल कचौड़ी- उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में प्रचलित, इसमें भीगी और मसालेदार मूंग दाल का भरावन किया जाता है.
खस्ता कचौड़ी- बेहद कुरकुरी, जिसे आलू की सब्जी या चटनी के साथ परोसा जाता है.
बंगाली राधा बल्लभी- बंगाल में बनाई जाने वाली नरम और फूली हुई कचौड़ी, जिसे आलू-दुम या छोले के साथ खाया जाता है.
मावा कचौड़ी- मीठा रूप, जिसमें मावा और मेवे का भरावन होता है, खासकर राजस्थान में मिठाई की तरह लोकप्रिय.
कचौड़ी बनाने के लिए सबसे पहले गेहूं या मैदे के आटे में घी डालकर नरम आटा गूंथा जाता है. अलग से दाल, प्याज या मावा का मसालेदार भरावन तैयार किया जाता है. छोटी-छोटी लोइयों में भरावन भरकर गोल आकार दिया जाता है और धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तला जाता है.
कचौड़ी का असली मजा तब आता है जब इसे गरमागरम आलू की सब्जी, हरी-मीठी चटनी या दही के साथ खाया जाए. कई जगह इसे छोले, कढ़ी या कचौरी-चाट के रूप में भी परोसा जाता है.