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खत्म हो जाएंगे वेब ब्राउजर्स, अब ये टेक्नोलॉजी लेगी इनकी जगह, Chrome का क्या होगा?

Agentic Browser: गूगल क्रोम की बादशाहत खत्म होने वाली है? दरअसल एजेंटिक ब्राउजर इन दिनों रफ्तार पकड़ रहे हैं. लेकिन अब भी ये शुरुआती दौर में है. इसलिए जानना जरूरी है कि ये एजेंटिक ब्राउजर क्या कर सकते हैं.

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ब्राउजिंग का फ्यूचर हैं एजेंटिक ब्राउजर्स (Photo: ITG)
ब्राउजिंग का फ्यूचर हैं एजेंटिक ब्राउजर्स (Photo: ITG)

जब इंटरनेट का पहला ग्राफिकल ब्राउज़र Mosaic आया था, तब लोगों ने सोचा था कि अब इंटरनेट पढ़ना-लिखना जैसा ही आसान हो जाएगा. फिर Netscape और Internet Explorer आए, बाद में Google Chrome ने वेब-ब्राउज़िंग को तेज, सिंपल और काफी भरोसेमंद बना दिया. 

ब्राउज़र का काम तब सिर्फ पेज दिखाना था यूज़र ने क्लिक किया, लिंक खोला, फॉर्म भरा. पर आज वही ब्राउज़र बदल रहे हैं. अब वे केवल साइट नहीं दिखाएंगे वे आपकी तरफ से काम भी करेंगे. 

इन्हें हम कहते हैं Agentic Web Browsers या एजेंटिक ब्राउज़र्स. OpenAI, Google और कई स्टार्टअप इसी दिशा में काम कर रहे हैं, और मेरा मानना है एजेंटिक ब्राउज़र भविष्य हैं.

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पहले ब्राउज़र में यूज़र-कंट्रोल पूरा था. आप खुद सर्च करते थे, कॉपी-पेस्ट करते थे, ऑनलाइन फॉर्म भरते थे. पर अब हम दिन भर छोटे-छोटे रूटीन टास्क में फंस जाते हैं टिकट बुक करना, रिज्यूमे भेजना, प्रोडक्ट रिसर्च कर रिपोर्ट बनाना. 

ख़ुद से आपका काम करेंगे एजेंटिक ब्राउजर्स

एजेंटिक ब्राउज़र यही काम आपके लिए कर देंगे. वे आपकी इंटेंट समझेंगे, साइटों पर जाकर जानकारी इकट्ठा करेंगे, फॉर्म भरकर सबमिट कर सकते हैं, और रिजल्ट वापस लाकर समरी दे देंगे. 

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इस टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा वादा यही है कि रोजमर्रा के काम ऑटोमेटेड होंगे और हमारा टाइम बचेगा. DigitalOcean और Palo Alto जैसे टेक-रिसोर्स इसे साफ तौर पर डिफाइन कर चुके हैं एजेंटिक ब्राउज़र वे ब्राउज़र हैं जो यूज़र की इरादा लेकर खुद से एक्शन कर सकते हैं.

अब बड़ी कंपनियां भी इस राह पर आ चुकी हैं. OpenAI ने ChatGPT-बेस्ड ब्राउज़र Atlas पेश किया है, जिसमें Agent मोड है यह ब्राउज़र वैसा ही काम करता है जो हमने ऊपर बताया. 

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Atlas वेब पर सर्च करके, फॉर्म भरकर, शॉपिंग करके और ई-मेल ड्राफ्ट करके आपकी मदद कर सकता है. यह बदलाव केवल एक नया फीचर नहीं. यह ब्राउज़र मॉडल को “सुपर-असिस्टेंट” बनाने का स्टेप है. OpenAI का गोल यह है कि ChatGPT को सिर्फ चैट टूल न मानकर ब्राउज़र के साथ जोड़कर हर दिन के कामों में उसका यूज बढ़ाया जाए.

Google भी पीछे नहीं है. Chrome में Gemini के साथ जो इंटीग्रेशन आ रहा है, वह ब्राउज़िंग के एक्सपीरियंस को और एजेंटिक बनाने वाली दिशा में है. Chrome अब साइट-कंटेक्स्ट को समझकर रियल-टाइम हेल्प देगा वीडियो समरी, टैब्स में हेल्प, और बगल में AI पैनल जो आपकी मदद करता रहेगा. 

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जब मार्केट-लीडर Chrome ही AI-साथ ब्राउज़िंग को बढ़ावा दे रहा है, तो इसका मतलब साफ है बड़े पैमाने पर बदलाव आने वाला है. और Chrome का मार्केट-शेयर भी देखते हैं दुनिया में Chrome का हिस्सा करीब 70% से ऊपर है, यानी बदलाव का असर अरबों यूज़र्स पर होगा.

स्टार्टअप्स भी इस फील्ड में आगे बढ़ रहे हैं. Perplexity का Comet ब्राउज़र यूज़र-फ्रेंडली एजेंट देने की कोशिश कर रहा है यह रिसर्च, ई-मेल ऑर्गनाइजेशन और ऑटो-टास्क के लिए बनाया गया ब्राउज़र-ऐप है. छोटे प्लेयर्स अक्सर फास्ट इनोवेशन करते हैं और यूज़र-फीडबैक से तेजी से बदलते हैं. यही वजह है कि इंडस्ट्री में बहुत तेजी से एक्सपेरिमेंट और नए फीचर आ रहे हैं.

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हां, कंसर्न्स भी हैं और वे सिरे से नजरअंदाज नहीं किए जा सकते. एजेंटिक ब्राउज़र को जब पावर मिलेगा कि वह आपकी तरफ से क्लिक करे, फॉर्म भरे या शॉपिंग करे, तो सिक्योरिटी और प्राइवेसी के सवाल उठेंगे. 

कुछ रिपोर्ट्स और रिसर्च ने भी वल्नरेबिलिटीज दिखाई हैं Perplexity के Comet में प्रॉम्प्ट-इंजेक्शन जैसा एक रिस्क पाया गया, जिससे एजेंट को गलत इंस्ट्रक्शन देने की संभावना रही. इसका मतलब यह है कि जब ब्राउज़र ऑटोमैटिकली काम करेगा, तो हमें नए सिक्योरिटी मॉडल और रूल्स चाहिए होंगे, वरना हम गलत एक्शंस के शिकार भी बन सकते हैं.

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फायदे साफ हैं. एजेंटिक ब्राउज़र से प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी. रिसर्चर्स, जर्नलिस्ट्स, मार्केटिंग प्रोफेशनल्स, और छोटे बिजनेस वाले रोजाना के रूटीन टास्क पर कम समय लगाएंगे. 

उदाहरण के लिए रिपोर्ट पूछिए एजेंट आपके लिए वेब पर रिसर्च करेगा, सोर्सेज का सार निकालेगा और प्राइमरी ड्राफ्ट दे देगा. यह काम आज घंटों और दिनों लग सकता था, अब मिनटों में संभव होगा. 

OpenAI और ChatGPT जैसे टूल्स की पॉपुलैरिटी भी इस बदलाव को पुश कर रही है ChatGPT के लाखों-करोड़ों यूज़र्स यह दिखाते हैं कि लोग AI हेल्प चाहते हैं और उसे अपनाते भी हैं. पर यह पूरी तरह से स्मूद बदलाव नहीं होगा. टेक, पॉलिसी और रूल्स सबको साथ चलना होगा. 

पहला, ब्राउज़र-लेवल पर अच्छे कंट्रोल और ट्रांसपेरेंसी जरूरी है यूज़र को पता होना चाहिए कि एजेंट ने क्या किया, किस साइट पर क्या एक्शन हुआ, और किस डेटा का यूज हुआ. 

दूसरा, कंपनियों को साफ तौर पर बताना होगा कि वे डेटा कैसे स्टोर और शेयर कर रही हैं. 

तीसरा, सिक्योरिटी रूल्स होने चाहिए ताकि मालिशियस साइट्स एजेंट को गलत सिग्नल न दे सकें. हाल ही के रिसर्च ने यही पॉइंट हाईलाइट किया है कि एजेंटिक AI में प्रॉम्प्ट-इंजेक्शन जैसे नए अटैक्स होंगे इसलिए ब्राउज़र-सिक्योरिटी का नया चैप्टर लिखना होगा.

दूसरा बड़ा सवाल है ऑथोरिटी और ट्रस्ट. अगर ब्राउज़र आपकी तरफ से काम करेगा, तो गलती किसी एक व्यक्ति की नहीं रहेगी. जिम्मेदारी ब्राउज़र-डेवलपर और सर्विस-प्रोवाइडर की बनती है. इसलिए रेगुलेटर्स को भी सोचना होगा कि एजेंटिक एक्शन की अकाउंटेबिलिटी किसकी होगी. यही वजह है कि एथिक्स, लीगल फ्रेमवर्क और टेक्निकल गारंटी साथ में हों तभी यह नई ब्राउज़िंग यूनिवर्स-ली एक्सेप्टेबल बनेगी.

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तो क्या एजेंटिक ब्राउज़र भविष्य हैं? मेरे जवाब में साफ हां है. जिस तरह ब्राउज़र ने टेक्स्ट-वेब से मल्टीमीडिया और फिर वेब-एप्लिकेशन तक का सफर तय किया, अब अगला सफर है वेब जो हमारे लिए काम करे. OpenAI, Google और नए स्टार्टअप्स के कदम देख कर यह साफ है कि यह बदलाव हो रहा है और तेजी से हो रहा है. पर इसे सेफ, ट्रांसपेरेंट और कंज्यूमर-फ्रेंडली बनाना हम सबकी जिम्मेदारी होगी.

अंत में, हर बड़ी टेक्नोलॉजी ने फायदे और चैलेंज दिए हैं. Mosaic ने हमें वेब दिया, Chrome ने उसे तेज और भरोसेमंद बनाया, और अब एजेंटिक ब्राउज़र हमारी लाइफ के छोटे-छोटे काम हमसे बेहतर तरीके से संभालने की राह पर हैं. अगर हम रूल्स और सिक्योरिटी को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ें, तो अगला ब्राउज़िंग-एरा हमारे टाइम और अटेंशन को फिर से आजाद कर सकता है और यही एजेंटिक वेब ब्राउज़र का असली वादा है.

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