दुनिया में Strait of Hormuz को आमतौर पर तेल की लाइफलाइन कहा जाता है. हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह समुद्री रास्ता सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि दुनिया के इंटरनेट का भी एक अहम डिजिटल कॉरिडोर है.
इस इलाके में और तनाव बढ़ता है या जंग जैसी स्थिति बनती है, तो उसका असर सिर्फ तेल की कीमतों पर ही नहीं बल्कि इंटरनेट, क्लाउड सर्विस और ग्लोबल डेटा ट्रैफिक पर भी पड़ सकता है.
सिर्फ तेल नहीं, इंटरनेट का लाइफलाइन Hormuz
दरअसल, समुद्र के नीचे बिछे हजारों किलोमीटर लंबे फाइबर-ऑप्टिक केबल ही दुनिया के इंटरनेट की असली रीढ़ हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक दुनिया के लगभग 95 से 99 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक इन्हीं अंडरसी केबल्स के जरिए चलता है. इनमें ई-मेल, बैंकिंग ट्रांजैक्शन, क्लाउड डेटा और सरकारी कम्युनिकेशन तक सब कुछ शामिल होता है.
यानी अगर इन केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो इंटरनेट स्लो होना, वेबसाइट्स का डाउन होना या क्लाउड सर्विस में दिक्कत आना जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं.
समुद्र के नीचे छिपी इंटरनेट की दुनिया
आज दुनिया में 400 से ज्यादा बड़े सबमरीन इंटरनेट केबल नेटवर्क मौजूद हैं जो महाद्वीपों को आपस में जोड़ते हैं. ये केबल समुद्र की सतह से कई किलोमीटर नीचे बिछे होते हैं और लाइट की स्पीड के करीब डेटा ट्रांसफर करते हैं.
मिडिल ईस्ट और एशिया को यूरोप से जोड़ने वाले कई महत्वपूर्ण केबल नेटवर्क पर्शियन गल्फ और उसके आसपास के इलाकों से गुजरते हैं. इनमें Gulf Bridge International, FALCON, Europe India Gateway और I-ME-WE जैसे बड़े नेटवर्क शामिल हैं जो एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ते हैं.
इन्हीं समुद्री रास्तों के ऊपर से दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग यानी Strait of Hormuz गुजरता है. यही वजह है कि इसे अब सिर्फ ऊर्जा ही नहीं बल्कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का भी चोकपॉइंट माना जा रहा है.
क्या भारत में हो सकता है इंटरनेट ब्लैकआउट?
दुनिया भर के कई मेजर टेलीकॉम प्रोवाइडर्स के लिए Hormuz चेकप्वाइंट है. लेकिन भारतीय टेलीकॉम कंपनी जैसे भारती एयरटेल का कहना है कि वो उस पैसेज से अपने केबल्स को ऑपरेट नहीं करते हैं. भारत का इंटरनैशनल डेटा ट्रैफिक मुख्य रूप से Red Sea और Gulf of Aden से गुजरता है.
टेक एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत से यूरोप या अमेरिका जाने वाले कई डेटा रूट मिडिल ईस्ट से होकर गुजरते हैं. रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत के वेस्टबाउंड इंटरनेट ट्रैफिक का करीब एक-तिहाई हिस्सा इस क्षेत्र से होकर गुजरता है.
अगर किसी कारण से इस इलाके में समुद्री गतिविधियां रुकती हैं, केबल डैमेज हो जाते हैं या डेटा रूट ब्लॉक हो जाते हैं, तो भारत में भी इंटरनेट स्पीड और इंटरनेशनल कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है. हालांकि पूरी तरह से ब्लैकआउट या इंटरनेट शटडाउन इस वजह से भारत में नहीं हो सकता है.
पहले भी हो चुका है इंटरनेट पर असर
हाल ही में रेड सी इलाके में अंडरसी केबल कटने की घटना सामने आई थी. उस समय एशिया और मिडिल ईस्ट के कई देशों में इंटरनेट कनेक्शन प्रभावित हुए थे और क्लाउड सेवाओं की स्पीड भी कम हो गई थी.
बड़ी टेक कंपनियों को तब अपने डेटा ट्रैफिक को दूसरे रास्तों से रीरूट करना पड़ा था, जिससे नेटवर्क लेटेंसी बढ़ गई थी और कई ऑनलाइन सेवाएं धीमी हो गई थीं.
टेक कंपनियों के लिए बढ़ता खतरा
मिडिल ईस्ट में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी टेक कंपनियों ने भारी निवेश किया है. Amazon, Google और Microsoft जैसी कंपनियां यहां डेटा सेंटर और AI इंफ्रास्ट्रक्चर बना रही हैं. लेकिन इन डेटा सेंटर्स को दुनिया से जोड़ने वाले कई केबल इसी क्षेत्र से होकर गुजरते हैं.
ऐसे में अगर Strait of Hormuz जैसे रणनीतिक इलाके में सैन्य तनाव बढ़ता है, तो सिर्फ जहाजों या तेल सप्लाई पर ही नहीं बल्कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी खतरा बढ़ सकता है.
क्यों कहा जाता है डिजिटल चोकपॉइंट
विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र के नीचे बिछे केबल बेहद संवेदनशील होते हैं. कई बार जहाज का एंकर, समुद्री गतिविधियां या भू-राजनीतिक तनाव भी इन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं.
अगर किसी स्ट्रैटिजिजक समुद्री रास्ते में केबल कट जाते हैं तो डेटा ट्रैफिक को दूसरे रूट पर भेजना पड़ता है, जिससे नेटवर्क स्लो हो जाता है और कई सेवाओं में दिक्कत आने लगती है.
यही वजह है कि अब दुनिया में Strait of Hormuz को सिर्फ तेल का नहीं बल्कि इंटरनेट का भी अहम चेकप्वाइंट माना जा रहा है.
सिर्फ तेल नहीं, इंटरनेट भी दांव पर
दुनिया जब भी Hormuz की खबरें देखती है तो ज्यादातर चर्चा तेल और शिपिंग पर होती है. लेकिन असलियत यह है कि समुद्र के नीचे छिपे केबल आज वैश्विक डिजिटल इकॉनमी की असली लाइफलाइन बन चुके हैं.