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जापान के ग्लोबल ब्रांड को नुकसान पहुंचाएगा टोक्यो ओलंपिक? जानिए क्यों सता रही ये चिंता

पॉलिटिको (Politico) नाम की एक वेबसाइट ने बकायदा एक आर्टिकल लिखकर कुछ सवाल उठाए हैं और कहा है कि जापान के नेताओं को टोक्यो ओलंपिक की वजह से अपने देश की छवि खराब होने का डर सता रहा है.

23 जुलाई से शुरू हुए हैं टोक्यो ओलंपिक. (फोटो-PTI) 23 जुलाई से शुरू हुए हैं टोक्यो ओलंपिक. (फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • शुक्रवार से शुरू हो गए हैं टोक्यो ओलंपिक
  • वेबसाइट ने आर्टिकल लिख सवाल उठाए
  • लिखा- कई चुनौतियों से जूझ रहा है जापान

कोरोना महामारी (Coronavirus Pandemic) की वजह से एक साल देरी से टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympic) शुरू तो हो गया, लेकिन अब इसके आयोजन को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं. पॉलिटिको (Politico) नाम की एक वेबसाइट ने बकायदा एक आर्टिकल लिखकर कुछ सवाल उठाए हैं और कहा है कि जापान के नेताओं को टोक्यो ओलंपिक की वजह से अपने देश की छवि खराब होने का डर सता रहा है.

7 जनवरी 2013 को शिंजो आबे (Shinzo Abe) को प्रधानमंत्री बने दो हफ्ते भी नहीं हुए थे कि 2020 का ओलंपिक टोक्यो में कराए जाने को लेकर जापान ने बिड डाली थी. उस वक्त ये दिखाने की कोशिश हुई थी कि पिछले दो दशक से उतार-चढ़ाव को देख रहा जापान आबे की लीडरशिप में खुद को दोबारा उठा लेगा. 

हालांकि, बीते शुक्रवार को जब टोक्यो ओलंपिक शुरू हुआ तो महामारी के कारण इसमें दर्शक शामिल नहीं हुए, जैसी आबे को उम्मीद थी. जापान की ज्यादातर सीमाएं सील हैं. टोक्यो में भी इमरजेंसी लगी हुई है. आर्टिकल में लिखा है कि टोक्यो ओलंपिक की वजह से कोविड-19 के केस (Covid 19 Cases) बढ़ने की आशंका भी है. इतना ही नहीं, ओलंपिक के 'सुपर स्प्रेडर' बनने का डर भी सता रहा है. शिंजो आबे खुद ओपनिंग सेरेमनी में शामिल नहीं हो सके थे. वहीं, मौजूदा प्रधानमंत्री योशीहिदे सुगा (Yoshihide Suga) ने सेफ और सिक्योर गेम का वादा किया है.

आर्टिकल में लिखा है कि टोक्यो ओलंपिक के दौरान खाली पड़े स्टैंड न तो जापान के दोबारा उठ खड़े होने के उत्सव की तरह दिख रहे हैं और न ही महामारी के अंत के उत्सव की तरह. ओलंपिक ने जापान की अयोग्यता को उजागर कर दिया है. 

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पॉलिटिको ने आलोचना करते हुए लिखा है कि जिस तरह दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1964 के ओलंपिक में जापान ने खुद को साबित कर दिया था, आबे भी वैसा ही चाहते थे, लेकिन इस वक्त जापान के लिए ओलंपिक इतना जरूरी नहीं है, खासतौर से जब वो जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है.

ओलंपिक की मेजबानी करने से सुपरपॉवर नहीं बन सकता है, क्योंकि ये अभी भी बढ़ती उम्र और सिकुड़ती आबादी का सामना कर रहा है. अगर 1964 के टोक्यो ओलंपिक ने जापान को आर्थिक तौर पर सुपर पॉवर की तरह पेश किया था, तो 2021 का टोक्यो ओलंपिक जापान के हालातों को उजागर कर रहा है जो अभी भी कई चुनौतियों से जूझ रहा है.

इस आर्टिकल में आगे लिखा गया है कि महामारी के बीच टोक्यो ओलंपिक कराए जाने को लेकर भले ही आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन कोरोना से निपटने में जापान ने G-7 के बाकी देशों की तुलना में ज्यादा बेहतर प्रदर्शन किया है. इतना ही नहीं, योशीहिदे सुगा ने 2050 तक जापान को जीरो कार्बन एमिशन देश बनाने का टारगेट रखा है. इसके अलावा जापान एशिया में डेवलपमेंट का एक प्रमुख स्रोत बना है, जबकि चीन भी इस वक्त बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव पर तेजी से काम कर रहा है. कुल मिलाकर, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक बाधाओं के बावजूद जापान चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी क्षमताओं का बेहतर उपयोग कर रहा है, जो टोक्यो ओलंपिक के बाद एथलीट के जाने के बाद भी दुनिया के सामने रहेंगी. 

आर्टिकल में आखिर में लिखा है कि आबे ने 2020 का ओलंपिक टोक्यो में आयोजन करने की इसलिए सोची थी, क्योंकि वो ओलंपिक के जरिए दिखाना चाहते थे कि जापान अब भी मजबूत है. जापान ने मार्च 2011 में ही भूकंप और सुनामी को झेला था और उसे रिकंस्ट्रक्शन की जरूरत थी. हालांकि, आर्टिकल में लिखा है कि जापान को विश्व मंच पर अपनी भूमिका दिखाने के लिए ओलंपिक की जरूरत नहीं थी.

 

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