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फटा पोस्टर, निकले संजू… अभिषेक से शुरू हुई थी वर्ल्ड कप की कहानी, मगर फाइनल से पहले SAMसन ही सैमSON

टी20 वर्ल्ड कप की शुरुआत में भारत की उम्मीदें अभिषेक शर्मा के स्टारडम पर टिकी थीं, लेकिन टूर्नामेंट आगे बढ़ते-बढ़ते कहानी बदल गई. जहां अभिषेक का बल्ला खामोश रहा और उनके नाम सबसे ज्यादा शून्य दर्ज हुए, वहीं संजू सैमसन ने बड़े मौकों पर शानदार पारियां खेलकर टीम इंडिया की राह आसान कर दी.

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संजू के प्रदर्शन का ग्राफ चढ़ा....(Photo, ITG)
संजू के प्रदर्शन का ग्राफ चढ़ा....(Photo, ITG)

टी20 वर्ल्ड कप की शुरुआत में अगर किसी एक भारतीय बल्लेबाज के इर्द-गिर्द सबसे ज्यादा उम्मीदें घूम रही थीं, तो वह नाम था अभिषेक शर्मा. आईपीएल और द्विपक्षीय सीरीज में उनकी विस्फोटक बल्लेबाजी ने ऐसा माहौल बना दिया था कि भारत की टॉप ऑर्डर बल्लेबाजी का भविष्य उन्हीं के बल्ले से तय होगा. हर चर्चा में वही थे- पावरप्ले के बादशाह, गेंदबाजों पर टूट पड़ने वाले बल्लेबाज और नई पीढ़ी के बड़े स्टार.

दूसरी तरफ संजू सैमसन थे- प्रतिभा पर कभी सवाल नहीं रहा, लेकिन जगह को लेकर हमेशा संशय रहा. टूर्नामेंट से पहले तक यह भी साफ नहीं था कि उन्हें प्लेइंग इलेवन में मौका मिलेगा या नहीं. कई मैचों में उनका नाम टीम से बाहर दिखा और ऐसा लगने लगा कि शायद इस वर्ल्ड कप में उनकी भूमिका सीमित ही रहने वाली है.

... लेकिन क्रिकेट की खूबसूरती यही है- यह कहानी को पलटने में देर नहीं लगाता...

अब जब भारत फाइनल में पहुंच चुका है, तो कहानी बिल्कुल अलग है. जो टूर्नामेंट अभिषेक शर्मा के स्टारडम से शुरू हुआ था, वह अब संजू सैमसन के दमदार प्रदर्शन से रोशन हो रहा है. आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं. अभिषेक शर्मा के नाम इस वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा शून्य दर्ज हो चुके हैं और उनका बल्ला जैसे ठंडा पड़ गया है. शुरुआती मैचों में जिस आक्रामकता की उम्मीद थी, वह दिखाई नहीं दी और कई बार ऐसा लगा जैसे उनका आत्मविश्वास भी डगमगा गया हो.

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वहीं, संजू सैमसन ने धीरे-धीरे कहानी अपने नाम कर ली. उन्होंने सिर्फ रन नहीं बनाए, बल्कि बड़े मौकों पर टीम के लिए खड़े हुए. सुपर-8 के अहम मुकाबले में उनकी 97 रनों की नाबाद पारी ने भारत को सेमीफाइनल तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई. फिर सेमीफाइनल में उन्होंने जो किया, वह इस टूर्नामेंट की सबसे यादगार पारियों में गिना जाएगा- सिर्फ 42 गेंदों में 89 रन की धुआंधार पारी, जिसमें चौकों और छक्कों की बारिश थी.

उस पारी ने सिर्फ मैच नहीं जिताया, बल्कि भारत को फाइनल का टिकट भी दिला दिया.

लेकिन यह कहानी सिर्फ व्यक्तिगत फॉर्म की नहीं है. इसके पीछे टीम की रणनीति और बदलते समीकरण भी उतने ही अहम हैं.

जब ईशान किशन IN, संजू OUT

वर्ल्ड कप से कुछ महीने पहले तक भारतीय टीम की ओपनिंग जोड़ी लगभग तय मानी जा रही थी- अभिषेक शर्मा और संजू सैमसन. दोनों ने मिलकर कई मैचों में तेज शुरुआत दी थी और टीम को मजबूत प्लेटफॉर्म भी दिया था. सैमसन का अनुभव और अभिषेक की आक्रामकता इस जोड़ी को संतुलन देते थे.

... लेकिन जनवरी 2026 में न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज ने तस्वीर बदल दी. उस दौरान सैमसन का बल्ला ज्यादा रन नहीं बना सका. दूसरी तरफ घरेलू क्रिकेट में ईशान किशन शानदार फॉर्म में थे. उनके लगातार रन और आक्रामक अंदाज ने चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट को नया विकल्प दे दिया.

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टीम ने फॉर्म को प्राथमिकता दी- ईशान किशन टीम में आ गए और संजू सैमसन को बाहर बैठना पड़ा.

द्विपक्षीय सीरीज में यह दांव सफल भी दिखा. लेकिन वर्ल्ड कप का दबाव और अलग परिस्थितियां अक्सर योजनाओं की असली परीक्षा लेते हैं. धीमी पिचों और बड़े मुकाबलों में वही आक्रामक फॉर्मूला हमेशा काम नहीं करता. कई बार टीम को स्थिरता और संतुलन की जरूरत पड़ती है.

संतुलन की तलाश और सैमसन की वापसी

पिछले कुछ समय में भारतीय टीम की बल्लेबाजी में ‘लेफ्ट-हैंड क्रांति’ देखने को मिली है. टॉप ऑर्डर में बाएं हाथ के बल्लेबाजों की संख्या बढ़ी है और इससे विरोधी टीमों की रणनीति कई बार उलझ जाती है. अलग-अलग एंगल और फील्ड सेटिंग के कारण गेंदबाजों के लिए लाइन-लेंथ तय करना मुश्किल हो जाता है.

लेकिन यही रणनीति तब समस्या बन सकती है, जब विरोधी टीमों के पास दाएं हाथ के ऑफ-स्पिनर या ऐसे गेंदबाज हों जो बाएं हाथ के बल्लेबाजों के खिलाफ खास तौर पर प्रभावी हों. इस वर्ल्ड कप में कुछ मैचों में यही देखने को मिला- भारतीय बल्लेबाजी अचानक उसी एंगल के जाल में फंसती नजर आई.

तब टीम को एहसास हुआ कि सिर्फ आक्रामकता ही नहीं, संतुलन भी उतना ही जरूरी है.

और शायद यही वह क्षण था जब संजू सैमसन की वापसी का रास्ता बना. एक दाएं हाथ का बल्लेबाज, जो स्पिन और पेस दोनों के खिलाफ सहज खेल सकता है और जो दबाव में भी अपनी लय बनाए रख सकता है- टीम को ठीक उसी तरह के विकल्प की जरूरत थी.

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ठहराव से आती है सैमसन की आक्रामकता

सैमसन की बल्लेबाजी को अक्सर सिर्फ आक्रामकता के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन असल में उनकी ताकत कुछ और है- उनका ठहराव. जब वह क्रीज पर संतुलन में होते हैं, तो उनके शॉट्स बेहद सहज और खूबसूरत दिखते हैं. गेंदबाजों को ऐसा लगता है जैसे वह जोखिम ले रहे हैं, लेकिन असल में उनके शॉट्स नियंत्रण में होते हैं.

जब यही संतुलन टूटता है, तो वही शॉट जल्दबाजी में बदल जाते हैं और उनकी पारी जल्दी खत्म हो जाती है.

इस वर्ल्ड कप में कोलकाता की पारी में सैमसन ने वही संतुलन दोबारा हासिल कर लिया. उन्होंने शुरुआत में समय लिया, फिर जैसे ही लय मिली, उन्होंने गेंदबाजों पर हमला शुरू कर दिया. उनके शॉट्स में ताकत भी थी और टाइमिंग भी.

सबसे खास बात यह थी कि वह सिर्फ रन नहीं बना रहे थे- वह मैच की दिशा बदल रहे थे.

अगर यही लय फाइनल में भी जारी रहती है, तो यह पारी सिर्फ एक मैच जिताने वाली नॉक नहीं रहेगी. यह संजू सैमसन के करियर का वह मोड़ बन सकती है, जहां से उनकी पहचान हमेशा के लिए बदल जाएगी.... और शायद तब इस वर्ल्ड कप की कहानी एक ही लाइन में समेटी जा सकेगी- फटा पोस्टर… और उससे निकले संजू.
 

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