दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम में मंगलवार शाम भारतीय टीम का अभ्यास सत्र सिर्फ एक नियमित नेट सेशन नहीं था. फ्लडलाइट्स की रोशनी में गेंद बल्ले से ऐसी आवाज के साथ निकल रही थी कि कप्तान सूर्यकुमार यादव को शुरुआत में ही सख्त हिदायत देनी पड़ी- बाउंड्री के पास खड़े सभी खिलाड़ी पिच की ओर मुंह करके खड़े रहें. गेंद की रफ्तार और शॉट्स की ताकत किसी भी चूक को खतरनाक बना सकती थी.
अमेरिका के खिलाफ पहले मैच में झटका झेलने के बाद टीम का माहौल हल्का और जीवंत था. फील्डिंग कोच टी दिलीप अपने फंगो से सटीक हिट लगाते रहे और खिलाड़ी ऊंचे कैचों के बीच ठहाके लगाते दिखे. हार्दिक पंड्या की आवाज पूरे मैदान में गूंज रही थी- 'शॉट यार, दिलीप सर!' ऐसा लग रहा था मानो टीम ने दबाव को हंसी में उड़ा देने की रणनीति बना ली हो.
... लेकिन इसी शोर और ऊर्जा के बीच एक अलग कहानी भी चल रही थी- संजीदा, शांत और भीतर ही भीतर सुलगती हुई. यह कहानी थी संजू सैमसन की.
जब टॉप-4 बल्लेबाज पैड अप करके नेट्स में उतरे- ईशान किशन, संजू सैमसन, तिलक वर्मा और सूर्यकुमार यादव- तब सबसे ज्यादा ध्यान जिस टकराव पर गया, वह था सैमसन और ईशान के बीच का ‘श्रव्य अंतर’. ईशान के बल्ले से निकलती आवाज खाली कोटला स्टैंड्स में गूंज रही थी. वह हर गेंद को मिड-विकेट और लॉन्ग-ऑन की दिशा में ठोक रहे थे. टाइमिंग बेदाग, आत्मविश्वास भरपूर.
📍 New Delhi
— BCCI (@BCCI) February 11, 2026
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दूसरी ओर, सैमसन का संघर्ष साफ दिख रहा था. अर्शदीप सिंह और हार्दिक पंड्या की रफ्तार के सामने वह लय तलाशते नजर आए. उनका फुटवर्क थोड़ा झिझक भरा था, शॉट्स में वह सहज प्रवाह नहीं दिखा जो आमतौर पर उनके खेल की पहचान है. ऐसा लग रहा था मानो हर गेंद उनके लिए एक परीक्षा हो और हर चूक का मतलब चयन की दौड़ में और पीछे छूट जाना.
स्पिन नेट्स में हालांकि उन्हें थोड़ी राहत मिली. वरुण चक्रवर्ती, अक्षर पटेल और कुलदीप यादव के खिलाफ उनका फुटवर्क खुला, कुछ भरोसेमंद शॉट्स भी दिखे. लेकिन समग्र तस्वीर यही रही कि जहां बाकी खिलाड़ी अपनी जगह को लेकर आश्वस्त दिखे, वहीं सैमसन हर गेंद के साथ अपनी प्रासंगिकता साबित करने की जद्दोजहद में लगे थे.
सहायक कोच रयान टेन डोएशेट ने भी सैमसन की स्थिति पर साफगोई से बात की. उन्होंने कहा कि टीम प्रबंधन ने सैमसन को पूरा समर्थन दिया है, लेकिन जब कोई और खिलाड़ी मौके का फायदा उठाता है तो चयन के फैसले स्पष्ट हो जाते हैं. यह बयान भले संतुलित था, पर संकेत साफ था- दरवाजा बंद नहीं है, मगर खुला भी नहीं है.
नेट सेशन खत्म होने के बाद भी सैमसन सीधे आइस बाथ की ओर नहीं गए. बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक उन्हें बाउंड्री के पास अलग ले गए और लगभग बीस मिनट तक हाई-इंटेंसिटी थ्रोडाउन कराए. दोनों के बीच लगातार धीमी बातचीत होती रही. मैदान के दूसरे छोर पर जहां हार्दिक और शिवम दुबे छक्कों की बारिश कर रहे थे, वहीं यह कोना एक शांत संघर्ष का साक्षी बना हुआ था. सत्र के अंत में कोटक ने सैमसन की पीठ थपथपाई- एक मौन संदेश, धैर्य रखो, मौका आएगा.
सैमसन कुछ देर अकेले मैदान के बीच खड़े रहे. आसपास शोर था, हलचल थी, लेकिन वह मानो अपने भीतर की आवाज सुन रहे थे. एक खिलाड़ी जो टीम का हिस्सा है, पर प्लेइंग इलेवन से बाहर. एक प्रतिभा, जो जानती है कि अगला मौका शायद निर्णायक हो.
गुरुवार को नामीबिया के खिलाफ बदलाव संभव है. अभिषेक शर्मा की तबीयत अभी पूरी तरह ठीक नहीं मानी जा रही और टीम पाकिस्तान के खिलाफ बड़े मुकाबले से पहले जोखिम नहीं लेना चाहेगी. हालांकि विकेटकीपिंग की जिम्मेदारी फिलहाल ईशान किशन के पास ही रहने के संकेत हैं.
इस पूरे अभ्यास सत्र में जहां हार्दिक की ताकत, वॉशिंगटन सुंदर की वापसी और जसप्रीत बुमराह की फुल-टिल्ट गेंदबाजी चर्चा का केंद्र रहे, वहीं सबसे गहरी छाप उस खामोश लड़ाई ने छोड़ी जो संजू सैमसन लड़ रहे हैं.
कभी-कभी क्रिकेट सिर्फ शॉट्स और विकेट्स की कहानी नहीं होता. कभी-कभी यह इंतजार, धैर्य और भीतर के आत्मसंघर्ष की दास्तान भी होता है. दिल्ली की उस शाम, भारतीय टीम के शोरगुल के बीच संजू सैमसन की खामोश जंग सबसे अलग दिखाई दी.