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किस्सा: जब पूरी टीम रोकती रही और कपिल देव ने सूजे हुए पैर से ऑस्ट्रेलिया की कमर तोड़ दी

भारतीय टीम दौरे पर थी और भारत पहला टेस्ट एक पारी के अंतर से हार चुका था. दूसरा मैच ड्रॉ रहा. किस्सा तीसरे मैच का है. मेलबर्न में इंडिया के पाद सीरीज़ लेवल पर लाने का मौका था. पहली पारी में गुंडप्पा विश्वनाथ ने सेंचुरी मारी.

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कपिल देव का किस्सा
कपिल देव का किस्सा

कपिल देव ने भारतीय क्रिकेट को एक अलग मुकाम दिया. ऑल-राउंडर खिलाड़ियों के मामले में कपिल देव अभी भी मील का पत्थर हैं. टेस्ट विकेटों के मामले में वो भारतीय गेंदबाज़ों की लिस्ट में 434 विकेटों के साथ तीसरे नंबर पर हैं. विश्व कप विजेता कप्तान रहे कपिल देव ने 74 बार वन-डे में और 34 बार टेस्ट मैच में भारतीय टीम की कप्तानी की. भारतीय क्रिकेट कपिल देव की शानदार कहानियों से भरा पड़ा है. इन्हीं में एक कहानी है जो पेशे से डॉक्टर और साथ-साथ क्रिकेट कमेंटेटर डॉक्टर नरोत्तम पुरी सुनाते हैं.

नरोत्तम पुरी जो कहानी सुनाते हैं वो है इंडिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच 1980-81 में हो रही टेस्ट सीरीज़ की. भारतीय टीम दौरे पर थी और भारत पहला टेस्ट एक पारी के अंतर से हार चुका था. दूसरा मैच ड्रॉ रहा. किस्सा तीसरे मैच का है. मेलबर्न में इंडिया के पाद सीरीज़ लेवल पर लाने का मौका था. पहली पारी में गुंडप्पा विश्वनाथ ने सेंचुरी मारी. जवाब में ऑस्ट्रेलिया ने लम्बी लीड ले ली. लेकिन फिर इंडिया ने दूसरी पारी में अच्छी बल्लेबाज़ी की और शुरुआत के 5 बल्लेबाज़ों की बदौलत 324 रन बनाये. ऑस्ट्रेलिया को पांचवें दिन बल्लेबाज़ी करनी थी और उन्हें जीतने के लिए 143 रन चाहिये थे. 

बुधवार, 11 फ़रवरी 1981 को टेस्ट का आख़िरी दिन था. सीरीज़ के आख़िरी टेस्ट को जीतकर इंडियन टीम सीरीज़ ड्रॉ कर सकती थी. कपिल देव पर बड़ी ज़िम्मेदारी थी. सुबह-सुबह डॉक्टर नरोत्तम पुरी के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया जा रहा था. दरवाज़े के बाहर यशपाल शर्मा खड़े थे. नरोत्तम पुरी समेत दूसरे कमेंटेटर उसी होटल में रके हुए थे जिसमें इंडियन टीम रुकी हुई थी. यशपाल ने नरोत्तम पुरी से कहा कि वो ड्रेसिंग रूम में चलें और कपिल देव को देखें. ड्रेसिंग रूम में कपिल बैठे हुए थे और उनके पैर में सूजन थी. अपनी हैमस्ट्रिंग में खिंचाव के चलते कपिल ने चौथे दिन गेंदबाज़ी भी नहीं की थी. लेकिन कपिल ज़िद पर अड़े हुए थे कि पांचवें दिन की सुबह वो गेंदबाज़ी करेंगे ही करेंगे. हर कोई उन्हें ऐसा करने से मना कर रहा था लेकिन कपिल अपने आगे किसी की नहीं सुन रहे थे. नरोत्तम पुरी चूंकि डॉक्टर भी थे, इसलिये उन्हें भी बुलाया गया. लोगों को लगा कि शायद कपिल उनकी ही बात सुन लें. लेकिन पुरी साहब की भी नहीं चली. 

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ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कपिल देव (गेटी इमेज)

असल में, चौथे दिन दिलीप दोषी ने अच्छी गेंदबाज़ी करके मैच को खोल दिया था. पहला सेशन बेहद अहम हो गया था और जो टीम इस सेशन में खेल कर जाती, मैच उसी के हक़ में जाने वाला था. ग्रेग चैपल आउट हो चुके थे और इंडिया को एक मौका दिख रहा था. कपिल इस मौके को जाने नहीं देना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने गेंदबाज़ी करने की ज़िद लगा रखी थी. लेकिन बाकी लोगों को उनकी चोट और आगे आने वाला न्यूज़ीलैंड का दौरा दिखायी दे रहा था जहां कपिल की सेवाएं ली जाने वाली थीं.

पांचवां दिन शुरू हुआ और कपिल मैदान पर उतरे. एक ओर से कपिल और दूसरे से स्पिनरों ने (मुख्यतः दिलीप दोषी) ने गेंदबाज़ी चालू की. कुछ ही देर में स्कोर 50 रन पर 5 विकेट हो गया. लेकिन अभी भी एलेन बॉर्डर क्रीज़ पर थे. वो पहली पारी के शतकवीर थे. उन्हें कपिल देव ने निष्क्रिय किया. बॉर्डर के कैच में जितना हाथ कपिल की तेज़ गेंदबाज़ी का था, उतना ही हाथ किरमानी के करामाती कैच का भी था. लेग साइड की ओर जाती गेंद आधे रास्ते में ही थी कि किरमानी गेंद की दिशा की ओर बढ़ गए. जब तक गेंद बॉर्डर के बल्ले को छूकर पीछे पहुंचती, किरमानी ठीक उसकी लाइन में आ चुके थे. यहां उन्हें कैच पकड़ने में कोई मुश्किल नहीं हुई. इसके बाद कपिल विकेट लेते गए और पारी ख़तम होने पर उनका बॉलिंग फ़िगर था - 16.4 ओवर, 4 मेडेन, 28 रन, 5 विकेट.

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नरोत्तम पुरी कहते हैं कि कपिल देव को कोई नहीं रोक सकता था. इंजरी तो बिल्कुल भी नहीं.

(ये किस्सा नरोत्तम पुरी के हवाले से लिया गया है. इसका ज़िक्र उन्होंने 'माय क्रिकेट हीरो' किताब में किया है जिसे गुलू इज़ेकिएल ने संकलित किया है. किताब को रूपा पब्लिकेशन्स ने छापा है.) 

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