इंडिया टुडे कॉन्क्लेव मुंबई 2023 के सेशन 'Her Space, Her Story: Women Scientists at the Frontiers of Space Exploration' में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स की प्रमुख प्रो. अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम और इसरो की वैज्ञानिक और आदित्य-L1 सोलर मिशन की प्रोजेक्ट डायरेक्टर निगर शाजी शामिल हुईं. दोनों ने अपने-अपने दफ्तरों में महिलाओं के काम. उनके सम्मान. आत्मविश्वास पर बात की.
सूरज की स्टडी जरूरी क्यों?
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स की प्रमुख डॉ. अन्नापूर्णी सुब्रमण्यम ने बताया कि हम 100 से ज्यादा वर्षों से सूरज की स्टडी कर रहे थे. हम 1904 से सूरज पर नजर रख रहे हैं. हमें कोरोनस मास इजेक्शन (CME) देखते हैं. हम कई 11 सालों की सोलर साइकिल की स्टडी कर रहे हैं. हम सौर तूफानों की स्टडी कर रहे हैं. ये तूफान कोरोना की वजह से आता है. उसे देखने के लिए आपको पूरे सूरज को ढंकना होगा. ताकि रोशनी ज्यादा न रहे. सूरज की स्टडी इस लिए जरूरी है कि हमारे अंतरिक्ष का मौसम वही बदलता है.
वहीं, आदित्य-L1 सोलर मिशन की प्रोजेक्ट डायरेक्टर निगर शाजी ने कहा कि आदित्य ने धरती की सतह से 10 लाख किलोमीटर दूर की यात्रा कर ली है. औसत 11 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से आगे बढ़ रहा है. अभी दो बार रास्ते में सुधार करेंगे. इसके बाद वह लगभग जनवरी में L1 प्वाइंट तक पहुंच पाएगा.

कोई भी सैटेलाइट बनाना आसान नहीं
आदित्य मिशन में किस तरह की समस्याएं आईं. इस पर निगर शाजी ने कहा कि L1 प्वाइंट इमेजनरी है. वहां सूरज और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बीच की जगह है. वहां पर उसे संतुलन बनाकर रखना है. यही सबसे बड़ी चुनौती है. हम पहली बार ये काम कर रहे हैं. इसलिए यह कठिन है. आदित्य के यंत्र बनाना या किसी भी सैटेलाइट के पेलोड बनाना बहुत मुश्किल काम होता है.
साइंटिस्ट बनने की प्रेरणा कैसे मिली, कितना सपोर्ट था परिवार का?
निगर ने कहा कि मेरे माता-पिता सपोर्टिव थे. मेरे पापा को फिजिक्स में इंट्रेस्ट था. मैंने इंजीनियरिंग तब चुना था, जब लड़कियों के लिए वह कठिन माना जाता था. 120 इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स में से 100 लड़के थे. सिर्फ 20 लड़कियां थीं. मुस्लिम समाज से कोई दिक्कत तो नहीं आई. लेकिन उस समय महिलाओं को ज्यादा पढ़ने नहीं दिया जाता था.
डॉ. अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम ने कहा कि मैंने रात को तारे देखे हैं. आज की पीढ़ी नहीं देख पाती. यहीं से मुझे साइंटिस्ट बनने की प्रेरणा मिली. मुझे म्यूजिक पसंद है. मेरे माता-पिता संगीत में है. उन्हें मेरे साइंस में आने को रोका नहीं. इंजीनियरिंग के लिए रोकते थे. लेकिन एस्ट्रोनॉमी के लिए कोई दिक्कत नहीं थी.

दफ्तर में महिलाओं को किस तरह की दिक्कत आती है
निगर ने कहा कि मुझे कभी ये लगा ही नहीं कि मैं महिला हूं. इसरो में ऐसी फीलिंग नहीं आती. हां ये हो सकता है कि आपको किसी फैसले के दौरान दुविधा हो. लेकिन जब आप सीढ़ियां चढ़ती हैं, तब संतुलन बनाना जरूरी है. ऐसे में परिवार का सपोर्ट जरूरी होता है. अगर सपोर्टिव सिस्टम बना लेंगे तो आप कैरियर को आगे बढ़ा सकते हैं.
डॉ. सुब्रमण्यम ने कहा कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स में हर लेवल पर महिलाएं हैं. वो खुद फैसले लेती हैं. लेकिन पहली बार मैं यहां प्रमुख बनी. आपको हमेशा आत्मविश्वास का डबल डोज लेकर चलना होगा. फिर सभी आपको साथ देने चले आएंगे. नहीं आएंगे तो आप उस काम को पूरा करो.
वर्क-लाइफ बैलेंस और आत्मविश्वास कैसे बनाते हैं आपलोग?
आत्मविश्वास को लाने के सवाल पर निगर ने कहा कि आत्मविश्वास को बनाकर रखना परवरिश से आता है. कुछ लोग खुद बनाते हैं. कुछ लोग जीनेटिक्स में लेकर आते हैं. जबकि, ये आपके लिए आसान नहीं होगा. जो काम है उसे कर दीजिए. अपनी ड्यूटी पूरी करिए. उसके आसपास का मत सोचिए. फिर आप आगे बढ़ेंगे.
वर्क-लाइफ बैलेंस पर डॉ. अन्नपूर्णी ने कहा कि यह हर आदमी के हिसाब से बदलता है. हम हर दिन सबकुछ नहीं हासिल कर सकते. इसलिए इस तरह के गिल्टी ट्रैप से बचना चाहिए. समय का सही इस्तेमाल और अनुशासन ही संतुलन बनाता है.