
रात का सन्नाटा, दूर तक फैली चमचमाती सड़क और तेज रफ्तार से दौड़ती गाड़ियां. सब कुछ सामान्य लगता है, जब तक अचानक हेडलाइट की रोशनी में एक डरा सहमा जानवर नजर नहीं आ जाता. वह समझ नहीं पाता कि किस तरफ भागे, और ड्राइवर के पास रुकने का समय नहीं बचता. एक टक्कर... झटका और कूं-कूं की बुझती सी चीख, और फिर सब कुछ खामोश हो जाता है. एक्सप्रेसवे पर हर दिन ऐसे ही कई बेजुबान अपनी जान गंवा देते हैं, जिनकी कहानी न कहीं दर्ज होती है और न ही कोई सुनने वाला होता है. देश में बन रहे नए एक्सप्रेसवे सफर को तेज और आसान बना रहे हैं, लेकिन इन हाई-स्पीड सड़कों पर जानवरों के लिए खतरा भी उतना ही बढ़ता जा रहा है.
उत्तर प्रदेश का गंगा एक्सप्रेसवे हो या हाल ही में शुरू हुआ दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, या फिर दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेसवे, इन सभी हाई-स्पीड कॉरिडोर पर वाहनों की रफ्तार 100 से 120 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच रही है. इतनी तेज रफ्तार में अगर कोई कुत्ता या दूसरा जानवर अचानक सामने आ जाए तो ड्राइवर के पास रिएक्ट करने का समय बहुत कम बचता है.
हाल ही में दिल्ली से देहरादून के बीच करीब 213 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेसवे शुरू किया गया. जिससे दिल्ली से देहरादून का सफर अब 6-7 घंटे की जगह सिर्फ लगभग 2.5 घंटे में पूरा किया जा सकेगा. यह कॉरिडोर रास्ते में कई अहम जिलों से होकर गुजरता है. इसमें बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली और सहारनपुर जैसे जिले शामिल हैं. इस एक्सप्रेसवे का कुछ इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ है और NHAI का कहना है कि, इस एक्सप्रेसवे पर 12 किलोमीटर लंबा वन्य जीव एलीवेटेड कोरिडोर भी बनाया गया है.

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर भले ही सरकार ने वन्य जीवों को ध्यान में रखकर कई अंडरपास, वाइल्डलाइफ कोरिडोर और सुरंगें बनाई हों. लेकिन कुत्तों के लिए ये उतने कारगर होते नहीं दिख रहे हैं. हमारी आजतक की टीम के एक साथी ने हाल ही में इस एक्सप्रेसवे से दिल्ली से सहारनपुर के बीच यात्रा की. उन्होंने पाया कि, एक्सप्रेसवे पर रास्ते में कई जगह दर्जनों कुत्तों के शव क्षत-विक्षत हालत में मिले थे, जो तेज रफ्तार वाहनों के चपेट में आए थे.
सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथेलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री और एवीसी कॉलेज के एक स्टडी में सामने आया है कि 1997 से 2023 के बीच केवल वेस्टर्न घाट के इलाकों में गाड़ियों की टक्कर से 239 प्रजातियों के कुल 6,507 जानवर मारे गए. इस स्टडी को वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के जर्नल में प्रकाशित किया गया है. इनमें 4,960 कशेरुकी (Vertebrates) यानी रीढ़ वाले जानवर और 1,547 अकशेरुकी (Invertebrates) यानी बिना रीढ़ वाले जीव शामिल हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, मारे गए वर्टेब्रेट्स जीवों में 166 प्रजातियां शामिल हैं. इनमें 21 एंफीबियंस यानी उभयचर, 74 रेप्टाइल (सरीसृप), 40 पक्षी और 31 मैमल्स (स्तनधारी) हैं. इसके अलावा 73 इनवर्टेब्रेट्स रजातियां भी दर्ज की गईं. अध्ययन में यह भी सामने आया कि करीब 51% वर्टेब्रेट्स प्रजातियां पश्चिमी घाट में ही पाई जाती हैं. सरीसृपों में सबसे ज्यादा नुकसान सांपों को हुआ, जहां 43 प्रतिशत सांप प्रजातियां सड़क हादसों का शिकार बनीं.
स्टडी यह भी कहती है कि, औसतन हर किलोमीटर में 0.014 जानवरों की मौत दर्ज की गई. मरने वाली प्रजातियों में 18 ऐसी थीं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खतरे में मानी जाती हैं करीब 53 प्रतिशत मामलों में मारे गए जानवरों की सही प्रजाति की पहचान तक नहीं हो सकी. यह अध्ययन साफ इशारा करता है कि सड़कों पर बढ़ती रफ्तार अब जंगलों के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कई दुर्लभ प्रजातियां हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं.
ये आंकड़े केवल वेस्टर्न घाट के ही हैं. देश भर में फैलते रोड नेटवर्क पर आए दिन हजारों की संख्या में बेजुबान मौत के मुंह में समा रहे हैं. लेकिन इन सभी मौतों का आंकड़ा जुटा पाना भी मुश्किल है.
कई रिपोर्ट्स में सामने आया है कि एक्सप्रेसवे के आसपास बसे गांवों से जानवर अक्सर सड़क पर आ जाते हैं. खाने की तलाश, गाड़ियों के हेडलाइन की रोशनी की ओर आकर्षण या फिर सड़क पार करने की कोशिश उन्हें मौत के मुंह तक ले जाती है. एक्सप्रेसवे को डिजाइन करते समय स्पीड और स्मूद ट्रैफिक को प्राथमिकता दी जाती है. कई जगहों पर फेंसिंग होती है, लेकिन हर जगह यह पूरी तरह इफेक्टिव नहीं होता है. जहां फेंसिंग टूटी होती है या नहीं होती, वहां से जानवर आसानी से सड़क पर पहुंच जाते हैं.
इसके अलावा रात के समय विजिबिलिटी कम होना भी एक बड़ी वजह है. हेडलाइट की तेज रोशनी में अचानक सामने आए जानवर को देख पाना कई बार मुश्किल हो जाता है. अगर तेज रफ्तार में ड्राइवर अचानक ब्रेक लगाता है या गाड़ी मोड़ता है, तो पीछे से आ रही गाड़ियों के साथ भी टक्कर हो सकती है. यानी जानवर को बचाने की कोशिश कई बार बड़ी सड़क दुर्घटना में बदल जाती है. दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेसवे और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे जैसे रूट्स पर ट्रैफिक भी ज्यादा रहता है, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है.
ऐसे में एक वाहन चालक के नाते आम लोगों को भी कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. ताकि ड्राइविंग के दौरान किसी बेजुबान की जान न जाए और चालक खुद भी सुरक्षित रहे.
सिर्फ ड्राइवर ही नहीं, बल्कि एक्सप्रेसवे अथॉरिटी की भी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि, वे फेंसिंग मजबूत करें और जहां-जहां से जानवर प्रवेश कर सकते हैं, वहां सुधार करें. इसके अलावा एनिमल क्रॉसिंग जोन और वार्निंग साइन बोर्ड भी लगाए जाने चाहिए ताकि ड्राइवर पहले से सतर्क हो सकें. सरकारें ऐसे वन्य जीवों का हिसाब तो रखती हैं जो लुप्त हो रहे हैं लेकिन हमारे आसपास यू हीं भटकते बेजुबानों की गिनती कोई नहीं करता.