Vastu Tips: जैसा सोचोगे वैसा पाओगे... बड़े-बुजुर्गों की जुबान से आपने कई बार ये बात सुनी होगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आकाश तत्व की दिशाएं इस बात को सच करने का काम करती हैं. आकाश तत्व की दिशाएं हमारी सोच, हमारी कही बातें और हमारी प्रार्थना को सीधे ब्रह्माणीय ऊर्जा से जोड़ने में मदद करती हैं. वास्तु शास्त्र के अनुसार, इस दिशा में बैठकर की गई बातें और मन में आए विचार बहुत जल्दी पूरे होते हैं. इसलिए आकाश तत्व की दिशाओं में बैठकर कभी नकारात्मक विचार और गलत बात मन या जुबान पर न लाएं.
कौन सी दिशाएं हैं आकाश तत्व की?
वास्तु में पश्चिम-दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम, पश्चिम-उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पश्चिम दिशाएं को आकाश तत्व की दिशा माना गया है. इनमें मुख्य रूप से पहली दो दिशाएं पश्चिम-दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम दिशा बहुत महत्वपूर्ण हैं. पहली दिशा मां सरस्वती की और दूसरी दिशा शनि देव व भगवान विष्णु की हैं. सीधे ब्रह्माणीय शक्ति से जुड़े होने के कारण ही वृंदावन के ज्यादातर मंदिरों में श्रीकृष्ण की प्रतिमा पश्चिम दिशा में ही विराजमान है. घर में भी पश्चिम दिशा में मंदिर का होना बहुत शुभ माना जाता है.
इस दिशा में बच्चे पढ़ाई करें तो अच्छा होता है. किसी भी विषय में अपना स्किल डेवलप करने के लिए वेस्ट-साउथ-वेस्ट (मां सरस्वती की दिशा) दिशा बहुत अच्छी है. लेकिन इन दो दिशाओं में बैठकर नकारात्मक बातें करना आपके जीवन में भी नकारात्मकता को बढ़ाता है.
नॉर्थ-वेस्ट दिशा भी आकाश तत्व की सकारात्मक दिशाओं में आती हैं. जबकि पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा को डीटॉक्ट होने के लिए अच्छा स्थान माना गया है. यानी इस दिशा में बैठकर अपने मन की पीड़ा और दुख को कुछ समय के लिए बैठकर व्यक्त करना अच्छा है.
आकाश तत्व की दिशा में बैठकर क्या न करें?
अपने परिवार के किसी सदस्य को आकाश तत्व की दिशा में बैठकर बुरा न कहें. बच्चों को नकारात्मक रूप से डाट-फटकार न लगाएं. ईश्वर के लिए कभी गलत न कहें और खुद के जीवन को भी न कोसें. क्योंकि आप जो बोलेंगे संभव है कुछ समय बाद वही घटित होने लगे. बच्चों के पढ़ने का सामान इस दिशा में रखना अच्छा होता है.
यहां बैठकर सकारात्मक रूप से अपने भविष्य की योजनाएं बनाना शुभ होता है. मन में अच्छे विचार लाने से आदमी के काम बनते हैं. दिन में एक बार इस दिशा में आंख बंद करके हाथ जोड़कर बैठें और अपने मन की इच्छाओं को बोलें. जल्दी ही आपकी इच्छाएं पूरी होंगी.