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देवी परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? क्या है इसका हिंदू पंचांग से कनेक्शन

नवरात्र केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह शक्ति, प्रकृति और चेतना के संतुलन का प्राचीन विज्ञान है. यह नौ दिन प्राकृतिक बदलावों के साथ आंतरिक ऊर्जा जागृत करने और आत्मशुद्धि का समय होते हैं.

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चैत्र नवरात्र से सनातन परंपरा के नववर्ष की शुरुआत होती है
चैत्र नवरात्र से सनातन परंपरा के नववर्ष की शुरुआत होती है

भारतीय परंपरा में नवरात्र को एक धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ वाले नौ दिनों के तौर पर देखा जाता है. नवरात्र यानी कि नौ रातों तक चलने वाली पूजा. लेकिन इस सामान्य अर्थ से आगे जाकर इस बात को समझने की कोशिश करें तो इसमें गहरे अर्थ छिपे हैं. यह नौ दिन ऐसे समय हैं जब शरीर खुद को मौसम के हिसाब से ढाल रहा होता है. बड़ी बात ये है कि ये समय सिर्फ मनुष्यों के लिए ही बदलाव का नहीं होता है, बल्कि पूरी प्रकृति ही बदल रही होती है. इसका असर पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों पर भी साफ दिखाई देता है.

पेड़ों में नई पत्तियां और कोपलें आ रही होती हैं. फूलों के पौधों में बीज बनने का समय होता है. प्रवासी पक्षी अपनी जगह बदल रहे होते हैं और कुछ अपने पंखों को साफ कर रहे होते हैं. सांप के केंचुल उतारने का मौसम भी यही होता है. यानी पूरी प्रकृति ही एक तरीके से न सिर्फ बदलाव को महसूस करती है, बल्कि उसका हिस्सा बन रही होती है.

चैत्र नवरात्र क्यों बन जाता है अध्यात्म का उत्सव?
हम आदमजात, सोचने-समझने के मामले में थोड़े धनी और जागरूक हैं, इसलिए हमारे लिए ये समय उत्सव का हो जाता है. एक अध्यात्मिक उत्सव, जो सिर्फ हमारा तन ही नहीं बल्कि और मन और आत्मा को शुद्ध करने की ओर ले जाता है.

इसलिए नवरात्र केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, प्रकृति और चेतना इन तीनों को बैलेंस करने का बहुत पुराना विज्ञान है. ये नौ रातें, समय का ऐसा हिस्सा हैं, जिसमें हम प्राकृतिक बदलावों को खुद में महसूस करते हुए इस समय को साधना में लगाते हैं और संयम-आत्मशुद्धि के जरिये भीतरी ऊर्जा को जगाते हैं. यही प्रोसेस परंपरा बन गया और हम इस बदलाव से वैदिक युग से ही जुड़ते चले आए हैं.

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शक्ति का कैसे हुआ देवीकरण?
अब आते हैं नवरात्र में देवी पूजा की परंपरा पर. शक्ति को पहली बार देवी के रूप में समझने का काम वैदिक पीरियड में ही हुआ. ऋग्ववेद में ही पहली बार 'देवी' शब्द मिलता है, जहां इसी नाम से 'देवी सूक्त' लिखा गया है. देवी सूक्त (ऋग्वेद 10.125) में देवी की ओर से कहा गया है...

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः ।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ॥1॥

अर्थ: "मैं रुद्रों, वसुओं, आदित्यों और विश्वदेवों (देवताओं) के रूप में विचरण करती हूं. मैं ही मित्र-वरुण, इन्द्र-अग्नि और दोनों अश्विनीकुमारों को धारण करते उन्हें शक्ति देती हूं.

ऋग्वेद की इस सूक्ति से साफ हो जाता है कि शक्ति और देवी दोनों न सिर्फ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, बल्कि एक ही रूप हैं.

देवी सिर्फ प्रतिमा या चित्र नहीं, बल्कि एनर्जी
यहां देवी को किसी प्रतिमा या चित्र में नहीं दिखाया गया है, बल्कि एक कॉस्मिक एनर्जी के रूप में देखा गया है. यही मूल दर्शन आगे चलकर नवरात्र की साधना का आधार बनता है. इसी तरह ऋग्वेद के रात्रि सूक्त में 'रात के समय' को भी देवी का रूप माना गया है. यानी जब सारा संसार अंधेरे में सोई हुई अवस्था में होता है,  तब देवी यानी रात (निशा) सभी का संरक्षण और पोषण करती हैं. रात को केवल अंधकार नहीं, बल्कि सुरक्षा और आराम देने वाली शक्ति बताया गया है. इसीलिए नवरात्र में 'रात्रि' का विशेष महत्व है. यह बाहरी दुनिया से हटकर भीतर की यात्रा का काल है.

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पौराणिक कहानियों के नजरिए से देखें तो नवरात्र का सबसे स्पष्ट और लोकप्रिय वर्णन मार्कण्डेय पुराण में मिलता है. इसीमें 'दुर्गा सप्तशती' भी शामिल हैं. इस ग्रंथ में देवी के तीन प्रमुख रूपों की कहानियों का जिक्र है.

महिषासुर वध, जो अहंकार और अत्याचार का अंत करती हैं.
मधु-कैटभ वध, जो अज्ञान और भ्रम के नाश का प्रतीक है
शुंभ-निशुंभ वध, जो लालच और वासना पर विजय का संदेश है.

हर प्राणी में मौजूद है देवी की शक्ति
इस तरह देवी हर प्राणी में शक्ति के रूप में मौजूद हैं. यही कारण है कि नवरात्र में नौ दिनों तक देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, जो बाहरी उपासना के साथ-साथ आंतरिक ऊर्जा के नौ स्तरों की जागृति का प्रतीक है. देवी भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों में भी नवरात्र व्रत का विशेष महत्व बताया गया है. हर वर्ष नवरात्र का व्रत करना जीवन में संतुलन और शुद्धि लाता है.

वहीं कालिका पुराण में माघ और आषाढ़ मास के नवरात्रों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें 'गुप्त नवरात्र' कहा जाता है. ये विशेष रूप से तांत्रिक साधना और गहरी गंभीर उपासना के लिए माने जाते हैं और सामान्य जन की अपेक्षा साधकों के लिए अधिक महत्वपूर्ण होते हैं.

ब्रह्मांड का मूल ऊर्जा हैं देवी
असल, नवरात्र की पौराणिक कहानियां केवल धार्मिक व्याख्या नहीं हैं, बल्कि गहरे मनोवैज्ञानिक संकेत भी देती हैं. देवी और असुरों के बीच होने वाला युद्ध मनुष्य के भीतर चल रहे अंदरूनी टकराव का प्रतीक है. महिषासुर अहंकार का, शुंभ-निशुंभ लालच और वासना का, जबकि मधु-कैटभ भ्रम और अज्ञान के प्रतीक हैं. इस तरह नवरात्र बाहरी युद्ध की कहानी नहीं, बल्कि आत्मसंघर्ष और आत्मविजय की नौ दिवसीय प्रक्रिया है.

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नवरात्र का वैदिक और पौराणिक आधार यह स्पष्ट करता है कि देवी ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा हैं, रात्रि आत्मचिंतन और साधना का सर्वोत्तम समय है, और देवी-असुर युद्ध असल में मनुष्य के भीतर की नकारात्मक प्रतीकों से संघर्ष का नाम है. इसलिए नवरात्र केवल पूजा या उत्सव नहीं, बल्कि भीतरी बदलाव और चेतना के जागरण का जरूरी समय है.

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