प्रयाग में चल रहे महाकुंभ के दौरान नागा साधुओं ने खास मौकों पर शाही स्नान किया. अलग-अलग अखाड़ों के लिए शाही स्नान का क्रम पहले से निर्धारित होता है.
जब नागा साधुओं की सवारी शाही स्नान के लिए निकलती है, तो लोगों की निगाहें इन पर थम जाती हैं.
हर बार कुंभ के मौके पर नागा साधु-संन्यासी लोगों को आकर्षण के केंद्र में होते हैं.
नागा साधुओं की खास तरह ही जीवनशैली ही इन्हें दूसरे बाबाओं से अलग बनाती है.
शाही स्नान जैसे खास मौकों पर नागा साधु खुद को खूब सजाते-संवारते हैं.
शाही स्नान के लिए नागा बाबा सोलह श्रृंगार करते हैं. इस दौरान वे सिर से लेकर पांव तक किसी ने किसी रूप में सजते जरूर हैं.
नागा साधु माथे पर आकर्षक तिलक लगाते हैं. ये पूरे शरीर पर चदंन का लेप करते हैं.
नागा संन्यासियों के आंखों में बसकर काजल की खूबसूरती भी बढ़ जाती है.
नागा संन्यासी गले व हाथों में रुद्राक्ष और फूलों की माला धारण करते हैं. ये अंगूठी और पैरों में लोहे या चांदी का कड़ा भी पहनते हैं.
नागा साधुओं का मानना है कि श्रृंगार की वस्तुओं का भौतिक, ज्योतिषीय और यौगिक महत्व है.
आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार माथे पर दोनों भौंहों के बीच में शरीर का आज्ञा चक्र होता है. माना जाता है कि यहां तिलक लगाने के बाद ध्यान करने में आसानी होती है.
नागा साधु अपने शरीर पर भस्म का भी लेप करते हैं. इसका भी आध्यात्मिक महत्व माना जाता है.
नागा साधु हर तरह के मौसम को सहने की क्षमता रखते हैं. इसका इन्हें अभ्यास होता है.