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Buddha Purnima 2026: जब महल छोड़ सिद्धार्थ बने गौतम बुद्ध, उनकी पत्नी यशोधरा का क्या हुआ और क्या फिर हुई थी मुलाकात?

Buddha Purnima 2026: बुद्ध पूर्णिमा 2026 के मौके पर जानें राजकुमारी यशोधरा की अनकही कहानी. सिद्धार्थ (भगवान बुद्ध) के राजमहल छोड़ने के बाद यशोधरा पर क्या बीती और उन्होंने क्यों भिक्षुणी जीवन अपनाया. क्या दोनों की फिर कभी मुलाकात हुई?

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सिद्धार्थ के अचानक चले जाने से यशोधरा पूरी तरह दुख और आश्चर्य में डूब गईं.
सिद्धार्थ के अचानक चले जाने से यशोधरा पूरी तरह दुख और आश्चर्य में डूब गईं.

Buddha Purnima 2026: 1 मई को यानी आज बुद्ध पूर्णिमा है वह पावन दिन जब गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण को श्रद्धा से याद किया जाता है.  इसी महान जीवन यात्रा के साथ जुड़ी एक बेहद महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर कम बताई जाने वाली कहानी है राजकुमारी यशोधरा की. यशोधरा, राजकुमार सिद्धार्थ (जो बाद में बुद्ध बने) की पत्नी थीं. दोनों का विवाह 16 वर्ष की आयु में हुआ था. विवाह के बाद वे राजमहल के वैभव, सुख और शाही जीवन में रहते थे. यशोधरा ने सिद्धार्थ के साथ एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम राहुल रखा गया. लेकिन कुछ समय बाद राजकुमार सिद्धार्थ ने संसार के दुखों से प्रभावित होकर गृहत्याग कर दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े.


यशोधरा का टूटना और फिर खुद को संभालना

सिद्धार्थ के अचानक चले जाने से यशोधरा पूरी तरह दुख और आश्चर्य में डूब गईं.  लेकिन उन्होंने इस स्थिति में खुद को कमजोर नहीं होने दिया.  जब उन्हें पता चला कि सिद्धार्थ साधु जीवन अपना चुके हैं, तो उन्होंने भी उनके मार्ग का अनुसरण करना शुरू किया. उन्होंने अपने आभूषण उतार दिए, साधारण पीले वस्त्र पहनने लगीं और भोजन भी सीमित कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे सिद्धार्थ ने त्याग किया था. महल के आराम और वैभव के बावजूद उनका जीवन धीरे-धीरे संयम और आत्मनियंत्रण की ओर बढ़ गया. 

छह वर्षों की प्रतीक्षा और बुद्ध का आगमन

सिद्धार्थ के गृहत्याग के लगभग छह साल बाद, जब वे ज्ञान प्राप्त कर बुद्ध बन चुके थे, वे कपिलवस्तु लौटे. लेकिन यशोधरा उनसे मिलने सीधे नहीं गईं. कहा जाता है कि उन्होंने सोचा यदि मेरे भीतर कोई गुण या पुण्य है, तो स्वयं बुद्ध मेरे पास आएंगे. और हुआ भी ऐसा ही भगवान बुद्ध स्वयं उनके कक्ष में उनसे मिलने पहुंचे. 

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बुद्ध और यशोधरा का मौन मिलन

जब बुद्ध उनके कक्ष में पहुंचे, तो यशोधरा ने किसी गुस्से, शिकायत या प्रश्न के बिना उन्हें सम्मान दिया. यह मुलाकात भावनाओं से भरी हुई थी लेकिन शब्दों से शांत. बुद्ध ने उनके धैर्य और त्याग की प्रशंसा की और यह स्वीकार किया कि उन्होंने अपने पूरे समय में उनके प्रति महान सहनशीलता और समर्पण दिखाया.

भिक्षुणी बनने का निर्णय

समय के साथ, जब बौद्ध संघ में महिलाओं को भी प्रवेश की अनुमति मिली, तो यशोधरा ने भी भिक्षुणी जीवन अपनाया.  उन्होंने संघ में शामिल होकर साधना का मार्ग चुना. वे बौद्ध परंपरा में उन महान भिक्षुणियों में गिनी जाती हैं जिन्होंने आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की और दूसरों के लिए प्रेरणा बनीं.

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