Ahoi Ashtami 2021: अहोई अष्टमी का व्रत माताओं द्वारा सांतन की उन्नति, सुख-समृद्धि और लंबी उम्र के लिए रखा जाता है. अहोई अष्टमी अहोई माता यानि मां गौरा की पूजा का दिन है. मां पार्वती का ही स्वरुप अहोई माता हैं. इस व्रत को करने से मां पार्वती और भगवान भोले शंकर प्रसन्न होते हैं और बच्चों को दीर्घायु होने का आशीर्वाद देते हैं. इस व्रत को लेकर कुछ खास नियम हैं. जिन महिलाओं के हाल में संतान पैदा हुई है या फिर उनके बेटे की शादी हो गई है, तो उन्हें अहोई माता का उजमन करना चाहिए.
इस तरह करें उजमन
ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र ने बताया कि जिन माताओं के घर बेटा जन्म हुआ है और वे पहली बार व्रत रख रही हैं या फिर जिनके बेटे का विवाह हुआ हो उन्हें अहोई माता का उजमन जरूर करना चाहिए. उजमन के लिए एक थाली में सात जगह चार–चार पूडियां रखकर उन पर थोड़ा-थोड़ा हलवा रखें. इसके साथ ही एक साड़ी और ब्लाउज और उस पर सामर्थ अनुसार दक्षिणा रखने के बाद थाली के चारों ओर हाथ फेरें. उसके बाद श्रद्धा पूर्वक सासू मां के चरण स्पर्श कर वह सामान उन्हें दे दें. जो वस्त्र और दक्षिणा में दिया गया सामान है, वे सासू मां अपने पास रखें तथा हलवा व पूड़ी का बायना बांट दें. यदि संभव हो तो बहन या बेटियों के यहां बायना भेजना चाहिए.
पूजा शुभ मुहूर्त
28 अक्टूबर को अष्टमी तिथि 12 बजकर 51 मिनट पर लगेगी. इस दिन गुरु-पुष्य योग बन रहा है, जो पूजा और शुभ कार्यों के लिए शुभ फलदायी होता है. अहोई अष्टमी पूजन का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 40 मिनट से रात 8 बजकर 50 मिनट तक है. वहीं शाम 5 बजकर 03 मिनट से 6 बजकर 39 मिनट तक मेष लग्न रहेगी जिसे चर लग्न कहते हैं, इसमें पूजा करना शुभ नहीं माना जाता है.
इस तरह करें पूजा
अहोई अष्टमी के दिन अहोई देवी के साथ सेई और सेई के बच्चों की पूजा का विधान है. इस दिन सूर्यास्त के बाद जब तारे निकल जाते हैं तो अहोई माता की पूजा प्रारंभ होती है. सबसे पहले जमीन को साफ करके पूजा की चौकी बनाई जाती है. फिर एक लोटे में जलकर उसे कलश की भांति चौकी के एक कोने पर रखें और भक्ति भाव से पूजा करें. इसके बाद बाल-बच्चों के कल्याण की कामना करें. साथ ही अहोई अष्टमी के व्रत कथा का श्रद्धा भाव से सुनें. पूजा के लिए माताएं चांदी की एक अहोई भी बना सकती हैं, जिसे बोलचाल की भाषा में स्याऊ भी कहते हैं. उसमें चांदी के दो मोती डालकर विशेष पूजन किया जाता है. जिस प्रकार गले के हार में पैंडिल लगा होता है उसी प्रकार चांदी की अहोई डलवानी चाहिए और डोरे में चांदी के दाने पिरोने चाहिए. फिर अहोई की रोली, चावल, दूध व भात से पूजा करें. जल से भरे लोटे पर सातिया बना लें. एक कटोरी में हलवा और रुपए निकालकर रख दें और गेहूं के सात दाने लेकर अहोई माता की कथा सुनने के बाद अहोई की माला गले में पहन लें. अब पूजा के स्थान पर रखे पैसों को सास के चरण छूकर उन्हें दे दें. इसके बाद चंद्रमा को जल चढ़ाकर व्रत खोल लें. इस व्रत पर धारण की गई माला को दिवाली के बाद किसी शुभ अहोई को गले से उतारकर उसका गुड़ से भोग लगाएं और जल से छीटें देकर रख दें. सास को रोली तिलक लगाकर चरण स्पर्श करते हुए व्रत का उद्यापन करें.