भारतीय सिनेमा ने हमेशा से सामाजिक मुद्दों को पर्दे पर उतारकर समाज को आईना दिखाने का काम किया है. पर मुस्लिम समाज में प्रचलित रहे तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) जैसे संवेदनशील विषय पर फिल्में बनाना हमेशा से विवादास्पद रहा है. शाह बानो के चर्चित केस पर हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'हक' ने इसी मुद्दे को फिर से उठाने की कोशिश की है. फिल्म को क्रिटिक्स ने सराहा, पर बॉक्स ऑफिस पर यह बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई.
इसके विपरीत, 1982 में रिलीज हुई क्लासिक फिल्म 'निकाह' ने तीन तलाक को पहली बार मुख्यधारा में चर्चित किया और जबरदस्त सफलता हासिल की थी. 'निकाह' का मूल नाम 'तलाक-तलाक-तलाक' रखा गया था, लेकिन मुस्लिम संगठनों की आपत्ति और सलाह पर इसे बदल दिया गया. कहा गया कि ये तीन शब्द कहने के साथ ही शादी टूट जाती है. आज के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में, जहां 2019 में तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है, इन दोनों फिल्मों की तुलना करना रोचक है. हम समझने की कोशिश करेंगे कि क्यों 'निकाह' एक कल्ट क्लासिक बनी, जबकि 'हक' की चर्चा तक नहीं हुई.
'निकाह' की रिलीज , एक क्रांतिकारी कदम
1982 में निर्देशक बी.आर. चोपड़ा द्वारा बनाई गई 'निकाह' भारतीय सिनेमा की उन फिल्मों में से एक है, जिन्होंने सामाजिक सुधार को मनोरंजन के साथ जोड़ा. बीआर चोपड़ा की हर फिल्म में एक सामाजिक मुद्दा मौजूद रहता था. फिल्म की कहानी नीलोफर (सलमा आगा) नामक एक युवती के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखती है. उसकी शादी नवाब (दीपक पराशर) से होती है, लेकिन नवाब की महत्वाकांक्षी प्रकृति और नीलोफर की स्वतंत्र सोच के कारण रिश्ता टूट जाता है. नवाब गुस्से में तलाक-तलाक-तलाक कह देता है. बाद में नीलोफर की शादी वसीम (राज बब्बर) से होती है, लेकिन कहानी में ट्विस्ट आता है जब नवाब पछतावा महसूस करता है और नीलोफर को वापस पाने की कोशिश करता है. इस बहाने फिल्म में तीन तलाक ही नहीं हलाला जैसी परंपराओं पर चोट किया गया.
फिल्म तीन तलाक की प्रथा पर सवाल उठा रही थी. वो प्रथा जो मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तो वैध थी, लेकिन महिलाओं के लिए अन्यायपूर्ण साबित हो रही थी. 'निकाह' की सफलता का राज इसकी मार्मिक कहानी में ही नहीं था. बॉलीवुड में तब डेब्यू कर रहीं पाकिस्तानी अभिनेत्री सलमा आगा का क्रेज और उनके गाए गानों का जादू छाया हुआ था. 'दिल के अरमान आंसुओं में बह गए' और 'फिजा भी है जवां-जवां' के अलावा महेंद्र कपूर की आवाज में गाया 'दिल की ये आरजू थी कोई दिलरुबा मिले' जैसे गाने हर जुबान पर थे. गुलाम अली की प्रसिद्ध गजल 'चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है' को भी इस फिल्म ने लोकप्रियता के चरम पर पहुंचाया.
नाम पर विवाद, तलाक-तलाक-तलाक से निकाह तक
फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त कमाई की थी. लेकिन सफलता के पीछे विवाद भी था. मूल नाम 'तलाक-तलाक-तलाक' होने से मुस्लिम संगठनों में हलचल मच गई. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठनों ने आपत्ति जताई कि यह नाम इस्लामिक प्रथा को बदनाम करेगा. बहुत से लोगों का यह भी मानना था कि फिल्म का नाम तलाक-तलाक-तलाक बोलने से कहीं शादी ही न टूट जाए. आखिरकार, नाम बदलकर प्यार-प्यार-प्यार कर दिया गया. पर फिल्म की मार्केटिंग करने वाले को प्यार-प्यार-प्यार नाम पसंद नहीं आया. बाद फिल्म का नाम 'निकाह' फाइनल किया गया. जिसका अर्थ मुस्लिम धर्म शादी के लिए इस्तेमाल होता है. इस बदलाव ने फिल्म को और अधिक स्वीकार्य बनाया, और यह फिल्म हिंदू और मुस्लिम दोनों ही तबकों में जबरदस्त लोकप्रिय हुई. कहानी, एक मुस्लिम युवती की थी, लेकिन उसके हालात पर आंसू सिनेमाघर में बैठी हर महिला बहा रही थी.
समाज बदल रहा था, निकाह ने गति तेज कर दी
1980 के दशक में भारत में महिलाओं के अधिकारों पर बहस शुरू हो रही थी. शाह बानो केस (1985) पर फैसला अभी आया नहीं था, पर उसकी चर्चा समाज में शुरू हो गई थी. लेकिन 'निकाह' ने तीन तलाक की प्रथा पर बहस को मुख्यधारा में लाकर छोड़ दिया. फिल्म ने दिखाया कि कैसे एक पुरुष का गुस्से में लिया गया निर्णय महिलाओं का जीवन बर्बाद कर सकता है. हालांकि, कुछ क्रिटिक्स ने इसे मेलोड्रामा से भरपूर बताया, लेकिन इसने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को मजबूती दी. देश में कांग्रेस का दौर था जब धर्मनिरपेक्षता की बात होती थी, लेकिन पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप के नाम पर सरकार की हवा निकल जाती थी. 'निकाह' ने बिना राजनीतिक एजेंडे के सामाजिक संदेश दिया, जो इसकी सफलता का कारण बना.
'हक' की कहानी: एक आधुनिक प्रयास
अब बात 2025 में रिलीज हुई 'हक' की. निर्देशक सुपर्ण वर्मा द्वारा बनाई गई यह फिल्म यामी गौतम धर और इमरान हाशमी अभिनीत है. कहानी 1980 के दशक में सेट है और शाजिया बानो (यामी गौतम) की जिंदगी पर आधारित है, जो अपने पति अब्बास (इमरान हाशमी) से तलाक के बाद मेंटेनेंस की मांग करती है. अब्बास दूसरी शादी कर लेता है और 3 बच्चों को सपोर्ट देने से इनकार कर देता है. जब शाजिया कोर्ट जाती है, तो अब्बास तीन तलाक देकर मामला खत्म करने की कोशिश करता है.
फिल्म शाह बानो केस पर आधारित है, जिसपर 1985 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और मुस्लिम महिलाओं को मेंटेनेंस का अधिकार मिला. हालांकि, यह फैसला राजनीतिक दबाव में पलट दिया गया था.'हक' को क्रिटिक्स ने सराहा है. रॉटन टोमेटोज पर इसे 75% रेटिंग मिली, जहां इसे 'जुरिस्प्रूडेंस ऑफ कंपैशन' कहा गया. रेडिट पर रिव्यू में इसे शाह बानो केस का सटीक चित्रण बताया गया, जो कुरान की शिक्षाओं को सही तरीके से दिखाता है कि तलाक आवेग या गुस्से में नहीं होना चाहिए. नवंबर 2025 में सिनेमाघरों में रिलीज होने के बाद यह जल्दी Netflix पर आ गई, लेकिन चर्चा तक नहीं हुई. बॉक्स ऑफिस पर यह मुश्किल से 10 करोड़ कमा पाई, जबकि बजट 30 करोड़ था.
2019 में तीन तलाक बिल पास होने के बाद शायद यह मुद्दा ही पुराना पड़ गया . क्रिटिक्स ने इसे बेहतर बताया क्योंकि यह कानूनी पहलुओं को गहराई से दिखाती है, जैसे कुरान की सूरा अत-तलाक का हवाला, जो तलाक की प्रक्रिया को बताता है.
'हक' की चर्चा क्यों नहीं हुई?
शायद तीन तलाक मुद्दे का सुलझ जाना इसका कारण हो सकता है. या दर्शक राजनीतिक फिल्मों से थक चुके हैं. 'द केरला स्टोरी' जैसी फिल्मों की सफलता से तुलना करें, तो 'हक' में कंट्रोवर्सी कम थी. पर दर्शकों को लगा कि शायद ये फिल्म प्रोपेगेंडा फिल्म है. इसलिए बहुत से लोगों ने इससे दूरी बना ली. पर फिल्म में कोई प्रोपेगेंडा था ही नहीं.
वर्तमान परिवेश में भारत में मुस्लिम महिलाओं के अधिकार मजबूत हुए हैं. तीन तलाक कानून से हजारों महिलाओं को राहत मिली है. 'निकाह' ने भावनात्मक स्तर पर प्रभाव डाला, जबकि 'हक' शिक्षा देती है कि कुरान गुस्से में तलाक देने की इजाजत नहीं देती. लेकिन, शिक्षा अपनी जगह है, फिल्मों में मनोरंजन भी जरूरी है. 'निकाह' की तरह अगर 'हक' में हिट गाने या ड्रामा होता, तो शायद यह अपनी तरफ दर्शकों को और खींच पाती.