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'सुसाइड की ये खबरें मुझे परेशान कर रही हैं...' पढ़ें- IIT छात्रों के नाम, एक आईआईटियन का खुला खत

देशभर के आईआईटीज में पिछले तीन सालों में 40 से अधिक आत्महत्याओं के मामले सामने आए हैं. इनमें से लगभग 30 प्रतिशत घटनाएं आईआईटी कानपुर से जुड़ी बताई जाती हैं. मेरे जितने भी दोस्त अभी कॉलेज में हैं उनसे मैं यह नहीं कहूंगा की दौड़ो मत, क्यूंकि दौड़ोगे नहीं तो पीछे छूटने का डर तुम्हें जकड़ लेगा. मैं कह रहा हूं कि दौड़ो पर अपने आसपास वालों को साथ लेकर दौड़ो...

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तस्वीर में कैद हैं कैंपस के दिनों की यादें (Photo: aajtak.in/Special Permission)
तस्वीर में कैद हैं कैंपस के दिनों की यादें (Photo: aajtak.in/Special Permission)

देश की आईआईटीज में पढ़ रहे मेरे प्यारे साथ‍ियों, आज मैं तुमसे मुखातिब हो रहा हूं. मैं कोई लेखक या साह‍ित्यकार नहीं हूं. इसल‍िए बिना शब्दों का जाल बुने सीधे-सीधे अपनी बात पर आता हूं. आए दिन मेरी नजरों के सामने से `आईआईटी में सुसाइड` की खबर गुजर रही है. शायद ये एल्गोरिदम के कारण है. मगर ये खबर मुझे हर बार उसी तरह तोड़ती है

जैसे कानपुर आईआईटी के कैंपस में मेरे टर्म के दौरान पहली बार ऐसी घटना घटी थी. वो 2024 की जनवरी थी. इस खबर से कंपकंपाती ठंड में भी जैसे मेरे शरीर से 220 वोल्ट का करेंट उतर गया था. मन बेचैन हो उठा था. कई रातों तक सो नहीं सका. कई दिनों तक हर चेहरे पर `डिप्रेशन` तलाश रहा था.

ऐसा लग रहा था कि कहीं मेरा कोई दोस्त भी तो मुझसे अपनी मेंटल सिचुएशन नहीं छुपा रहा. आज भी मैं यही सोचता हूं कि लाखों का सपना जीकर आप इतने बड़े संस्थान में पहुंचे हैं, यहां आकर ग‍िव-अप करना ठीक नहीं है. फ्रेंड्स, मैं कोई भाषण देकर अपनी बात नहीं कहूंगा, इसके लिए आपको मुझे और मेरी जर्नी को जानना होगा. साल 2020 में मैंने जेईई-एडवांस दिया और पहला सपना पूरा हुआ जब मेरी रैंक 2000 के अंदर थी यानी अब मुझे मेरे मनचाहे कॉलेज में एडमिशन मिल सकता था.

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मुझे ब्रांच के लिए भी ज्यादा तकलीफ नहीं उठानी थी. अब मेरा अगला सपना था देश के टॉप संस्थान यानी आईआईटी कानपुर में एंट्री पाना. यहां जाने के लिए मन पहले दिन से ही उत्साहित था. देश के सबसे बड़े कैंपस में से एक, जहां ओपन-एयर थिएटर, खुद की हवाईपट्टी, खेल एवं कला से जुड़े इतने सारे क्लब्स, बेहतरीन लेक्चर हॉल्स, विद्यार्थियों के रहने वाले हर हॉल में कैंटीन और आने जाने की पूरी आजादी... भला कौन ऐसी जगह अपने कॉलेज के 4 साल नहीं बिताना चाहेगा.

खैर, एडमिशन तो हो गया लेकिन कोविड के कारण लगभग एक साल से ज्यादा इंतजार के बाद मुझे 2021 में कैंपस जाने का मौका मिला. अक्टूबर का वो दिन आज भी मुझे हूबहू याद है. मम्मी-पापा भी बहुत खुश थे. सबसे पहले हमने कैंपस के बाहर जहां हिंदी इंग्ल‍िश में आईआईटी लिख हुआ था, पैरेंट्स के साथ फोटो ख‍िंचवाई थी.फिर देखा अंदर छात्रों की लाइन लगी हुई थी. वहां से ई-रिक्शा लेकर अपने हॉस्टल की तरफ बढ़ा. यहां पलकें जैसे झपकने का नाम नहीं ले रही थीं. इतना बड़ा कैंपस, हर तरफ ग्रीनरी, हॉकी, फुटबॉल, क्र‍िकेट के बड़े-बड़े स्पोर्ट्स ग्राउंड्स, स्व‍िमिंग पूल... बस मन में यही चल रहा था कि यहां तो मैं स्व‍िम‍िंग भी सीख लूंगा. कभी कभी क्र‍िकेट या हॉकी खेल लूंगा. फिर पैरेंट्स के जाने के बाद थोड़ा अकेलापन सा महसूस हुआ. लेकिन वो भी जल्द ही दूर हो गया. यहां जल्दी ही दोस्त बन गए. फिर यहां शुरू हुआ नया जीवन...अपने हॉल से रात को 10 बजे किसी दूसरे दोस्त से मिलने निकल जाना, लाइब्रेरी के सामने बन रहे फाउंटेन पर बातों-बातों में 1-2 घंटे यूं ही निकाल देना, टहलते-टहलते कैंपस के दूसरे कोने में आ जाना फिर वापस जाने के लिए रास्ता पूछते-पूछते जाना.

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रात को 12 बजे भूख लगने पर कैंटीन में मैगी खा लेना, कैंपस की ये जीवनशैली आजादी का अहसास करा रही थी. टीनेज की तमाम पाबंदियां अब यहां नहीं थी. कोव‍िड के कारण क्लासेज अभी भी ऑनलाइन थीं. कैंपस की तमाम चकाचौंध में उसी दौर में मेरे कानों में एक शब्द और पड़ा था. वो था स्ट्रेस... ये स्ट्रेस पहली बार मैंने फरवरी 2022 में महसूस कर लिया. उस दिन मेरी पहली ऑफलाइन क्लास लेक्चर हॉल में हुई. यहां 600 बच्चे बैठे थे,

ये कॉमन कोर्स था. तब लगा कि ग्रेड लाना है तो इन सबसे सीधा कॉम्पट‍िशन होगा. वैसे इसके लिए भी मैं मेंटली तैयार था. फिर दूसरी बार अगस्त 2022 में इंटर्नश‍िप मिलनी थी, तब भी लगा कि यार मैं तो काफी पीछे हूं. ये स्ट्रेस का दूसरा दौर था. मुझे पता चल चुका था कि इंटर्नश‍िप के लिए आपको पढ़ाई के अलावा और चीजें सीखनी होंगी. 1200 में से करीब 400 को इंटर्न बनाया जाता है, तब लगा कि अब उस वन थर्ड की रेस में मुझे आना पड़ेगा. उसके लिए भी मैंने तैयारी शुरू कर दी थी. अब तीसरी चीज आपको पता ही होगी कि कैसे थर्ड इयर में आते हो तो किसी न क‍िसी एक्स्ट्रा करिकुलर एक्ट‍िव‍िटी में आप अच्छा पद लेते हो. मैंने हिंदी साहित्य सभा जॉइन किया,

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यहां पहले साल 2022 में सेक्रेटरी था, उस सेकेंड इयर के खत्म होते-होते कॉओर्ड‍िनेटर बनने का कॉम्पिट‍िशन आ गया. हर फील्ड में मैं मन लगाकर काम कर रहा था. फैमिली-दोस्तों से बातचीत, हिंदी साहित्य सभा की एक्ट‍िव‍िटी और पढ़ाई में समय बीत रहा था. अब इस पूरी बात के साथ मैं वो दिन भी बता दूं जब पहली बार मैंने मौत का भय महसूस किया था. तब मैं फोर्थ इयर में था. पीएचडी छात्र ने सुसाइड कर लिया था. उसे लेकर स्टूडेंट प्रोटेस्ट कर रहे थे. वहां डिमांड हो रही थी कि सिस्टम को बदला जाए.मैं ये खबर सुनकर हिल गया था. लग रहा था कि इतना बड़ा संस्थान है, इतने तरीके हैं लोगों से मिलने जुलने के, फिर कोई ऐसा कदम क्यों उठा लेता है. मैं कैंपस लाइफ के दूसरे पहलू यानी अच्छी सीपीआई के लिए टफ कंपटीशन, इंटर्न सीजन से पहले रिज्यूमे को भर सकने का प्रयास, `जीवन में आगे क्या करना है`

सवाल का जवाब ढूंढना, अपने पसंदीदा क्लब में ऊंचा पद हासिल करना आदि पर सोच रहा था. क्या कैंपस की ये दौड़ बहुत तेज थी या है? जवाब मिलता- हां! क्या ये दौड़ मानसिक तौर पर विद्यार्थी को झकझोरती है? जवाब- हां! क्या इस दौड़ का अंधापन मानसिक अवसाद का कारण बनता है? फिर जवाब मिला- हां!

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इस बात ने मुझे इतना परेशान किया कि कैंपस में एक प्रतियोगिता के लिए मैंने अपने दोस्तों के साथ बढ़ते अवसाद पर एक रिपोर्ट लिखी, जिसकी फाइंड‍िंग के कई पॉइंट्स मुझे झकझोर गए. रिपोर्ट में सामने आया कि लगभग 35% विद्यार्थियों ने 1 से 10 के स्केल पर मानक में अपने मानसिक स्वास्थ्य को 5 से कम अंक दिए थे. इसके अलावा पढ़ाई का बढ़ता बोझ (71.5%), सामाजिक अलगाव (38.6%), एवं आपसी रिश्तों से जुड़ी समस्याएं (30.4%) मुख्य रूप से अवसाद का कारण बनकर सामने आई थीं.

रिपोर्ट में लगभग 42% लोगों में अकेलापन और 52% लोगों में तनाव जैसी समस्याएं निकलकर आईं थीं. सभी आंकड़े एक तरफ, लेकिन 42% लोगों का यह कहना कि उन्हें कैंपस में अकेलापन महसूस होता है, मेरे लिए बहुत चौकाने वाली बात थी. उस दिन मुझे समझ आया कि समस्या जितना शायद हम समझते हैं उससे कई ज्यादा गहरी है. देख‍िए साथ ही मैं ये जरूर कहता चलूं कि मेरी शिकायत कभी आईआईटीज से नहीं है, हर संस्थान में समस्याएं हैं, बिलकुल हैं और उनका निवारण भी शीघ्रता से होना चाहिए लेकिन मेरी शिकायत खुद से भी है, बच्चों से है, उनके दोस्तों से है, माता-पिता और रिश्तेदारों से है. मेरी श‍िकायत हमारे समाज से है जो शायद दौड़ को एहमियत देते देते दौड़ने वाले की एहमियत को पहचानना भूल जाते हैं.

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मेरे जितने भी दोस्त अभी कॉलेज में हैं उनसे मैं यह नहीं कहूंगा की दौड़ो मत, क्यूंकि दौड़ोगे नहीं तो पीछे छूटने का डर तुम्हें जकड़ लेगा. मैं कह रहा हूं कि दौड़ो पर अपने आसपास वालों को साथ लेकर दौड़ो और कोशिश करो कि वो भी जीवन में एक गति पकड़ पाएं. तुम दौड़ो पर जिस दिन मन करे किसी पेड़ की छांव में बैठने का तो बैठ लो, थोड़ा आराम कर लो क्यूंकि यह समझना जरूरी है कि जिस दौड़ में तुम हो वो कोई 100-200 मीटर की स्प्रिंट नहीं है बल्कि बहुत लम्बी मैराथन है. तुम दौड़ना पर कभी जल्दबाजी में गिर जाओ, या कहीं टकरा जाओ तो इतने रिश्ते बनाकर रखो. जो तुम्हारी दौड़ देख रहे हैं न केवल उनसे रिश्ते बनाकर रखो बल्कि उनसे भी जो तुम्हारे साथ दौड़ रहे हैं. ये वहीं हैं जो ग‍िरने पर तुम्हें वापस उठाने में तुम्हारी मदद करेंगे.

सबसे जरूरी अगर इस दौड़ में मन न लगे, कोई और दौड़ पकड़नी हो तो घबराना मत, पकड़ लेना, भले ही वहां कम लोग दौड़ रहे हों या साथ वाले मना कर रहे हों. क्योंकि जब जीतोगे तो सब ठीक भी हो जाएगा और यदि हार भी गए तो प्रयास न करने का असंतोष मन से दूर हो जाएगा. सच कह रहा हूं दोस्तों, मैं मानता हूं कि कैंपस की यह दौड़ आसान नहीं रहती. एक व्यक्ति जो शायद अपने स्कूल का टॉपर होता है अचानक ही इस रेस में अपने जैसे या अपने से अधिक प्रतिभाशाली लोगों के साथ दौड़ रहा होता है. इसमें उसका हर चीज में अच्छा कर पाना आसान नहीं होता. किसी की अगर सीपीआई बहुत अच्छी हो जाती है तो कई बार वह कल्चरल क्लब्स का हिस्सा नहीं बन पाता, जो उनमें बहुत अच्छा कर लेता है वो कई बार एक्स्ट्रा-प्रोजेक्ट्स नहीं ले पाता, जो अच्छी इंटर्न के लिए सब कर पाता है वह शायद मेरी तरह स्विमिंग सीखने का सपना पीछे छोड़ देता है.

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कोई दुर्लभ व्यक्ति सब कुछ कर ले तो उसको शायद यह मलाल रह जाता है की वह अपनी प्रेमी/प्रेमिका नहीं ढूंढ पाया. मैंने तो अपने अनुभवों से यही सीखा है कि हर किसी से कुछ न कुछ तो छूट ही जाता है जो कि लाज‍िमी भी है. और शायद इतनी बड़ी बात भी नहीं. लेकिन कैंपस के उस युवा/युवती के मन में उतरकर देखूं तो इनमें से हर एक चीज जरूरी लगती है. इसका मन पर कहीं न कहीं असर पड़ता ही है. फिर भी यही कहूंगा कि वहां के माहौल में आप जैसा भी फील कर रहे हों लेकिन कैंपस से बाहर आकर इसे बहुत म‍िस करोगे. मैं इसका गवाह हूं.

वैसे मैं एक बात पैरेंट्स और समाज से भी कहना चाहूंगा कि आईआईटी की तैयारी और उसके अंदर का जीवन जितना मूवीज, वेब सीरीज या मीडिया में दिखाया जाता है, उससे अंदाजा न लगाएं. आप अपने बच्चे को अगर आईआईटी के बजाय किसी भी सफर में भेज रहे हैं तो तैयारी के दिनों में ही उसे संतुलन साध के चलना स‍िखाइए. बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ यह भी बताएं कि दोस्त कितने जरूरी हैं,

उन्हें साथ लेकर चलना कितना जरूरी है, उन्हें यह सिखाएं कि हारना कोई बुरी बात नहीं है. कोशिश करते रहने का दौर आएगा और चला भी जायेगा. उन्हें बताया जाए कि जीवन में तमाम कलाओं और खेलों का शौक होना कितना जरूरी है. उन्हें ये भी महसूस कराया जाए की जब समस्या न संभल पा रही हो तो माता-पिता से बात कर लो, थोड़ा डांटेंगे पर जो हिम्मत वह दे पाएंगे शायद ही कहीं और से तुम्हें मिल पाए. यह सब कर पाना आसान नहीं होगा, हमारा देश भावुक कहा जाता है लेकिन घरों में उन भावनाओं को एक दूसरे से कह पाना नहीं सिखाया जाता. फिर भी मैं कहूंगा कि बेहतरी के लिए कोशिश होती रहनी चाहिए, क्यों न इसकी शुरुआत खुद से ही की जाए.

इन 76 सालों में आईआईटी छात्रों ने देश और दुनिया भर में अपना लोहा मनवाया है. भारतीय आईआईटी आज दुनिया की `सीईओ फैक्ट्री` बन चुके हैं. यहां से पढ़े छात्र गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी 5 ट्रिलियन डॉलर की कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं. भारत के आधे से ज्यादा `यूनिकॉर्न` स्टार्टअप्स इन्हीं के दिमाग की उपज हैं, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर 15 लाख से अधिक नौकरियां पैदा की हैं. भारत के 20% शोध आउटपुट के साथ वाला ये संस्थान आज दुनिया का इकलौता गैर-अमेरिकी विश्वविद्यालय है जो ग्लोबल स्टार्टअप रैंकिंग में टॉप-5 में शामिल है.

यही कारण है कि भारतीय मध्यमवर्गीय घरों में शायद ही ऐसा कोई परिवार हो जहां आईआईटी हासिल करने का सपना न देखा या दिखाया जाता हो. आज जब मैं आईआईटी के इस भव्य मानचित्र की पिछले कुछ सालों से बदलती प्रवृत्ति को देखता हूं तो मन थोड़ा विचलित हो उठता है. मुझे बस यही लगता है की उस 76 साल पहले देखे गए सपने को पूरा करने में कहीं हम असफल न रह जाएं. इसल‍िए इस सपने को तोड़ने के बजाय संस्थानों के सिस्टम को दुरुस्त करके इसे और मजबूत बनाया जाए. अंत मैं अपने साथ‍ियों से कहूंगा कि आप आज जो आईआईटी में हैं न, आप न जाने कितनों की उम्मीद हैं. आज टूटते हैं तो न जाने कितने मासूमों की उम्मीद टूटने लगती है.
(इस लेख में लेखक के निजी व‍िचार हैं)

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