हर साल, लाखों भारतीय युवा सूरज के उगने से पहले ही जाग जाते हैं. वे ट्यूबलाइट्स की धुंधली रोशनी में, मुड़े हुए पन्नों वाली पुरानी किताबों और हाथ से लिखे नोट्स के साथ बैठकर पढ़ाई करते हैं, जिसके लिए वे शादियों में जाना छोड़ देते हैं, अपनी दोस्ती कुर्बान कर देते हैं. वे बुखार, थकान और गम को भूलकर तपती गर्मी में बिजली कटौती की मार झेलते हुए भी पढ़ाई जारी रखते हैं. वे यह सब सिर्फ एक सुबह के लिए करते हैं परीक्षा की उस एक सुबह के लिए.
और कहीं दूर एक बंद, वातानुकूलित कमरे में बैठा कोई शख्स यह तय कर रहा होता है कि वह एक सुबह उनकी तकदीर संवारेगी या उनके सपनों को ढहा देगी. यह कहानी है भारत की सबसे बड़ी परीक्षाओं के परदे के पीछे की. यह दास्तां है कि कैसे बेहद मुस्तैदी और नेक इरादों के साथ खड़ा किया गया एक पूरा सिस्टम, आज मानवीय लालच की भेंट चढ़कर भीतर ही भीतर दरक रहा है.
आप शायद यह कल्पना करते होंगे कि किसी यूनिवर्सिटी के दफ्तर में शांति से बैठे किसी प्रोफेसर को एक दिन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) से अचानक एक फोन आता है. आप पूरी तरह से गलत भी नहीं हैं, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा चुनिंदा होती है. NTA हर किसी को आमंत्रित नहीं करता. पेपर सेटर बनने की दौड़ में शामिल होने के लिए भी, आपके पास सालों का अनुभव होना जरूरी है. देश के सर्वोच्च संस्थानों जैसे IITs, AIIMS, केंद्रीय विश्वविद्यालयों या NCERT में कम से कम 10 से 15 साल तक पढ़ाने का अनुभव. आपका एक रूतबा होना चाहिए, एक प्रतिष्ठा और एक भरोसा होना चाहिए.
यह भी पढ़ें: यही है हैंड रिटेन NEET का गेस पेपर, जो एग्जाम से ठीक पहले हुआ था लीक
इससे पहले कि आप किसी एक सवाल को हाथ भी लगाएं, आपको एक हलफनामे पर दस्तखत करने होते हैं. यह एक कानूनी वादा होता है. आप कसम खाते हैं कि आपके परिवार का कोई भी सदस्य यह परीक्षा नहीं दे रहा है. आप कसम खाते हैं कि आपका किसी भी कोचिंग सेंटर से कोई संबंध नहीं है. सीधे शब्दों में कहें तो आप कसम खाते हैं कि आपका दामन पूरी तरह साफ है, यह सुनने में बहुत आश्वस्त करने वाला लगता है और इसे बनाया भी इसीलिए गया है कि इस पर भरोसा किया जा सके, लेकिन एक दस्तखत की ताकत सिर्फ उतनी ही होती है, जितनी उसे करने वाले के जमीर की होती है.
पेपर कैसे तैयार किया जाता है
नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) एक ऐसी व्यवस्था का उपयोग करती है जिसे हर किसी की सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है. यहां तक कि खुद NTA की सुरक्षा को भी. कोई भी एक व्यक्ति पूरा प्रश्नपत्र नहीं लिखता, इसके बजाय, देश भर के सैकड़ों प्रमाणित विशेषज्ञों में से प्रत्येक से कुछ सवाल भेजने के लिए कहा जाता है. यह एक बड़ी पहेली के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह होता है जिसे कोई भी पूरी तरह से नहीं देख सकता.
हो सकता है कि चेन्नई का कोई प्रोफेसर इलेक्ट्रोस्टैटिक्स (Electrostatics) पर दस सवाल लिखे, और लखनऊ का कोई वैज्ञानिक सेल बायोलॉजी (Cell Biology) पर कुछ सवाल भेजे. उनमें से किसी को भी यह नहीं पता होता कि कौन से सवाल वाकई अंतिम परीक्षा का हिस्सा बनेंगे. इसके पीछे का विचार बेहद सीधा और व्यावहारिक है. यदि कोई भी पूरी तस्वीर नहीं देख पाएगा, तो कोई भी पूरी पेपर लीक नहीं कर पाएगा.
फिर आती है मॉडरेशन कमेटी सीनियर सब्जेक्ट स्पेशलिस्ट्स का एक शांत, लेकिन ताकतवर ग्रुप, जो भेजे गए हर सवाल की बारीकी से जांच करता है. वे गलतियों, किसी भी तरह की अस्पष्टता और निष्पक्षता की जांच करते हैं. वे हर सवाल को एक कठिनाई का स्तर देते हैं. वे क्वालिटी के रखवाले होते हैं.
यह भी पढ़ें: NEET पेपर लीक का सबसे बड़ा सवाल...ऐसे टीचरों की NTA में एंट्री हुई कैसे? किन बड़े अधिकारियों के संपर्क में थे
और फिर लॉकडाउन।
बिना खिड़कियों वाला वह कमरा
जब पेपर लगभग तैयार हो जाता है, तो कुछ असाधारण घटित होता है, पेपर बनाने वाले, मॉडरेटर और अनुवादक जो अंतिम रूप से इस काम से जुड़े होते हैं उन्हें एक सुरक्षित केंद्र में ले जाया जाता है. यह एक कमरा होता है या फिर कमरों की एक पूरी श्रृंखलजो बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कटा हुआ होता है. उनके फोन ले लिए जाते हैं, उनकी स्मार्टवॉच, उनके लैपटॉप. हर वो डिवाइस जो बाहरी दुनिया तक जानकारी की एक भनक भी पहुंचा सकता हो, जब्त कर लिया जाता है.
उस कमरे में कोई पारदर्शी खिड़की नहीं होती, नेटवर्क सिग्नल्स को जैम कर दिया जाता है. भीतर मौजूद कंप्यूटर इंटरनेट से नहीं जुड़ सकते. उस पूरी तरह सील और खामोश कमरे में, अंतिम प्रश्नपत्र अपना आकार लेता है उसे संकलित किया जाता है, जांचा जाता है, तेरह भाषाओं में उसका अनुवाद होता है, और फिर उसे तिजोरियों में बंद कर दिया जाता है.
यह सुनने में किसी जासूसी फिल्म के सीन जैसा लगता है और एक मायने में, यह है भी, क्योंकि एनटीए यह बात बखूबी जानती है और हमेशा से जानती आई है कि उस कमरे के भीतर जो बंद है, सही अपराधियों के लिए उसकी कीमत करोड़ों रुपये है.
जहां सपना टूट जाता है
और फिर भी, इन सब के बावजूद जांच-पड़ताल, हलफ़नामे, एकांत, जैमर, एयर-गैप्ड कंप्यूटर लीक हो ही गए. CBI की जांच शुरू हो गई. इसके बाद परीक्षाएँ रद्द कर दी गईं और लाखों छात्रों से, जिन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया था, कहा गया कि वे वापस आएं और फिर से कोशिश करें.
आखिर यह सब कैसे होता है?
पहला घाव भरोसे का टूटना है, इस पैनल में शामिल कुछ प्रोफेसरों ने यानी उन्हीं लोगों ने जिन्होंने उन हलफनामों पर दस्तखत किए थे, बेहद खामोशी से इन सवालों को कोचिंग नेटवर्कों तक पहुंचा दिया. यह काम किसी जाहिर तरीके से नहीं किया गया. उन्होंने इन चोरी किए गए सवालों को "अति संभावित विषय" या "गेस पेपर्स" का जामा पहनाकर पेश किया. छात्रों ने इन सामग्रियों के लिए हजारों रुपये चुकाए, इस बात से पूरी तरह अनजान कि वे कुछ ऐसा खरीद रहे हैं, जिसका उस सील बंद कमरे से बाहर अस्तित्व होना ही नहीं चाहिए था.
दूसरा घाव इस पूरे सिस्टम के ढांचे से जुड़ा है, ट्रांसलेटर्स जो इस प्रश्नपत्र को क्षेत्रीय भाषाओं में बदलते हैं, अक्सर परीक्षा की तारीख के सबसे करीब रहकर काम करते हैं. वे सबसे कम निगरानी और समय के सबसे भारी दबाव के बीच, इस प्रश्नपत्र के सबसे पूर्ण रूप को संभालते हैं. संगठित सिंडिकेट्स ने इस कमजोर पल को निशाना बनाना सीख लिया है, यह एक ऐसी श्रृंखला की सबसे कमजोर कड़ी है, जिसके बारे में माना जाता था कि उसकी कोई भी कड़ी कमजोर नहीं है.
और तीसरा घाव जो शायद सबसे गहरा है वह यह है कि एनटीए के पास इस काम के लिए अपना कोई स्थायी स्टाफहै ही नहीं, भारत की सबसे सम्मानित परीक्षा संस्था, यूपीएससीके पास पेपर सेट करने वाले विशेषज्ञों का अपना एक संप्रभु और स्थायी कैडर (Sovereign, Permanent Cadre) होता है. ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपना पूरा करियर गोपनीयता को समर्पित कर दिया है. ये ऐसे लोग हैं जो संस्था के प्रति जवाबदेह होते हैं.
इसके विपरीत, NTA उधार लेता है, यह लोगों को प्रतिनियुक्ति पर लाता है. यह कॉन्ट्रैक्ट पर काम करवाता है और हकीकत यही है कि जब आप ईमानदारी का निर्माण करने के बजाय उसे दूसरों से उधार मांगकर लाते हैं, तो आप सिस्टम में ऐसे खाली छेद छोड़ देते हैं जिन्हें मानवीय लालच बड़ी खुशी-खुशी भर देता है.
इसकी कीमत क्या चुकानी पड़ती है
आइए इस बात को बिल्कुल साफ तौर पर समझें कि जब कोई परीक्षा पत्र लीक होता है, तो असल में नुकसान किस चीज का होता है. बिहार के एक छोटे से शहर की वह लड़की जिसने दो साल तक जी-तोड़ पढ़ाई की, वह सिर्फ एक रैंक या नंबर नहीं खोती. वह इस विश्वास को खो देती है कि मेहनत का कोई मोल होता है, वह इस भरोसे को खो देती है कि यह व्यवस्था उसे देख भी पा रही है.
एक परिवार जिसने अपने बेटे को कोचिंग क्लास भेजने के लिए कर्ज लिया था, वह सिर्फ पैसा नहीं खोता. वे उस उम्मीद और कहानी को खो देते हैं जो वे खुद से कहते आए थे कि त्याग का फल हमेशा मीठा होता है.
और एक पूरा देश जो योग्यता के दम पर अपना भविष्य गढ़ता है, वह कुछ ऐसा खो देता है जिसे मापना नामुमकिन है. उस पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता, जिसे देश की सबसे बेहतरीन प्रतिभाओं को चुनने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. एनटीए (NTA) का यह पूरा ढांचा, कागजों और सिद्धांतों में बेहद आधुनिक और जटिल है. लेकिन हकीकत में, इसने हमें एक बेहद असहज करने वाले सच से रूबरू कराया है कि कोई भी व्यवस्था, चाहे उसे कितनी भी सावधानी से क्यों न तैयार किया गया हो, उसे निभाने वाले इंसानों की ईमानदारी और प्रतिबद्धता के बिना जिंदा नहीं रह सकती.
सवालों को एक ऐसे कमरे में बंद किया गया था जिसमें कोई खिड़की तक नहीं थी, लेकिन फिर भी, वे बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ ही ले गए, और इसके साथ ही, एक अकेली स्टडी लैंप की रोशनी में अंधेरे कमरों में बुने गए लाखों सपने खामोशी से बिखर कर ढह गए. इस व्यवस्था में सुधार अब कोई विकल्प नहीं है. यह बेहद जरूरी और तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि इस वक्त भी कहीं न कहीं, कोई और छात्र अपनी आंखें फोड़कर पढ़ाई कर रहा है और वह इस बेरहम हकीकत से कहीं बेहतर का हकदार है.
यह भी पढ़ें: NEET Paper Leak: गिरफ्तार प्रोफेसर कुलकर्णी, जांच में बड़ा खुलासा