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हिंदुत्व के मुद्दे पर घिरी शिवसेना ने चला 'मुंबई' दांव, 1985 में भी बना था 'ब्रह्मास्त्र'

मराठी भाषियों के हक की बात पर बनी शिवसेना के लिए भी 'मुंबई' मुद्दा कई बार काम आया. 1978 से 1985 तक जब शिवसेना लगातार चुनाव हार रही थी, तब 1985 के बीएमसी चुनाव के पहले तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री वसंत दादा पाटिल ने किसी भाषण में कहा कि मुंबई को महाराष्ट्र से तोड़ने की कोशिश हो रही है. शिवसेना ने इसी मुद्दे पर बीएमसी का चुनाव लड़ा. इस चुनाव ने शिवसेना को मुंबई की सत्ता तो दिलवा ही दी, साथ ही राजनीतिक पुर्नजन्म भी दे दिया.

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महाराष्ट्र में शिवसेना ने बीजेपी को मुंबई के मुद्दे पर घेरने का बनाया प्लान. महाराष्ट्र में शिवसेना ने बीजेपी को मुंबई के मुद्दे पर घेरने का बनाया प्लान.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • शिवसेना ने उठाया मुंबई को अलग करने का मुद्दा
  • मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की कोशिश में बीजेपी- शिवसेना

मुंबई में मुंबई को लेकर राजनीति फिर से चमक रही है. हनुमान चालीसा, हिंदुत्व के मुद्दे पर घिरी शिवसेना ने चक्रव्यूह भेदने के लिए मुंबई का अस्त्र निकालने की कोशिश की है. गुजरात महाराष्ट्र के विभाजन के वक्त मुंबई को महाराष्ट्र से जोड़ने के लिए जो आंदोलन हुआ उसमें 105 लोग मारे गए थे. ये इतिहास मुंबई में रहने वाले मराठी भाषियों के लिए आज भी भावनाओं से जुड़ा मुद्दा है. और मुंबई जैसे शहर पर अपना वर्चस्व रखने के लिए शिवसेना के लिए एक राजनीतिक मुद्दा है. ऐसे में हाल ही में हुई रैली में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया कि बीजेपी मुंबई को महाराष्ट्र से तोड़ने की कोशिश कर रही है.

उद्धव ठाकरे को ये मौका मिला बीजेपी नेता और पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस के भाषण से, जिसमें उन्होंने कहा था कि वो मुंबई को स्वतंत्र कराना चाहते हैं. हालांकि तुरंत सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि वो मुंबई को शिवसेना के भ्रष्टाचार से स्वतंत्र कराना चाहते हैं. लेकिन उद्धव ठाकरे ने मुद्दा उठाते हुए कहा कि फडणवीस जानबूझकर ये बोले हैं और बीजेपी की पुरानी मंशा रही है कि मुंबई महाराष्ट्र से अलग हो. इससे पहले भी शिवसेना कई बार केंद्र सरकार पर आरोप लगा चुकी है कि वो मुंबई की अहमियत कम करने की कोशिश कर रही है.
 
क्या है इतिहास ...

दरअसल, 50 के दशक में जब भाषावार प्रांत रचना की नीति पर मराठी भाषियों का महाराष्ट्र और गुजराती भाषियों का गुजरात बनने की प्रक्रिया शुरू हुई तब मुंबई को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का प्रस्ताव था. इसके विरोध में महाराष्ट्र में पूरी विपक्षी पार्टियों ने साथ आकर संयुक्त महाराष्ट्र समिति बनाई और इस मुद्दे पर हुए आंदोलन में 105 आंदोलनकारी पुलिस फायरिंग में मारे गए. आखिरकार केंद्र सरकार को मुंबई को केंद्रशासित बनाने का प्रस्ताव छोड़ना पड़ा लेकिन तभी से मुंबई में रहने वाले मराठी भाषियों के लिए ये भावनात्मक मुद्दा रहा है. मराठी भाषियों के हक की बात पर बनी शिवसेना के लिए भी ये भावनाएं कई बार काम आई हैं. 1978 से 1985 जब शिवसेना लगातार चुनाव हार रही थी, तब 1985 के बीएमसी चुनाव के पहले तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री वसंत दादा पाटिल ने किसी भाषण में कहा कि मुंबई को महाराष्ट्र से तोड़ने की कोशिश हो रही है. शिवसेना ने इसी मुद्दे पर बीएमसी का चुनाव लड़ा. इस चुनाव ने शिवसेना को मुंबई की सत्ता तो दिलवा ही दी लेकिन साथ ही राजनीतिक पुर्नजन्म भी दे दिया. तब से बीएमसी पर शिवसेना का दबदबा कायम है .

अब क्या हो रहा है...

शिवसेना का मुंबई में कोर वोटबैंक मराठी वोटरों का है. हिंदुत्व के नाम पर उनको वोट देने वाले उत्तर भारतीय और गुजराती भाषी 2014 के बाद बीजेपी के साथ चले गए हैं. वहीं अब तक मराठी के मुद्दे पर राजनीति करने वाले राज ठाकरे ने भी हिंदुत्व का रास्ता अपनाया है. ऐसे में शिवसेना को अपना कोर वोट बैंक बचाना जरूरी बन गया है जहां उसे लगता है कि हिंदुत्व के नारे पर राज ठाकरे सेंध लगा सकते हैं. वैसे भी मुंबई में पहले की तरह मराठी भाषी बहुसंख्या में नहीं है. 2011 की जनगणना के अनुसार मुंबई में मराठी भाषी 40% से कम हैं. 2017 में हुए बीएमसी चुनाव में शिवसेना और बीजेपी में कांटे की टक्कर रही. दोनों के बीच वोट प्रतिशत का फर्क सिर्फ एक प्रतिशत का था. ऐसे में अपने वोटर को बचाने के लिए शिवसेना ने मुंबई का तोड़ निकाला है. शिवसेना ने हमेशा इसे एक ब्रह्मास्र की तरह इस्तेमाल किया है. संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में एक नारा हमेशा लगता था- 'मुंबई हमारी, नहीं किसी के बाप की'. राजनीतिक दृष्टि से शिवसेना यही नारा दोबारा देना चाहती है.

आने वाले चुनाव ...

कुछ ही महीनों में बीएमसी के चुनाव होंगे. 1997 से लेकर अबतक शिवसेना की बीएमसी पर सत्ता रही है. ऐसे मे उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री होते हुए अगर बीएमसी की सत्ता खिसकी तो शिवसेना के लिए राजनीतिक मुश्किलें बढ़ेंगी. दूसरी ओर बीजेपी ने हिंदुत्व के नाम पर राजनीति तेज कर दी है. बीजेपी हिंदुत्व का राग ये कहकर गा रही है कि शिवसेना कांग्रेस के साथ गठबंधन के वजह से अब हिंदुत्ववादी पार्टी नहीं रही. बीजेपी के कोरस में राणा दंपती और राज ठाकरे भी शामिल हैं. ऐसे में शिवसेना एकबार फिर बैक टू बेसिक्स यानी अपने पुराने मुद्दे के सहारे कोशिश कर रही है कि वो वोट बैंक बना रहे जिस पर पार्टी का ढांचा खड़ा है. महाराष्ट्र बनने के 62 साल के बाद एकबार फिर मुंबई का राजनीतिक नारा लग रहा है.


 

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