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शिंदे संग चले राज ठाकरे... महाराष्ट्र निगम चुनाव के गठबंधन पर अब भारी होती अवसरवादी राजनीति

नगर निगम चुनाव और नतीजों ने महाराष्ट्र में सारे राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं. उद्धव ठाकरे के साथ गठबंधन करने वाले राज ठाकरे को डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने अपने साथ मिला लिया है, और सत्ताधारी महायुति में सहयोगी बीजेपी को ही चुनौती दे रहे हैं.

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कल्याण-डोंबिवली में एकनाथ शिंदे को मिला राज ठाकरे का साथ. (Photo: X/@EknathShinde)
कल्याण-डोंबिवली में एकनाथ शिंदे को मिला राज ठाकरे का साथ. (Photo: X/@EknathShinde)

महायुति में बीजेपी के अलावा एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी भी साथ है. महाराष्ट्र में महायुति की सरकार है, और महाविकास आघाड़ी विपक्षी गठबंधन है. लेकिन, नगर निगम चुनाव में नए गठबंधन नजर आए. कई जगह स्थानीय स्तर पर - और, हैरानी की बात ये है कि चुनाव नतीजे आ जाने के बाद और भी नए नए समीकरण दिखाई पड़ रहे हैं, जबकि मूल युति पीछे छूट गई लगती है. 
 
कल्याण-डोंबिवली चुनाव नतीजे आने के बाद नई मिसाल बना है. महाराष्ट्र की सत्ता में हिस्सेदार बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना मेयर की कुर्सी को लेकर आमने सामने आ गए हैं. और, ठीक वैसे ही राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस भी एकनाथ शिंदे के साथ खड़ी हो गई है. नए गठबंधन का मकसद बीजेपी को मेयर पद से दूर रखना है.

बीएमसी में बीजेपी के सबसे ज्यादा सीटें जीत लेने के बावजूद मेयर पद उसके लिए आसान नहीं रह गया है. मुंबई में भी एकनाथ शिंदे तमाम हथकंडे अपना रहे हैं, जिनमें चुनाव जीतने वाले पार्षदों को होटल ले जाकर उनके सर्टिफिकेट ले लिया जाना भी शामिल है. 

शिंदे और राज ठाकरे का हाथ मिलाना

कोंकण भवन में हुई एक बड़ी बैठक के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के सांसद बेटे श्रीकांत शिंदे ने राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ गठबंधन को कंफर्म किया है. मुश्किल तो अब भी खत्म नहीं हुई है, क्योंकि दोनों के हाथ मिला लेने के बाद भी बहुमत के आंकड़े से 4 सीटें कम पड़ रही हैं. 

राज ठाकरे का इलाके विशेष में ही सही, एकनाथ शिंदे के साथ जाना उद्धव ठाकरे के लिए झटका माना जा रहा है. बीएमसी चुनाव में पहली बार उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे के साथ मराठी के मुद्दे पर चुनावी गठबंधन किया था. गठबंधन के बावजूद उद्धव ठाकरे का बीएमसी में दबदबा खत्म हो गया है.

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बीएमसी में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना में भले ही बड़ा फासला हो, लेकिन महाराष्ट्र में कई जगह टक्कर देते, तो कहीं पीछे छोड़ते भी देखा गया. ठाणे में तो एकनाथ शिंदे ने अपना असर दिखा ही दिया है. नतीजों में आगे तो कल्याण-डोंबिवली में भी हैं, और उल्हासनगर में तो जोरदार टक्कर भी दे रहे हैं. 

1. कल्याण-डोंबिवली को भी एकनाथ शिंदे का गढ़ माना जाता है, और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने वहां भी 5 सीटों पर जीत हासिल की है. एकनाथ शिंदे की पार्टी को 53 सीटें मिली हैं, जबकि बीजेपी के हिस्से में तीन सीटें कम यानी 50 आई हैं. 

एमएनएस को मिलाकर एकनाथ शिंदे का नंबर 62 हो जा रहा है, फिर भी 122 सदस्यों वाले कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में बहुमत से 4 सीटें कम पड़ रही हैं. यहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना को 11 सीटें मिली हैं. अगर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे की सीटें मिला दी जाएं तो नंबर 64 यानी बहुमत से भी दो ज्यादा हो जाता है. पिछले चुनाव में अविभाजित शिवसेना को 52 सीटें मिली थीं.

अगर राज ठाकरे का एकनाथ शिंदे के साथ जाना उद्धव ठाकरे के लिए झटका है, तो शिंदे की तरफ से बीजेपी को भी झटका ही है. सुना है कल्याण-डोंबिवली में बीजेपी की भी वही मांग है, जो बीएमसी में शिवसेना की. बीजेपी मेयर का कार्यकाल शेयर करना चाहती है, जबकि एकनाथ शिंदे कोई भी साझेदारी नहीं चाहते - एकनाथ शिंदे ने राज ठाकरे का सपोर्ट लेकर नंबर के मामले में बीजेपी पर दबाव बढ़ा दिया है.  

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2. ठाणे नगर निगम में 75 सीटें जीतकर शिंदे सेना ने पहले ही दबदबा कायम कर लिया है. ठाणे में बहुमत का नंबर 66 ही है. ठाणे में बीजेपी को 28 सीटें मिली हैं. जाहिर है, दबदबा तो एकनाथ शिंदे की शिवसेना का ही रहेगा. 

3. उल्हासनगर नगर निगम में बीजेपी शिवसेना से सिर्फ एक नंबर से आगे है. बीजेपी को 37 सीटें मिली हैं, और शिवसेना को 36. मेयर तो महायुति का ही होना तय है, लेकिन बीजेपी के लिए शिवसेना को अनसुना करना संभव नहीं होगा. ऊपर से शिवसेना को कल्याण-डोंबिवली की तरह वंचित बहुजन आघाड़ी के दो सदस्यों का भी समर्थन मिल रहा है. प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी का कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन हुआ था, लेकिन सत्ता के लिए फर्क क्या पड़ता है. 

अंबरनाथ में चुनाव के दौरान ही लगातार समीकरण बदल रहे थे. वहां तो बीजेपी और कांग्रेस ने चुनावी गठबंधन कर लिया था. बाद में बड़े नेताओं के ऐतराज पर गठबंधन टूट भी गया. कांग्रेस ने अपने 12 नेताओं को सस्पेंड कर दिया, तो वे बीजेपी में जा मिले. अकोला में भी बीजेपी ने असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ ‘अकोट विकास मंच’ के नाम से गठबंधन किया था. 

महाराष्ट्र में बड़ा कौन, विचारधारा या अवसरवाद?

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सियासत में दस्तूर तो नहीं कह सकते, वैसे इनकार भी नहीं कर सकते, लेकिन महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति में मौके की नजाकत का असर जरूर नजर आ रहा है. और, हाल फिलहाल तो सबसे ज्यादा एकनाथ शिंदे ही फायदा उठाते नजर आ रहे हैं.  

ध्यान रहे, अंबरनाथ में बीजेपी ने अपना मेयर तो बना लिया - लेकिन, नगर निगम के वाइस चेयरपर्सन की कुर्सी पर एकनाथ शिंदे ने हाथ तक न लगाने दिया. खास बात ये रही कि एकनाथ शिंदे बीजेपी के ही खिलाफ अपने ही कैबिनेट साथी अजित पवार की एनसीपी का सपोर्ट हासिल कर लिया था. 

और ये अजित पवार ही हैं, जिनका कहना रहा है कि महाराष्ट्र में मौके की राजनीति होती है, सत्ता की बात आने पर विचारधारा बहुत पीछे छूट जाती है. एक बार दिल्ली की एक पार्टी, जो पार्टीलाइन से अलग थी, अजित पवार ने कहा था, ‘महाराष्ट्र में विचारधारा के बारे में मत पूछिए... राज्य की पूरी राजनीति बदल चुकी है... यहां हर कोई सत्ता चाहता है... सत्ता के लिए विचारधारा को किनारे कर दिया गया है.’

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