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G-20 की अध्यक्षता सांस्कृतिक कूटनीति और रचनात्मक अर्थव्यवस्था दुनिया को दिखाने का मौका

इस साल एक दिसंबर 2022 से 30 नवंबर 2023 तक G-20 समूह की अध्यक्षता भारत के पास होगी. G-20 दुनिया की 20 प्रमुख विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है. जिसकी ग्लोबल जीडीपी यानी वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी तकरीबन 85 फीसदी है.

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

यूनाइटेड नेशन यानी संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया में कुल 195 देश हैं, जिनमें 193 उसके सदस्य और दो ऑब्जर्वर स्टेट हैं. इन देशों की ग्रुपिंग सिर्फ यूनाइटेड नेशन तक ही महदूद नहीं है. अलग-अलग इंटरेस्ट को ध्यान में रखकर ये देश और कई छोटे-बड़े समूह बनाते हैं. भारत भी सार्क (SARC) से लेकर आसियान (ASEAN) तक कई समूहों का हिस्सा है. एक और बड़ी मशहूर ग्रुपिंग है. दुनिया की 20 बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की. इसे शॉर्ट में G-20 कहते हैं.

इस साल के आखिर यानी एक दिसंबर 2022 से 30 नवंबर 2023 तक पूरे एक बरस G-20 की अध्यक्षता भारत के पास होगी. G-20 दुनिया की 20 प्रमुख विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है. जिसकी ग्लोबल जीडीपी यानी वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी तकरीबन 85 फीसदी है. इसके अलावा दुनिया के 75 फीसदी व्यापार और दो तिहाई आबादी के निवास स्थान की वजह से ये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देशों के बीच आर्थिक सहयोग का सबसे अहम मंच है. 

भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा देने वाले विषय पर सबसे अधिक सहयोग कर सकता है. जिससे महामारी के बाद की दुनिया में समाजिक-आर्थिक बहाली के लिहाज से रचनात्मक अर्थव्यवस्था को बल मिले और भारत अपनी सॉफ्ट पावर को और पुष्ट कर सके.

इस संबंध में 2020 में सऊदी अरब और 2021 में इटली की मेजबानी के दौरान जो गति हासिल हुई है, भारत उसे और मजबूती दे सकता है.

सभ्यता की शुरुआत से ही कला और संस्कृति को अभिव्यक्ति और आनंद के माध्यम के तौर पर महत्व दिया गया है. कला और संस्कृति की ही देन है जिससे न सिर्फ हमने बल्कि हम जैसी अनगिनत पीढ़ियों ने अपने अनुभवों, उद्देश्यों, परिकल्पनाओं और भावनाओं को स्थायी रूप से साझा किया है. यह इंसानियत के लिहाज से एक अनूठी बात है. कुल जमा बात ये है कि कला और संस्कृति ही वह धागा है जो सभ्यताओं और राष्ट्रों को जोड़ता है. ये नागरिकों के बीच एक साझी पहचान और साझी विरासत की भावना के जरिए ही संभव है.

G-20 के वजूद में आने के बाद जुलाई 2021, वह पहला मौका था जब G-20 देशों में संस्कृति संबंधी कुछ बातों पर सहमति बनी. कोरोना महामारी के मद्देनजर तय हुआ कि एक टिकाऊ, सामाजिक और आर्थिक सुधार के लिए संस्कृति एक अहम जरिया हो सकता है. इटली की अध्यक्षता में भी तय हो चुका है कि G-20 के देश सांस्कृतिक विरासत, संस्कृति और जलवायु परिवर्तन, संस्कृति और शिक्षा, संस्कृति और रचनात्मक उद्योग और डिजिटल बदलाव में संस्कृति की सुरक्षा जैसे पांच उद्देश्यों के साथ आगे बढ़ेंगे.

एक उद्योग के रूप में कला और संस्कृति के पास ऐसी क्षमता भी है कि वह आर्थिक विकास और उत्पादकता (Productivity) को बढ़ावा दे सके. वैश्विक राजस्व में 2,250 अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी और ती करोड़ कामगारों के साथ कला और संस्कृति सबसे तेज विकास दर वाले उद्योग के रूप में उभरा है. कला और संस्कृति का अर्थव्यवस्था से एक और करीबी संबंध है क्योंकि इसका प्रभाव पर्यटन, कौशल विकास और औद्योगिक गतिविधियों पर भी पड़ता है. विदेश और संस्कृति राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने भी 2021 में आयोजित हुई G-20 की एक बैठक में इस बात को स्वीकार किया कि संस्कृति और रचनात्मक क्षेत्र के जरिए न सिर्फ रोजगार का सृजन किया जा सकता है बल्कि असमानताओं को कम कर एक टिकाऊ विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है. 

G-20 की अगली मेजबानी भारत को एक अनूठा अवसर देती है जिसके जरिए नई दिल्ली चाहे तो देश की छवि को बेहतर कर सकती है. इसके लिए भारत अपने सभ्यता के मूल तत्वों, कला और संस्कृति को बढ़ावा दे सकता है. भारत G-20 की अध्यक्षता के सहारे रचनात्मक अर्थव्यवस्था को प्रेरित कर सकता है जिससे लंबे समय तक चलने वाली विकास के लक्ष्यों को हासिल किया जा सके. 

इसके अलावा भविष्य के भारत को वैश्विक पटल पर प्रोजेक्ट किया जा सकता है. जिस तरह भारत में अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों के लोग रहते हैं, इसके इर्द-गिर्द बतौर अध्यक्ष भारत एक डिस्कोर्स बुन सकता है. साथ ही, भारत दुनिया की दूसरी अहम क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के साथ ख़ासकर जो इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में हैं, एक सांस्कृतिक तालमेल बिठा सकता है और भारत के सॉफ्ट पावर को मजबूत कर सकता है.

भारत के सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल

अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर देखें तो भारत का सॉफ्ट पावर, भारत की सभ्यता, संस्कृति के दर्शन और राजनीतिक मूल्यों पर आधारित है. ये भारत के राष्ट्रीय हितों की गारंटी देते हैं. सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल करने के लिए किसी भी देश को, लोगों की मदद से होने वाली कूटनीति, लोगों से लोगों के बीच अच्छे संबंध, संचार से लेकर जो विजुअल मीडियम है, प्रवासी और सिविल सोसाइटी के जो संगठन हैं, उनकी जरुरत पड़ती है. इन्हीं के माध्यम से कोई भी देश अपने सॉफ्ट पावर के जरए राष्ट्रीय हित को साध सकता है. सॉफ्ट पावर असल में एक ऐसी शक्ति है जिसके जरिए पूरा का पूरा डिस्कोर्स बदला जा सकता है. इसका इस्तेमाल वैश्विक मंचों पर बढ़त हासिल करने के लिए होता है.

भारत अपने सॉफ्ट पावर के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. ये सॉफ्ट पावर प्राचीन सांस्कृतिक और सभ्यता से हासिल लोकाचार में निहित है. भारत के सॉफ्ट पावर का निचोड़ प्राचीन भारतीय दर्शन 'वसुधैव कुटुम्बकम' के जरिए समझा जा सकता है. 'वसुधैव कुटुम्बकम' अपने आप में पहला ऐसा विचार है जो वैश्विक नागरिकता की परिकल्पना करता है. इसका मतलब ये है कि सभी व्यक्ति एक दूसरे के लिए और अपने साझा भविष्य के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार है. वसुधैव कुटुम्बकम का यह विचार यूनेस्को में हो रही उस बातचीत का आधार है जो अलग-अलग संस्कृतियों, धर्मों और सभ्यताओं के बीच संवाद स्थापित करने की वकालत करता है.

भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और सभ्यता से हासिल विरासत, प्रवासी भारतीयों की मौजूदगी इसके सॉफ्ट पावर को दर्शाती है. इस बात की भी याद दिलाती है कि ये सॉफ्ट पावर, भारत की धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता, सब को मिल-जुलकर साथ ले चलने की कला, अलग-अलग संस्कृतियों के बीच घनिष्ठता हमारी सभ्यता के लिए बेहद जरूरी है. मौजूदा अनिश्चित अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है. G-20 के अध्यक्ष के रूप में भारत लोगों के जरिए होने वाली कूटनीति, लोगों से लोगों के बीच संबंध को मजबूत कर सकता है. इस संबंध में सांस्कृतिक उद्योग, सॉफ्ट पावर का एक जरिया हो सकता है. इसके सहारे लोगों से लोगों की सहभागिता को बढ़ावा दिया जा सकता है.

सांस्कृतिक उद्योगों के माध्यम से सांस्कृतिक कूटनीति को प्रेरित करना

रचनात्मक उद्योगों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में इनवोवेशन,आर्थिक विकास और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव के मोर्चे पर खुद की एक असाधारण पहचान बनाई है. संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास केंद्र यानी UNCTAD  के अनुसार CCI का दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद मे 3% का योगदान है. इसके अलावा सीसीआई ने एक साल मे 2.25 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की कमाई की है और लगभग 30 लाख से ज्यादा लोगो के लिए रोजगार का अवसर उपलब्ध कराया है.

संयुक्त राष्ट्र की 74वीं आम सभा ने जिस तरह वर्ष 2021 को सतत विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय रचनात्मक अर्थव्यवस्था का साल घोषित किया है, ये अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर रचनात्मक अर्थव्यवस्था के महत्व को दर्शाता है. हालांकि, कोरोना महामारी की वजह से इस सेक्टर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, खासतौर से उन लोगो के रोजगार प्रभावित हुए हैं जो दुनिया की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं. ये क्षेत्र कला, संस्कृति, व्यापार और तकनीक के जटिल संबंधों पर आधारित हैं. 

रचनात्मक अर्थव्यवस्था का मतलब है ज्ञान पर आधारित उद्योग जैसे डिजाइन, वास्तुकला, कला और शिल्प, विज्ञापन, अनुसंधान और विकास, प्रकाशन, फैशन, सिनेमा, फोटोग्राफी, संगीत, कला का प्रदर्शन, सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर गेम्स.

हालांकि, वैश्विक निर्यात और जीडीपी के लिहाज से रचनात्मक अर्थव्यवस्था की हालत काफी नाजुक है. G-20 के भीतर इसकी उपयोगिता पर और अधिक जोर नही दिया जा सकता था. दुनिया के रचनात्मक सामानों का निर्यात करने वाले 10 मे से 7 निर्यातक G-20 के मेंबर हैं. जिसमें चीन सबसे ऊपर है और उसके बाद अमेरिका और फ्रांस का स्थान है. G-20 देशों में शामिल चीन, फ्रांस, भारत, इटली, तुर्की और इंग्लैंड के कुल निर्यात में 5 प्रतिशत की हिस्सेदारी रचनात्मक सामानों की है. जहां एक तरफ G-20 रचनात्मक उद्योग की बढ़ोतरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. वही, दूसरी तरफ इस सेक्टर का विकास G-20 देशों की अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी के लिहाज से भी काफी अहम है. 

रचनात्मक अर्थव्यवस्था को व्यापक स्तर पर अपनाया जा रहा है. चूंकि अब तक इस संसाधन के बारे में जानकारी कम थी इसलिए ये बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हो रहा है. इसके इस्तेमाल से आर्थिक तरक्की और युवा बेरोजगारी जैसी समस्याओं का समाधान संभव है. साथ ही साथ, इसका इस्तेमाल सतत विकास और मानव संसाधन के विकास के लिए किया जा सकता है. सांस्कृतिक और रचनात्मक उद्योग न सिर्फ अर्थव्यवस्था बल्कि मानवीय मूल्य, सतत शहरी विकास और रचनात्मकता के साथ संस्कृति की बढ़ोतरी के लिए फायदेमंद है.

इसके अलावा यह 2030 के सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने में भी मदादगर हैं. रचनात्मक उद्योगों में ही यह सामर्थ्य है कि वह न सिर्फ रोजगार उपलब्ध करता है बल्कि रोजगार पाने वालों को तकनीकी तौर पर सक्षम बनाता है. रचनात्मक उद्योग ही वह जरिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर कामकाज का भविष्य नए सिरे से परिभाषित हो सकता है.

भारत और G-20 के बीच सहयोग के संभावित क्षेत्र

G-20 पहले से ही इस बात पर विचार कर रहा है कि कैसे रचनात्मक अर्थ्यव्यस्था, संस्कृति और टूरिज्म यानी पर्यटन एक समावेशी वैश्विक आर्थिक सुधार की दिशा में योगदान कर सकते हैं. इसके मद्देनजर 2021 में पहली बार G-20 देशों के संस्कृति मंत्रियों की बैठक हुई. जिसमें इस बात पर मंथन हुआ कि खपत और निवेश, सामाजिक समावेश, लैंगिक समानता से लेकर वास्तविक और अवास्तविक विरासत के मूल्यों के बीच किस तरह का संबंध है. 

कोरोना महामारी ने हमें रिकॉर्ड स्तर पर ऑनलाइन माध्यमों की ओर धकेल दिया है. रचनात्मक उद्योग, वैश्विक स्तर पर डिजिटल परिवर्तन की दिशा में मध्यस्थता हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. भारत को G-20 अध्यक्षता के दौरान रचनात्मक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ व्यापार के क्षेत्रों में डिजिटलीकरण, भविष्य में बदलते कामकाज के तरीके और बुनियादी ढांचे में निवेश पर चर्चा करनी चाहिए.

इस संबंध में भारत योजना बनाकर G-20 के भीतर कुछ लक्ष्यों का प्रस्ताव दे सकता है और आम सहमति बनाकर उनको अमल में लाया जा सकता है. इस दिशा में सबसे पहले रिकवरी की प्रक्रिया के तहत रचनात्मक और सांस्कृतिक उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. G-20 की सरकारें एक साथ आगे बढ़कर अपने देश की नीतियों में सुधार ला सकती है. इसके अलावा वे सामूहिक तौर पर रचनात्मक और सांस्कृतिक उद्योग से जुड़े कुछ परिभाषाओं पर आम सहमति बना सकते हैं. 

दूसरा, G20 सामूहिक तौर पर डिजिटल डिवाइड को दूर करने का फैसला ले सकता है, जो रचनात्मक उद्योगों की बढ़ोतरी में रोड़ा बनते हैं. दुनिया-जहान के कामगारों और उद्योगों के बीच डिजिटल टूल्स, बुनियादी ढांचा और कौशल असमान रूप से बंटे हुए हैं. डिजिटल गैरबराबरी की वजह से रचनात्मक क्षेत्र बहुत ही नाजुक मोड़ से गुजर रहा है. इसे दूर करने के लिए G-20 देशों के बीच ऐसी नीतियों की जरूरत है जो व्यापक स्तर पर खासकर दूर-दराज के इलाकों में इंटरनेट की पहुंच को बढ़ावा दे सकें.

तीसरा, चूंकि 2030 के एजेंडा के टिकाऊ विकास वाले लक्ष्यों को हासिल करने की राह में रचनात्मक क्षेत्र का अपना विशेष महत्व है. लिहाज़ा, G-20 देशों को अपने सतत विकास लक्ष्यों के साथ ही साथ आर्थिक-सामाजिक रणनीतियों और संस्कृतियों के बीच एक तालमेल बिठाना चाहिए. 

चौथा, रचनात्मक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का एक जरिया ये भी है कि G-20 देशों में अधिक से अधिक सांस्कृतिक शहरों/जिलों और सिस्टर सिटीज का निर्माण हो. इस वजह से बड़ी संख्या में पर्यटकों के आवक को बढ़ावा मिल सकता है. साथ ही ये संस्थाओं, उपभोक्ताओं और कंटेंट निर्माताओं के बीच आदान-प्रदान का एक रास्ता खोल सकता है. इसके सहारे जो जरूरी निवेश है, उसको लाना संभव हो पाएगा और सांस्कृतिक गतिविधियों में लगे संस्थाओं को उनकी जरूरत के हिसाब से फंड उपलब्ध कराया जा सकेगा.

पांचवा, 'वैश्विक कला और संस्कृति रिकवरी फंड' बनाने की जरूरत है. विशेष रूप से उन विकासशील देशों के लिए जो कोरोना महामारी की वजह से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. ये फंड सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्र को फिर से जीवित करने का एक जरूरी तरीका साबित होगा. 

भारत अपनी G-20 की अध्यक्षता के दौरान रचनात्मक उद्योग के समिट और एक्सपोज के संगठन का नेतृत्व कर सकता है. इन आयोजनों में बिजनेस से जुड़े अधिकारियों, निवेशकों, कूटनीतिज्ञों और सांस्कृतिक उद्यमियों को बुलाकर भारत सांस्कृतिक कंपनियों के लिए राजस्व इकट्ठा कर सकता है. इसके साथ ही सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था पर चर्चा को बढ़ावा दे सकता है.

अपने सामाजिक आर्थिक फायदों की वजह से रचनात्मक अर्थव्यवस्था को वैश्विक विकास के लिए एक जरूरी इंजन के रूप में पहचाना जाना जाता है. ये क्षेत्र आम लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर तो करता ही है. इसके अलावा व्यक्तियों, समुदायों और समाजों की सामाजिक स्थिति कैसे बेहतर की जाए, इसके लिए भी रचनात्मक और गुणकारी जरिया मुहैया कराता है. 

ऐसे समय में जब श्रम बाजार में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, रचनात्मक अर्थव्यवस्था G-20 देशों में वह बहुमूल्य जरिया है जो आसानी से रोजगार के अवसर ख़ासकर, छोटे, लघु और मध्यम उद्योगों के तहत उपलब्ध करा रही है. रचनात्मक अर्थव्यवस्था एक टिकाऊ पर्यटन के विकास के लिए भी एक जरूरी कड़ी साबित हुई है. भारत G-20 की अध्यक्षता बहुत ही सही समय पर करने जा रहा है. लिहाजा, इसका सही इस्तेमाल हो सके, इसके लिए विदेश मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय को एक व्यापक रोडमैप बनाने पर सहयोग करना चाहिए.  

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