भारत करोड़ों देवी-देवताओं का देश है, जहां हर गली और मोड़ पर एक नया आराध्य मिल जाता है. लेकिन पिछले सात दशकों में, भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े हिस्से में एक खामोश मगर बेहद शक्तिशाली सांस्कृतिक क्रांति हुई है. यह क्रांति 'बुद्ध' की है. 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के दीक्षाभूमि मैदान में जब बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया, तो वह सिर्फ एक धार्मिक परिवर्तन नहीं था. वह भारतीय समाजशास्त्र का एक 'ऐतिहासिक यू-टर्न' था. आज सवाल यह है कि आखिर बुद्ध ही क्यों? जब भारत के पास देवताओं की इतनी बड़ी 'कैटलॉग' थी, तो दलित समाज ने एक ऐसे बुद्ध को क्यों चुना, जो करीब 1500 साल पहले भारत की मुख्यधारा से ओझल हो चुके थे?
बुद्ध ही क्यों? एक 'काउंटर-कल्चर' की तलाश
प्रसिद्ध समाजशास्त्री गेल ओमवेट (Gail Omvedt) ने अपनी किताबों में विस्तार से समझाया है कि दलितों का बुद्ध की ओर झुकाव कोई भावनात्मक फैसला नहीं, बल्कि एक गहरा 'बौद्धिक चुनाव' था. हिंदू धर्म के भीतर जो भगवान थे, वे कहीं न कहीं जाति व्यवस्था (Caste Hierarchy) से जुड़े थे. दलित समाज एक ऐसा 'काउंटर कल्चर' चाहता था जो जन्म के आधार पर श्रेष्ठता को खारिज करे.
बुद्ध के साथ तीन चीजें बिल्कुल फिट बैठती थीं:
तार्किक: बुद्ध चमत्कार की नहीं, तर्क की बात करते हैं. अंबेडकर ने इसे 'समानतावाद' (Egalitarianism) का सबसे बड़ा हथियार माना.
यथार्थवाद: बुद्ध कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि इसी धरती के ऐतिहासिक महापुरुष थे. दलितों को लगा कि वे किसी बाहरी धर्म में नहीं जा रहे, बल्कि अपनी उस विरासत की ओर लौट रहे हैं जिसे 'ब्राह्मणवाद' ने दबा दिया था.
अहिंसक विद्रोह: बुद्ध का रास्ता हिंसक नहीं था, लेकिन वह सत्ता और व्यवस्था को चुनौती देने वाला सबसे कारगर और मारक रास्ता था.
फैलाव: महाराष्ट्र से यूपी और दक्षिण तक
आज बुद्ध को मानने वाले दलितों का इलाका किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है. हालांकि इसका केंद्र महाराष्ट्र है (जहां की करीब 6-7% आबादी बौद्ध है), लेकिन अब इसका असर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक के बड़े हिस्सों में दिख रहा है.
समाजशास्त्री बद्री नारायण तिवारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 'बहुजन राजनीति' के उभार ने बुद्ध को घर-घर पहुंचाया. आज पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड के गांवों में आपको 'जय भीम' के साथ बुद्ध की प्रतिमाएं हर दलित बस्ती के द्वार पर मिल जाएंगी. यह एक तरह से पहचान का प्रतीक बन चुका है. अब यह सिर्फ धर्म नहीं, बल्कि एक 'पोलिटिकल स्टेटमेंट' है कि, "हम उस व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं जो हमें नीचा दिखाती है."
रिवाजों में बुद्ध: जन्म से मृत्यु तक का 'डी-कोडिंग'
दलितों के जीवन में बुद्ध किस तरह शामिल हुए हैं, यह उनके जीवन चक्र के संस्कारों को देखकर समझ आता है. पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों में अक्सर दलितों को हाशिए पर रखा जाता था या उन्हें 'अपवित्र' माना जाता था. बुद्धिज्म ने उन्हें अपने रीति-रिवाज खुद बनाने की आजादी दी.
विवाह: दलित समाज में अब 'बुद्ध वंदना' के साथ शादियां होती हैं. इसमें किसी ब्राह्मण पुजारी की जरूरत नहीं होती. यह सीधा-सीधा संस्कारों की स्वायत्तता का मामला है. कोई बौद्ध भिक्षु (भंते जी) या बौद्ध मंत्रों का जाप करने में निपुण समाज को कोई प्रबुद्ध व्यक्ति प्रायः ये संस्कार पूरे करवा देता है.
त्योहारः दीपावली या होली जैसे पारंपरिक त्योहारों की जगह अब 'बुद्ध पूर्णिमा', 'धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस' (14 अक्टूबर) और 'अंबेडकर जयंती' (14 अप्रैल) ने ले ली है.
नामकरण और अंतिम संस्कार: बच्चों के नाम राहुल, सिद्धार्थ या प्रबुद्ध रखना और मृत्यु के बाद शव को जलाने या दफनाने के समय बौद्ध प्रार्थनाएं करना—ये सब इस बात का प्रमाण हैं कि बुद्ध अब दलित चेतन और अवचेतन जिंदगी का हिस्सा हैं.
ये 'बौद्धिक मुक्ति' का मार्ग है
दक्षिण एशिया पर काफी वक्त अध्ययन करने वाले क्रिस्टोफ जाफ़रलॉट (Christophe Jaffrelot) नामी सोशल साइंटिस्ट हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ पेरिस और साइंस पो से जुड़े जाफरलॉट तर्क देते हैं कि दलितों के लिए बुद्ध की शरण में जाना एक 'सोशल मोबिलिटी' का तरीका है. मान्यता रही है कि हिंदू धर्म के भीतर एक दलित चाहे कितना भी पढ़-लिख ले, उसकी जाति उसका पीछा नहीं छोड़ती है. लेकिन 'बौद्ध' बनते ही वह उस 'कलंक' से आजाद हो जाता है.
एक और बड़े समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास ने 'संस्कृतिकरण' (Sanskritisation) की बात की थी, जहां निचली जातियां ऊपर उठने के लिए ऊंची जातियों के रीति-रिवाजों को अपनाती थीं. लेकिन दलित बुद्धिज्म इसके ठीक उलट है. यह 'De-Sanskritisation' है. यहां दलित समाज ऊपर वाली जातियों की नकल नहीं कर रहा, बल्कि अपनी एक नई और स्वतंत्र पहचान खड़ी कर रहा है.
नवयान (Navayana): अंबेडकर का 'मॉडर्न बुद्ध'
यह समझना जरूरी है कि भारत के दलित जिस बुद्ध को मानते हैं, वे पुराने 'मौन रहने वाले' या 'वैराग्य वाले' बुद्ध नहीं हैं. यह अंबेडकर का 'नवयान' (New Vehicle) है. अंबेडकर ने बुद्ध की शिक्षाओं को 'सोशल जस्टिस' और 'स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व' (Liberty, Equality, Fraternity) के चश्मे से दोबारा लिखा.
उनके लिए बुद्ध एक 'मुक्तिदाता' (Liberator) हैं. दलितों के घरों में बुद्ध की फोटो के बगल में हमेशा अंबेडकर की फोटो होती है. यह जोड़ी बताती है कि एक ने 'आध्यात्मिक रास्ता' दिखाया और दूसरे ने 'संवैधानिक रास्ता'.
ये सिर्फ धर्म परिवर्तन नहीं, एक नई सभ्यता की पदचाप है
आज भारत में बुद्ध सिर्फ एक धर्म का नाम नहीं है, बल्कि वह 'वैकल्पिक राजनीति' का चेहरा हैं. जब एक दलित युवा बुद्ध की शरण में जाता है, तो वह केवल प्रार्थना नहीं कर रहा होता. बल्कि वह सदियों के अपमान के खिलाफ एक सभ्यतागत विरोध दर्ज कर रहा होता है.
भविष्य में, जैसे-जैसे दलित समाज में शिक्षा और 'राजनीतिक जागरूकता' बढ़ेगी, बुद्ध की यह चमक और बढ़ेगी. यह बुद्ध भारत को 'पिछड़ेपन' की ओर नहीं, बल्कि एक 'मॉडर्न, तार्किक और लोकतांत्रिक' समाज बनाने की ओर ले जाते हैं. यही कारण है कि करोड़ों भगवानों के बीच, बुद्ध आज भारत के सबसे वंचित समाज के लिए उम्मीद की इकलौती किरण बन गए हैं. सुखद ये है कि देश के बाकी धर्मालुओं से इसका कोई टकराव नहीं है. तुम अपने रास्ते, हम अपने रास्ते. हां, राजनीति जरूर दोनों धड़ों को एक अखाड़े में ले आती है.