अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब ग्रीनलैंड को 'खरीदने' की बात कर रहे थे, तब दुनिया ने इसे सनक, मजाक या रियल-एस्टेट कारोबारी की भाषा मानकर टाल दिया था. लेकिन जब उन्हीं ट्रंप के करीबी लोग यह कहने लगें कि 'सैन्य विकल्प भी खुले हैं', तब मामला मजाक से निकलकर अंतरराष्ट्रीय कानून और ग्लोबल सिक्योरिटी ऑर्डर के अस्तित्व तक पहुंच जाता है.
वेनेजुएला हमले को लेकर यूरोपीय देश जिस इस्तीनान से डोनॉल्ड ट्रंप को ये कहते हुए बधाई दे रहे थे कि उन्होंने मादुरो जैसे तानाशाह और नार्को टेररिस्ट के साथ सही सुलूक किया है, वे अब ग्रीनलैंड के मामले में सकते में हैं. क्योंकि सवाल सिर्फ ग्रीनलैंड का नहीं रह जाता है, सवाल यह हो जाता है कि अगर अमेरिका अपने ही सहयोगी के खिलाफ बल प्रयोग करता है, तो फिर संयुक्त राष्ट्र और NATO जैसे संगठनों की हैसियत क्या रह जाएगी? और वैसे भी अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप यूरोपीय देशों पर NATO में उनका अंशदान बढ़ाने के लिए दबाव दे रहे थे. वे साफ शब्दों में कह चुके हैं कि यूरोप की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब अमेरिका अकेला नहीं उठाएगा. यानी, ट्रंंप के लिए NATO एक ताकत से ज्यादा बोझ है.
ग्रीनलैंड कोई लावारिस जमीन नहीं है. यह डेनमार्क का स्वायत्त इलाका है. उसकी अपनी संसद और सरकार है. लेकिन उसकी अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता डेनमार्क के अधीन है. यानी ग्रीनलैंड पर हमला सीधे-सीधे डेनमार्क पर हमला होगा. और डेनमार्क कोई अमेरिका का दुश्मन देश नहीं, बल्कि अमेरिका का दशकों पुराना NATO सहयोगी है.
ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे से यूएन चार्टर का क्या होगा?
अगर अमेरिका अपनी सेना के दम पर ग्रीनलैंड पर कब्जा करता है, तो वह सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र चार्टर की आत्मा को कुचल देगा. UN चार्टर की धारा 2(4) साफ कहती है कि कोई भी देश किसी दूसरे देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ बल का इस्तेमाल नहीं कर सकता है. इसमें कोई अगर-मगर नहीं है. ग्रीनलैंड ने अमेरिका पर हमला नहीं किया है, न ही डेनमार्क से कोई ऐसा खतरा है जिसे आत्म-रक्षा के नाम पर जायज ठहराया जा सके. ऐसे में धारा 51 का सहारा भी नहीं लिया जा सकता.
यानी अगर अमेरिका ऐसा करता है, तो वह वही काम करेगा जिसके लिए वह दशकों से रूस, इराक या दूसरे देशों को कठघरे में खड़ा करता आया है. बलपूर्वक सीमा बदलना. फर्क बस इतना होगा कि इस बार आरोप लगाने वाला खुद आरोपी होगा.
NATO तो उत्तरी अटलांटिक में ही डूबकर मर जाएगा?
अब बात NATO की. NATO यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन. जिसकी नींव तो 1941 में द्वितीय विश्वयुद्ध की शुरुआत के साथ ही पड़ गई थी. लेकिन, अमेरिका और यूरोपीय देशों के इस सैन्य संगठन ने अपना असली असर दिखाया कोल्ड वॉर के दौरान. NATO ने ही सोवियत प्रभाव को अंकुश लगाया. फिर उसके बाद मिडिल-ईस्ट में अपना दबदबा कायम किया. लेकिन, ट्रंप के आने के बाद इसमें दरारें पड़ गई हैं. ग्रीनलैंड पर यदि ट्रंप कब्जा करते हैं तो NATO का आर्टिकल 5 धर्मसंकट में पड़ जाएगा. जिसमें कहा गया है कि अगर किसी एक सदस्य पर हमला होता है, तो उसे सभी पर हमला माना जाएगा. यह अनुच्छेद रूस जैसे देशों को रोकने के लिए बनाया गया था. लेकिन किसे पता था कि एक समय ऐसा आएगा जब हमला बाहर से नहीं, भीतर से होगा. अगर अमेरिका ही डेनमार्क पर चढ़ दौड़े तो NATO के पास इसका कोई जवाब नहीं है. क्योंकि NATO कभी इस हालात के लिए बना ही नहीं था कि उसका सबसे ताकतवर सदस्य ही दूसरे सदस्य को धमकाए.
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने इसी बात को बेहद सख्त शब्दों में कहा है कि अगर अमेरिका किसी NATO देश पर हमला करता है, तो यह सिर्फ एक देश पर हमला नहीं होगा, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी पूरी सुरक्षा व्यवस्था का अंत होगा. यह बयान दरअसल एक चेतावनी है कि इसके बाद NATO सिर्फ कागज पर रह जाएगा.
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने भी साफ कहा है कि अब बहुत हो चुका. उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि ग्रीनलैंड किसी भी तरह की धमकी या सौदेबाजी स्वीकार नहीं करेगा. यह बयान सिर्फ आत्मसम्मान का नहीं, बल्कि इस डर का भी है कि कहीं बड़ी ताकतें छोटे इलाकों को शतरंज की गोटी समझने न लगें.
ग्रीनलैंड के लिए अमेरिका के खिलाफ एकजुट होने लगा यूरोप
यूरोप के दूसरे देशों ने भी इस पर चुप्पी नहीं साधी है. फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने कहा है कि ग्रीनलैंड का भविष्य अंतरराष्ट्रीय कानून और लोगों की इच्छा के मुताबिक तय होना चाहिए, न कि किसी महाशक्ति की सैन्य ताकत के दम पर. यूरोप जानता है कि अगर आज ग्रीनलैंड के मामले में चुप्पी रही, तो कल बाल्टिक देशों या किसी और हिस्से में यही एक्शन दोहराया जाएगा. डेनमार्क सहित यूरोप के सात बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि ग्रीनलैंड को लेकर कोई समझौता नहीं होगा.
वेनेजुएला, ग्रीनलैंड के बाद क्या होगा वर्ल्ड ऑर्डर का?
असल खतरा भविष्य का है. अगर अमेरिका जैसा देश यह दिखा दे कि नियम सिर्फ दूसरों के लिए हैं, तो रूस और चीन जैसे देशों को इससे बड़ा हथियार और क्या चाहिए? वे पहले से कहते आए हैं कि वेस्ट की व्यवस्था पाखंडी है. वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठवा लेने के बाद ट्रंप जिस तरह से तेल के कारोबार पर फोकस कर रहे हैं, उन पर आरोप लग रहा है कि नार्कोटिज्म के आरोप तो सिर्फ बहाना थे. ग्रीनलैंड पर हमला उस आरोप को सच साबित कर देगा.
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे किसी भी कदम के बाद NATO में भरोसे की दीवार ढह जाएगी. यूरोपीय देश यह सोचने पर मजबूर होंगे कि क्या वे अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रह सकते हैं. यह बहस तेज होगी कि यूरोप को अपनी अलग सुरक्षा व्यवस्था बनानी चाहिए या नहीं. और यही वह दरार होगी, जिसका फायदा दुनिया की बाकी ताकतें उठाएंगी. ऑस्ट्रिया में प्रो-नाटो एडवोकेट गुंतेर फेलिनर यान कहते हैं कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश करता है तो यूरोप को भी अपने यहां मौजूद अमेरिकी सुरक्षा ठिकानों को जब्त करने का अधिकार होगा.
बात सिर्फ ट्रंप या ग्रीनलैंड की नहीं है. बात उस दुनिया की है, जो नियमों, संधियों और भरोसे पर टिकी हुई है. अगर सबसे ताकतवर देश ही उन नियमों को तोड़ने लगे, तो फिर कमजोर देशों से कानून मानने की उम्मीद करना फिजूल रह जाएगा. और एक बार फिर से मध्ययुगीन दौर की वापसी होगी, जिसमें जिसके पास जितनी ताकत होगी वह उतने बड़े इलाके पर काबिज होगा.