चीन ने पहले वेनेजुएला और अब अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध पर चुप्पी क्यों साध रखी है? इसके पीछे की 'कोल्ड कैलकुलेशन' यानी स्ट्रैटेजी क्या है?
चीन के भीतर एक मजबूत खेमा है, जो मानता है कि चीन के 'मुख्य हितों का केंद्र' (core of core interests) केवल ताइवान है, उसके बाद दक्षिण चीन सागर का नंबर आता है. दुनिया के बाकी किसी भी हिस्से में, चीन का सरोकार केवल व्यापार और बिजनेस से है.
व्यापार करते समय, चीन अपने साझेदारों या दोस्तों में अमेरिका-विरोध को पसंद करता है. लेकिन यही इकलौता पैमाना नहीं है. उदाहरण के तौर पर, चीन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, रूस, सऊदी अरब और इराक लगातार चीन के तीन शीर्ष कच्चे तेल के सप्लायर (crude oil suppliers) रहे हैं.
लेकिन सऊदी अरब अमेरिका का पक्का समर्थक है और इराक को कथित तौर पर एक ’कठपुतली सरकार’ (puppet state) माना जाता है. और यह चीज चीन को उनके साथ बिजनेस करने से नहीं रोकती. असल में, चीन का इराक के साथ द्विपक्षीय व्यापार और सीधा निवेश, ईरान की तुलना में काफी ज्यादा है.
चाहे वेनेजुएला हो या ईरान, चीन का प्राथमिक हित तेल है, और दूसरा हित बाजार है.
क्या है चीन का संदेश?
इसलिए, अमेरिका-विरोधी दोस्तों और साझेदारों के लिए चीन का संदेश साफ है: चीन चाहता है कि आप अमेरिका का विरोध जारी रखें, लेकिन वह यह भी चाहता है कि आप केवल चीन के समर्थन के भरोसे अमेरिका से सीधे टकराकर मुसीबत न मोल लें.
इसी तरह, ताइवान मुद्दे को सुलझाते समय, चीन को शायद अपने किसी भी दोस्त से मदद की न तो जरूरत होगी और न ही वह ऐसी कोई उम्मीद रखेगा. उसे बस इतना चाहिए कि उसके दोस्त उसके साथ बिजनेस करना जारी रखें.
चीन की वेबसाइट 'Guancha.com' के एक लेख में ईरान मुद्दे पर चीन की ढीली प्रतिक्रिया को समझाते हुए लिखा गया है:
’अपनी समस्याएं खुद सुलझाएं... चीन से बिना शर्त मदद की उम्मीद न करें, और निश्चित रूप से चीन को अपनी मुसीबतों में न घसीटें.’
लेख में इस बात पर जोर दिया गया कि जब तक चीन राष्ट्रीय एकता (ताइवान का विलय) हासिल नहीं कर लेता और अपने 'मुख्य हितों' की रक्षा नहीं कर लेता, तब तक वह अपने सहयोगियों पर हावी होने वाले सुपरपावर की तरह काम नहीं कर सकता. इसलिए, उसकी प्राथमिकता ताइवान और पूर्वी एशिया ही होनी चाहिए.
क्या चीन अपने 'पुराने दोस्तों' को खो रहा है?
चीन के रणनीतिक हलकों में एक और बात तेजी से फैल रही है. वह यह कि पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका के हालिया कदम जैसे वेनेजुएला पर सैन्य हमला, कोलंबिया को धमकी, क्यूबा की नाकेबंदी और अब ईरान पर हमला असल में अमेरिका की वैश्विक रणनीति का हिस्सा हैं. इन सब का मकसद अंततः चीन के साथ मुकाबला करना ही है.
अमेरिका और पश्चिमी देश लगातार चीन, रूस, उत्तर कोरिया, क्यूबा, वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों को एक ही श्रेणी में रखते आए हैं. फिलहाल, अमेरिका चीन के साथ सीधे और बड़े टकराव से बच रहा है, लेकिन वह इस समूह के अन्य देशों को एक-एक करके निशाना बना रहा है. यह एक ऐसा पैटर्न है जिस पर चीन को गंभीरता से ध्यान देने और रूस जैसे समान विचारधारा वाले देशों के साथ तालमेल बैठाने की जरूरत है.
रूस-चीन और ईरान का भविष्य
China Public Diplomacy Association के पूर्व अध्यक्ष वू हैलोंग ने हाल ही में '2026 चीन-रूस सान्या डायलॉग' में तर्क दिया कि अगर अमेरिका ईरानी शासन को उखाड़ फेंकने में सफल हो गया, तो यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक बहुत बुरा उदाहरण पेश करेगा. उनके अनुसार इससे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स (BRICS) की साख को नुकसान पहुंचेगा. मध्य पूर्व में चीन और रूस का प्रभाव कम हो जाएगा. इससे चीन और रूस के राष्ट्रीय हितों को सीधा और बड़ा नुकसान होगा.
ईरान का अमेरिका-विरोधी रुख आज भी चीन और रूस के लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद है, क्योंकि यह अमेरिका की ताकत और संसाधनों को उलझाए रखता है. उनका यह भी मानना है कि फिलहाल ईरान की सरकार के गिरने की संभावना कम है, और चीन व रूस को उसे ’बचाने’ के लिए कुछ प्रयास जरूर करने चाहिए.
चीन कैसे हस्तक्षेप कर सकता है?
खबरों के मुताबिक, ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों ने, जिन्हें शायद रूस से खुफिया जानकारी और नेविगेशन (रास्ता दिखाने) में मदद मिली, पश्चिमी एशिया के कई देशों में अमेरिकी रडार और मिसाइल विरोधी ठिकानों को तबाह कर दिया है. चीन के रणनीतिक विशेषज्ञों का एक हिस्सा मानता है कि चीन को भी इसमें दखल देना चाहिए, लेकिन 'लो-प्रोफाइल' रहकर (यानी पर्दे के पीछे से), ताकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आगामी चीन यात्रा में कोई खलल न पड़े.
कूटनीतिक स्तर पर चीन ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की हत्या (अमेरिका और इजरायल द्वारा) की कड़ी निंदा की है और ईरान पर सैन्य हमलों का विरोध किया है. 8 मार्च को चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इन सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए कहा कि ’ताकत का मतलब यह नहीं कि आप सही हैं’ और ’दुनिया वापस जंगल राज के दौर में नहीं जा सकती.’
आगे बढ़ते हुए चीन की रणनीति कुछ इस तरह दिखती है-
शांति वार्ता का दबाव: चीन नैतिक आधार पर खुद को सही बताते हुए अमेरिका और इजरायल पर शांति वार्ता के लिए दबाव बनाएगा. वह उन्हें हमले रोकने और ईरान के नए नेताओं की हत्या न करने की सलाह देगा, ताकि युद्ध की तीव्रता कम हो सके.
पड़ोसियों से सुलह: चीन अपनी सक्रिय कूटनीति से ईरान और अन्य मध्य पूर्वी देशों (जैसे सऊदी अरब और यूएई) के बीच कड़वाहट कम करने की कोशिश कर रहा है, ताकि वे ईरान के खिलाफ एकजुट न हों. इसके लिए चीन अपना विशेष दूत भी भेज रहा है.
आर्थिक मदद: चीन ईरान के साथ व्यापार जारी रखना चाहता है ताकि ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह न चरमराए और सरकार के पास पैसों की कमी न हो. साथ ही, चीन रूस, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशों को भी अपने-अपने तरीके से ईरान की सैन्य और आर्थिक मदद करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है.
कुल मिलाकर, चीन चाहे खुले तौर पर हो या छिपकर, सीधे या किसी और के जरिए, ईरान को जरूरी खुफिया जानकारी और ऐसी चीजें (Dual-use supplies) पहुंचा सकता है जो युद्ध और सिविलियन, दोनों में इस्तेमाल हो सकें. मकसद साफ है, ईरान को इतना सक्षम बनाना कि वह अमेरिका के खिलाफ एक ’लंबी जंग’ लड़ सके.
(अंतरा घोषाल सिंह, नई दिल्ली के ओआरएफ (ORF) में 'स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम' की फेलो हैं. उन्होंने चीन की सिंघुआ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है और ताइवान की नेशनल सेंट्रल यूनिवर्सिटी से चीनी भाषा की पढ़ाई की है)