चीन में 'शानझाई' (Shanzhai) शब्द की अपनी मकबूलियत है. इसका मतलब होता है डकैतों का अड्डा या उनके कब्जे वाला इलाका. माडर्न टाइम में चीन में शानझाई का पर्याय वे इलाके बन गए जहां दुनियाभर का पायरेटेड या नकली सामान बनाया जाता है. वही जिसे भारत में हम ‘नो गारंटी’ वाला सामान कहते हैं. चले तो चांद तक, नहीं तो शाम तक.
चीन की तरक्की की कहानी दुनिया के लिए एक पहेली जैसी रही है. लेकिन इस सफलता के पीछे उसकी कामयाब कॉपी कैट पॉलिसी है. चीन ने कभी इस बात पर शर्म महसूस नहीं की कि वह दूसरों की नकल कर रहा है. बल्कि उसने इसे अपनी ताकत बना लिया. आज चीन दुनिया का इनावेशन हब बनने की राह पर है, लेकिन इसकी नींव नकल पर ही टिकी है. आइये समझते हैं कि कैसे चीन ने नकल को पहले एक आर्ट, और फिर एक कामयाब बिजनेस स्ट्रेटेजी में बदल दिया.
'नो शेम इन कॉपी' और 'फास्ट फॉलोअर' रणनीति
हम AI समिट में दिखाए गए चीनी रोबोट पर हंस सकते हैं और उसकी आलोचना कर सकते हैं. लेकिन चीन के बिजनेस कल्चर में एक बात साफ है- 'नकल करने में कोई शर्म नहीं है.' पश्चिमी देशों में जहां 'ऑरिजिनैलिटी' यानी कुछ नया बनाने पर जोर दिया जाता है, वहीं चीन ने 'फास्ट फॉलोअर' (Fast Follower) रणनीति को अपनाया. इसका मतलब बहुत सीधा है. अगर कोई आइडिया दुनिया के किसी भी बाजार में हिट हो गया है, तो उसे नए सिरे से (from the scratch) बनाने में समय और पैसा बर्बाद क्यों करना? चीन की कंपनियां उस सफल आइडिया को उठाती हैं, उसे थोड़ा सा बदलती हैं और बहुत ही कम कीमत पर बाजार में उतार देती हैं. यह सुरक्षित भी है और सस्ता भी.
चीन में कॉपीकैट पॉलिसी के सबसे बड़े मार्केटिंग गुरु
प्रो. शियांग बिंग को चीन में कॉपीकैट पॉलिसी का पितामह माना जाता है. 2002 में चीन के सबसे बड़े मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में से एक च्युंग कांग ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस की स्थापना करने वाले प्रो. बिंग के स्टूडेंट्स आज अलीबाबा, टिकटॉक जैसी कंपनियों की लीडरशिप पोजिशन पर हैं. जानिए, वे ग्रोथ के लिए कॉपी की महत्ता को कैसे समझाते हैं-
आप दौड़ने से पहले चलना सीखते हैं, और उससे पहले किसी का सहारा लेकर खड़ा होना. इसलिए अपनी ग्रोथ के लिए किसी की नकल करना गलत नहीं है. इसलिए नकल करने से डरिए मत. पावर ऑफ रेप्लिकेशन को पहचानिए. आज डीपसीक जैसी चाइनीज AI कंपनियों की ये कामयाबी ही है, जो अमेरिकी कॉम्पिटीशन से न सिर्फ लड़ रही हैं, बल्कि जीत भी रही हैं.
मोबाइल और गैजेट इंडस्ट्री: शाओमी बना चीन का 'ऐपल'
चीन की मोबाइल इंडस्ट्री इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जब ऐपल ने आईफोन लॉन्च किया, तो चीन की कंपनियों ने केवल फोन ही नहीं, बल्कि ऐपल के स्टोर और स्टीव जॉब्स के बोलने के अंदाज तक की नकल की. शाओमी (Xiaomi) को एक समय 'चीन का ऐपल' कहा जाता था. इसके फाउंडर लेई जुन (Lei Jun) अक्सर स्टीव जॉब्स की तरह जींस और काली टी-शर्ट पहनकर स्टेज पर आते थे. शाओमी के फोन का सॉफ्टवेयर (MIUI) और डिजाइन पूरी तरह आईफोन से प्रेरित होता था. लेकिन चीन ने यहां एक दिमाग लगाया. उन्होंने आईफोन जैसे दिखने वाले फोन को आधी से भी कम कीमत पर बेचना शुरू किया. आज शाओमी दुनिया की सबसे बड़ी स्मार्टफोन कंपनियों में से एक है. सिर्फ शाओमी ही नहीं, Oppo, Vivo और Realmi जैसी कंपनियों ने भी इसी रास्ते पर चलकर सैमसंग और ऐपल जैसी दिग्गज कंपनियों को कड़ी टक्कर दी है. और कई मार्केट में तो पछाड़ा भी है.

सभी फेमस ग्लोबल कारों की बना डाली चाइनीज कॉपी
चीन की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में तो नकल की हदें पार कर दी गईं. वहां आपको ऐसी कारें मिल जाएंगी जो देखने में बिल्कुल रेंज रोवर, पोर्श या मर्सिडीज जैसी लगती हैं. 'लैंडविंड X7' (Landwind X7) हूबहू 'रेंज रोवर इवोक' की कॉपी थी. 'सुझाऊ इगल' (Suzhou Eagle) ने तो पोर्श के लोगो और फेरारी के डिजाइन को मिलाकर एक अजीब हाइब्रिड कार बना डाली. ग्लोबल कंपनियों ने चीन की अदालतों में केस भी किए, लेकिन चीनी कानूनों ने हमेशा अपनी घरेलू कंपनियों का ही साथ दिया. चीन का मानना है कि मास अपील के लिए डिजाइन की नकल करना कोई गुनाह नहीं है.

एक्वायर, री-ब्रांड और राज करो
चीन ने केवल नकल ही नहीं की, बल्कि जब उसके पास पैसा आया तो उसने दुनिया के बड़े ब्रांड्स को खरीदना शुरू कर दिया. इसे 'एक्वायर एंड री-ब्रांड' रणनीति कहते हैं. स्वीडन की इस मशहूर और सुरक्षित कार कंपनी वोल्वो (Volvo) को चीन की 'गीली' (Geely) ने खरीद लिया. आज वोल्वो की तकनीक का इस्तेमाल चीन अपनी कारों को बेहतर बनाने में कर रहा है. इसी तरह कारों का ब्रिटिश ब्रांड मॉरिस गैराज यानी एमजी मोटर्स (MG Motors) अब चीन की SAIC कंपनी चलाती है. कभी अमेरिका की शान रही मोटोरोला (Motorola) को चीन की 'लेनोवो' ने खरीदा. चीन ने इन ब्रांड्स की साख और उनकी टेक्नोलॉजी को खरीदा और फिर दुनिया भर में अपने नाम से बेचना शुरू कर दिया.
चीनी सरकार का रोल: फंडिंग और सब्सिडी
फंडिंगः चीन की इस 'कॉपी कैट' इंडस्ट्री के पीछे कम्युनिस्ट सरकार का बहुत बड़ा हाथ है. चीन की सरकार अपनी कंपनियों को 'अनलिमिटेड' फंडिंग और सब्सिडी देती है.
सिक्योरिटीः इतना ही नहीं वह उन्हें एक तगड़ा कानूनी सुरक्षा कवच भी मुहैया कराती हैं. चीन ने अपने देश में गूगल, फेसबुक और ट्विटर जैसे विदेशी दिग्गज टेक कंपनियों को बैन कर दिया. इससे बायडू (Baidu), वीचैट (WeChat) और वीबो (Weibo) जैसी कंपनियों को फलने-फूलने का मौका मिला. यह भी एक तरह की नकल ही थी. पूरा फॉर्मेट और आर्किटेक्चर वही, बस चीनी नाम के साथ अपने देश के लिए अलग वर्जन बना लिया.
सस्ती जमीन और बिजली: सरकार फैक्ट्रियों के लिए मुफ्त या बहुत सस्ती जमीन और बिजली मुहैया कराती है, जिससे प्रोडक्शन की लागत गिर जाती है.
कमजोर बौद्धिक संपदा कानून: चीन में कॉपीराइट नियम बहुत ढीले हैं. अगर कोई विदेशी कंपनी चीन में अपना प्लांट लगाती है, तो उसे अपनी टेक्नोलॉजी चीनी पार्टनर के साथ शेयर करनी पड़ती है. चीन इसी टेक्नोलॉजी को चुराकर अपनी घरेलू कंपनियों को दे देता है.
नकल से इनोवेशन की ओर
आज चीन अपनी 'कॉपी कैट' वाली छवि को तेजी से बदल रहा है. चीन को समझ आ गया है कि सिर्फ नकल से वह दुनिया पर राज नहीं कर सकता. चीन अब दुनिया में सबसे ज्यादा पेटेंट फाइल करने वाला देश बन गया है. वह भविष्य की तीन बड़ी चीजों पर अरबों डॉलर निवेश कर रहा है:
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा डेटा सेट है, जो AI को सिखाने के लिए जरूरी है. फेशियल रिकग्निशन और सर्विलांस में चीन आज दुनिया में सबसे आगे है.
रोबोटिक्स: चीन की फैक्ट्रियां अब इंसानों से ज्यादा रोबोट्स पर निर्भर हो रही हैं. वे खुद के एडवांस इंडस्ट्रियल रोबोट बना रहे हैं.
इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV): आज दुनिया की सबसे बड़ी EV कंपनी टेस्ला नहीं, बल्कि चीन की BYD है. चीन ने बैटरी टेक्नोलॉजी में इतनी बढ़त बना ली है कि अब अमेरिका और यूरोप की कंपनियां भी उनसे पीछे हैं.
चीन का सफर 'नकल' से शुरू हुआ था, लेकिन अब वह 'अकल' की रेस में सबको पीछे छोड़ना चाहता है. उसने दुनिया को दिखा दिया कि अगर आपके पास बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन करने की क्षमता और सरकार का साथ हो, तो आप दूसरों के आइडिया को अपना बनाकर पूरी दुनिया का बाजार जीत सकते हैं. चीन का यह मॉडल नैतिकता के पैमाने पर भले ही गलत लगे, लेकिन आर्थिक तरक्की के लिहाज से यह बेहद कामयाब रहा है. आज जो चीन नकल पर हंसता था, वही अब दुनिया को अपनी नई टेक्नोलॉजी से डरा रहा है.
भारत के लिए सबक
जब दुनिया ग्लोबलाइजेशन से कदम पीछे खींच रही है तो भारत जैसे देश के लिए चुनौतियां सबसे ज्यादा है. डेढ़ अरब की आबादी का भरण-पोषण करना है और निर्भता विदेशी सामान पर. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर के विकास पर जोर दे रहे हैं. ताकि न सिर्फ घरेलू जरूरत की भरपाई हो सके, बल्कि ग्लोबल सप्लाय चेन में भी भारत का हिस्सा बड़ा हो सके. चीन ने इस परिस्थिति को दशकों पहले भांप लिया था. उसने साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाई और अपने मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर पर ही फोकस रखा. आप नकल कहिए या चोरी, चीन ने अपनी आर्थिक विकास की गाड़ी रफ्तार देने के लिए परवाह नहीं की कि उसका ईंधन कहां से आ रहा है.
जहां तक भारत की बात है, वह चीन नहीं हो सकता. न तो चीन के जैसी तानाशाही है, और न ही खुलेआम नैतिकता से समझौता करने का साहस. भारतीय सस्ता चीनी सामान खरीद सकते हैं, लेकिन दुनिया को बेचने के लिए नकली सामान बनाने से पहले दस बार सोचेंगे. भारतीय चिंतन में यह बात मंजूर नहीं हो सकती कि कोई आपके प्रोडक्ट के बारे में कहा जाए कि इसकी कोई गारंटी नहीं है. जैसा चीनी प्रोडक्ट के लिए कहा जाता है. ऐसे में इनोवेशन से जुड़े युवाओं के लिए यही पैगाम हो सकता है कि वे दुनिया की बहतरीन टेक्नोलॉजी से इंस्पायर जरूर हों, लेकिन उसमें कुछ अपना वैल्यू एडिशन करें. जिसे हम गर्व से अपना कह पाएं.