बीएमसी चुनाव के मुंबई में शिवसेना की रिजॉर्ट पॉलिटिक्स शुरू हो गई है. महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने बीएमसी चुनाव जीतने वाले अपने 29 नगरसेवकों को एक होटल में ठहराया है. एकनाथ शिंदे अपने नगरसेवकों से होटल जाकर मिले भी हैं, और तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर शेयर की है.
बीएमसी चुनाव के नतीजे आने के अगले दिन एकनाथ शिंदे कैबिनेट की बैठक में भी नहीं पहुंचे. ऐसे में उद्धव ठाकरे सहित राजनीतिक विरोधियों को बोलने का भी मौका मिल गया. महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में एकनाथ शिंदे के ऐक्ट की खूब चर्चा है.
एकनाथ शिंदे अपने पार्षदों को वैसे ही होटल ले गए हैं, जैसे विधायकों को कुछ खास परिस्थितियों में राजनीतिक दल होटल या रिजॉर्ट में भेज दिया करते हैं. सवाल ये है कि क्या एकनाथ शिंदे को भी अपने पार्षदों को लेकर वैसा ही डर सता रहा है, जैसा विधायकों के मामले में सुना जाता है? खरीद फरोख्त का डर या कुछ के टूट जाने का?
मुंबई में शिंदे सेना की रिजॉर्ट पॉलिटिक्स
बीएमसी को लेकर मुंबई में 2019 जैसा हाल बताया जा रहा है. तब उद्धव ठाकरे और बीजेपी नेतृत्व में मुख्यमंत्री पद को लेकर ठनी थी. ढाई-ढाई साल के लिए बंटवारे को लेकर. अब वैसा ही बीएमसी के मेयर पद को लेकर सुनने में आ रहा है. कहते हैं, एकनाथ शिंदे ने ऐसी कोई लिखित या औपचारिक डिमांड नहीं पेश की है, लेकिन नगरसेवकों को होटल ले जाकर दबाव बनाने की कोशिश का मकसद वही है. बताते हैं कि नगरसेवक मसले का हल निकाले जाने तक वहां रखे जा सकते हैं.
नगरसेवकों को होटल ले जाए जाने के मुद्दे पर एकनाथ शिंदे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस दोनों के बयान आ चुके हैं. सार्वजनिक तौर पर न तो एकनाथ शिंदे मामले को तूल देने की कोशिश कर रहे हैं, और न ही देवेंद्र फडणवीस अपनी बातों से किसी तरह तूल देने की कोशिश कर रहे हैं. देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि मुंबई में आपसी सहमति से महायुति का मेयर बनेगा.
मामले को डाउनप्ले करते हुए देवेंद्र फडणवीस कहते हैं, जैसे मैं पुणे में अपने नवनिर्वाचित पार्षदों के साथ बैठक कर रहा हूं, वैसे ही एकनाथ शिंदे ने भी मुंबई में बैठक बुलाई है... पार्षदों की खरीद-फरोख्त का कोई सवाल ही नहीं है.
देवेंद्र फडणवीस का दावा है, एकनाथ शिंदे, मैं और दोनों पार्टियों के अन्य नेता जल्द ही मिलेंगे, और मुंबई के मेयर पद पर जल्द ही फैसला लिया जाएगा... कोई मतभेद नहीं हैं... सब कुछ शांति से हो रहा है... हम मिलकर मुंबई की अच्छे से सेवा करेंगे.
एकनाथ शिंदे भी वैसे ही समझाते हैं, नए पार्षदों को एक साथ लाने का मुख्य मकसद है कि वे एक-दूसरे को बेहतर तरीके से जान समझ सकें... उनके बीच विचारों का आदान-प्रदान होगा, और वे पुराने पार्षदों से सीख सकेंगे कि प्रस्ताव कैसे तैयार किए जाते हैं.
शिंदे अपनी हदें भी जानते हैं, और ये भी कि बीजेपी को शिवसेना की अब भी जरूरत है
2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद एकनाथ शिंदे को अब जाकर कोई मौका मिला है, जब वो बीजेपी के साथ थोड़ा मोलभाव कर सकें. विधानसभा चुनाव से पहले वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, और देवेंद्र फडणवीस डिप्टी सीएम. चुनाव नतीजों ने सारे ही समीकरण बदल डाले. अलग अलग तरीके से दबाव बनाने और रूठकर गांव तक चले गये थे, लेकिन बीजेपी नेतृत्व की सख्ती, और देवेंद्र फडणवीस के अडिग रह जाने के कारण दाल नहीं गली.
बीएमसी चुनाव में भी बीजेपी एकनाथ शिंदे की पहले जैसी ही जरूरत है, और विधानसभा चुनाव की ही तरह उसने पहले से ही सब कुछ प्लान कर लिया था, ये बात एकनाथ शिंदे भी महसूस कर रहे हैं, लेकिन कोशिशें तो की ही जा सकती हैं.
1. बीएमसी में 29 पार्षद लेकर एकनाथ शिंदे यदि 88 पार्षदों वाली बीजेपी से मेयर पद मांगेंगे, तो वे उद्धव ठाकरे की कहानी दोहराएंगे. लेकिन, क्या एकनाथ शिंदे ऐसी गलती करेंगे? नहीं करेंगे.
बीएमसी चुनाव में भी बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. बीजेपी ने 89 सीटों पर जीत दर्ज की है, और एकनाथ शिंदे की सेना को 29 सीटें मिली हैं. लेकिन, ये आंकड़े बीजेपी को शिवसेना के बगैर मेयर बनाने का मौका नहीं देते.
227 सीटों वाली बीएमसी में बहुमत का आंकड़ा 114 और बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को 118 सीटें मिली हैं. यानी, बहुमत का न्यूनतम आवश्यक नंबर से महज 4 सीटें ज्यादा. ऐसे में अंतर बहुत कम है, और थोड़ा सा भी बदलाव बीएमसी के सत्ता समीकरण को गड़बड़ कर सकता है.
2. बीएमसी में सीटों के बंटवारे के साथ ही ये भी तय हो गया था कि बीजेपी का अपर हैंड रहेगा. बिल्कुल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 जैसा ही. बीएमसी की 227 सीटों में से बीजेपी 135 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जबकि एकनाथ शिंदे के हिस्से में 89 सीटें आई थीं.
लड़ी गई सभी सीटें तो दोनों में से कोई भी नहीं जीत पाता. अगर किसी तरह एकनाथ शिंदे ज्यादा सीटें भी जीत जाएं, तो बीजेपी से पीछे ही रहें - बीजेपी ने पहले से ही ऐसा इंतजाम कर रखा था.
3. बीएमसी के मेयर पद के लिए एकनाथ शिंदे वैसी जिद कभी नहीं करेंगे जैसी उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद के लिए की थी. तब की बात और थी, अब बहुत कुछ बदल चुका है. तब उद्धव ठाकरे के पास बीजेपी को छोड़कर नए गठबंधन का विकल्प था, और वैसा किए भी. एकनाथ शिंदे फिलहाल डिप्टी सीएम हैं, और आने वाला समय (कम से कम 2029 तक) एनडीए में ज्यादा सुरक्षित है.
4. अगर मेयर पद के कार्यकाल को लेकर बीएमसी और शिवसेना में कुछ बंटवारा हो जाए तो वो एकनाथ शिंदे की बड़ी जीत होगी. एकनाथ शिंदे की तरफ से बीएमसी में मेयर के आधे कार्यकाल की मांग की गई है. अगर किसी मजबूरी में बीजेपी इस बात के लिए राजी हो जाती है, तो एकनाथ शिंदे का दोबारा मुख्यमंत्री न बन पाने का दर्द थोड़ा कम हो जाएगा.
बीजेपी के लिए महाराष्ट्र में बिहार जैसी जरूरत नहीं है. बीजेपी के पास देवेंद्र फडणवीस हैं. लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में पूरी तरह पैठ बनाने के लिए बीजेपी को अब भी शिवसेना की जरूरत है. महाराष्ट्र में भी बीजेपी बिहार की ही तरह धीरे धीरे कदम बढ़ा रही है.
5. शिवसेना और बीजेपी के बीच मुद्दा सिर्फ बीएमसी मेयर पद का ही नहीं है, कुछ और भी नगर निगम ऐसे हैं जहां हाल मिलता जुलता ही है. बीजेपी और शिवसेना के बीच कल्याण-डोंबीवली और उल्हासनगर में भी मामला बीएमसी की ही तरह फंसा हुआ है.
कल्याण-डोंबीवली की 122 सीटों में बीजेपी को 50 सीटें हासिल हुई हैं, और शिवसेना ने 53 सीटों पर जीत दर्ज की है. फासला भले ज्यादा न हो लेकिन वहां तो शिवसेना के पास ही 3 सीटें ज्यादा हैं. ऐसे में कल्याण-डोंबीवली में बड़ा दावा तो एकनाथ शिंदे का ही बनता है.
और, उल्हासनगर का भी मामला मिलता जुलता ही है. उल्हासनगर में 78 सीटें हैं, जहां बीजेपी 37 सीटों पर जीती है, और शिवसेना को 36 सीटें मिली हैं. महज एक सीट कम है.
6. एकनाथ शिंदे बीएमसी में भी विभागों का बंटवारा महाराष्ट्र सरकार जैसा ही चाहेंगे. जैसे गृह मंत्रालय सहित कुछ विभागों को लेकर उस वक्त जिद पर अड़े थे. वैसे ही बीएमसी में भी वो चाहेंगे कि यदि मेयर बीजेपी का हो तो अहम विभागों का इंचार्ज शिवसेना के पार्षदों में से बनाया जाए.
7. उधर, उद्धव ठाकरे और उनकी पार्टी के कार्यकर्ता यदि एकनाथ शिंदे की होटल पॉलिटिक्स का मजाक बना रहे हैं तो ये उनका हक है. वैसे, ये होटल पॉलिटिक्स तो उन्होंने भी की थी. बीएमसी सभी के लिए अहम है. एकनाथ शिंदे भी नहीं छोड़ना चाहते, और बीजेपी किसी भी सूरत में नहीं छोड़ना चाहेगी. भविष्य के लिए कोई मुसीबत बनाकर तो नहीं ही रखेगी.
एक्सचेंज ऑफर का स्कोप तो है ही. एकनाथ शिंदे की शिवसेना के पार्षद भले होटल में हैं, लेकिन उनका फायदा इसी में है कि होटल का किराया बीजेपी दे दे. यानी, एकनाथ शिंदे अपनी कुछ शर्तें मनवा लें. बीएमसी के बदले महाराष्ट्र की दूसरी अहम नगर निगमों में अपने मेयर के लिए समर्थन ले लें - और सौदा पट जाए.
8. बीजेपी और शिवसेना के झगड़े में उद्धव ठाकरे को भी उम्मीद नजर आ रही है. उद्धव ठाकरे ने कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत में कहा है कि मुंबई में शिवसेना (यूबीटी) का मेयर बनाना मेरा सपना है, और अगर देवा (ईश्वर) की कृपा रही तो ये सपना साकार होगा. सपना पूरा करने के लिए ही उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे से हाथ मिलाया था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान देवेंद्र फडणवीस को देवा-भाऊ कह कर बुलाया जाता रहा. चुनाव बाद कुछ दिनों तक देवेंद्र फडणवीस के ऑफर पर उद्धव ठाकरे के फिर से बीजेपी के साथ जाने को लेकर काफी जोरदार चर्चा रही. जब ये सवाल देवेंद्र फडणवीस से पूछा जाता है, तो वो भी उसी अंदाज में पूछते हैं कि क्या उद्धव ठाकरे के देवा का आशय भी देवा-भाऊ से ही है?
9. ऐसा माना जा रहा है कि एकनाथ शिंदे को पार्षदों के पाला बदलने का डर सता रहा है. डर ये लग रहा है कि पार्षद उनको छोड़कर बीजेपी के साथ न चले जाएं. लेकिन तब क्या होगा, अगर होटल से ही एकनाथ शिंदे के पार्षद उद्धव ठाकरे का रुख कर लेते हैं?
क्या एकनाथ शिंदे भी बीजेपी के खिलाफ उसी मोड़ पर पहुंच गए हैं, जहां से उद्धव ठाकरे की बर्बादी शुरू हुई थी? और, सवाल ये भी है कि बर्बादी बीजेपी की वजह से होगी या उद्धव ठाकरे को बदला पूरा करने का मौका मिलेगा?