लोकसभा, विधानसभा, पंचायत और अब नगर निगम... लगातार चौथे चुनाव में एकनाथ शिंदे और उनकी पार्टी ने न सिर्फ अपना प्रदर्शन बेहतर किया है, बल्कि बाला ठाकरे की विरासत पर कब्जा भी कर लिया है. महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों के चुनाव में बीजेपी को भले बढ़त मिली हो, लेकिन उसकी यह जीत एकनाथ शिंदे के समर्थन बिना अधूरी है. उन्होंने न सिर्फ ठाकरे बंधुओं के आक्रामक मराठी मानुष के मुद्दे को न्यूट्रल बनाया, बल्कि बीजेपी को बड़ी जीत हासिल करने में भी मदद की. BMC जैसी अहम नगर निगम में भी भाजपा का मेयर उनके समर्थन के बिना नहीं बन सकता.
ठाकरे बंधुओं के प्रभाव वाली BMC में एकनाथ शिंंदे की शिवसेना ने 90 वार्डों में चुनाव लड़कर 30 में बढ़त हासिल कर ली है. जबकि उसकी सहयोगी बीजेपी 135 में से 90 वार्डों पर आगे है. यानी, यहां शिंदे सेना और बीजेपी ने मिलकर ठाकरे का किला ढहा दिया. उद्धव के जख्मों पर नमक छिड़कने वाली बात ये होगी कि वे खुद तो अपना किला नहीं बचा पाए, लेकिन एकनाथ शिंदे ने अपने गढ़ ठाणे की नगर निगम में एकतरफा बढ़त बना ली है. इसके अलावा कल्याण-डोंबीवली और उल्हासनगर में भी उन्होंने बीजेपी के बराबर सीट हासिल कर ली है. इस बात की पूरी संभावना है कि बीजेपी BMC में एकनाथ शिंदे की मदद के बदले आसपास की 3 नगर निगमों में उनको मेयर पद के लिए समर्थन दे दे.
सवाल उठता है कि आखिर शिंदे कैसे मराठियों के हीरो बनकर उभरे? उनकी खासियत क्या है कि ठाकरे बंधुओं के नारे को उन्होंने विकास और व्यावहारिक राजनीति में बदल दिया? शिंदे को मिली सफलता के कई कारण हैं.
1-ठाकरे बंधुओं से भिड़ने की बजाए बैलेंस अप्रोच अपनाया शिंदे ने
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ तमाम मतभेद और मनभेद के बावजूद गठबंधन के लिए शिंदे ने बैलेंस अप्रोच अपनाया. फडणवीस के साथ मिलकर शिंदे ने महायुति को एकजुट रखा. ठाकरे को बकासुर कहकर उन्होंने मराठी वोटरों को अपील की कि शिंदे ही बालासाहेब की असली विरासत हैं.
बाल ठाकरे की विरासत पर आधारित ठाकरे परिवार ने हमेशा मराठी मानूष को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया. 2026 चुनावों में उद्धव और राज ठाकरे का 20 साल बाद एकजुट होना इसी नारे की वापसी थी. जुलाई 2025 में हिंदी को तीसरी भाषा बनाने के विवाद से शुरू हुए गठबंधन ने शिवाजी पार्क रैली में मराठी प्राइड का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया.
उद्धव ने कहा, मराठी मानूष की अस्मिता पर हमला हो रहा है, जबकि राज ने दक्षिण भारतीयों को लुंगी उतारो-पुंगी बजाओ जैसे पुराने नारों से भयभीत करने की कोशिश की. लेकिन मुंबई की जनसांख्यिकी बदल चुकी है. मराठी वोटर अब कुल 35-38% हैं, जबकि उत्तर भारतीय (25%), गुजराती, दक्षिण भारतीय और अन्य समुदायों का वोट गैर-मराठी है. ठाकरे गठबंधन का फोकस सिर्फ मराठी पर रह गया, जिससे गैर-मराठी वोट महायुति की ओर शिफ्ट हो गए.
उद्धव की सेकुलर इमेज ने पारंपरिक हिंदू-मराठी वोट को शिंदे की ओर धकेल दिया. परिणामस्वरूप, ठाकरे का नारा चिल्लाहट तक सीमित रह गया, जबकि शिंदे ने इसे व्यावहारिक फायदे में बदल दिया.
2-गठबंधन कैसे चलाया जाता है ये भी दिखाया
एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र की राजनीति में केवल सत्ता परिवर्तन ही नहीं किया, बल्कि यह भी दिखाया कि गठबंधन कैसे चलाया जाता है. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाविकास आघाड़ी सरकार बार-बार आंतरिक असंतोष, संवादहीनता और निर्णयों में विलंब का शिकार रही. कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन मजबूरी का समझौता बनकर रह गया था, जिसमें शिवसेना के कार्यकर्ता खुद को असहज महसूस करते थे.
उद्धव ठाकरे का रवैया अक्सर अड़ियल और एकतरफा माना गया. आरोप है कि वहां न तो सहयोगियों से खुला संवाद है और न ही पार्टी के भीतर असहमति के लिए जगह.
इसके ठीक उलट, एकनाथ शिंदे ने भाजपा के साथ सरकार बनाते समय समन्वय और संतुलन को अपनी प्राथमिकता बनाया. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने यह संदेश साफ दिया कि गठबंधन में वरिष्ठ-कनिष्ठ का नहीं, साझेदारी का भाव होना चाहिए भाजपा जैसे बड़े सहयोगी के साथ रहते हुए भी शिंदे ने न तो टकराव की राजनीति की, न ही आत्मसमर्पण का संकेत दिया. वे दिल्ली और मुंबई के बीच सेतु बने. जहां जरूरत पड़ी, वहां बातचीत से रास्ता निकाला.
शिंदे की कार्यशैली में सबसे अहम तत्व रहा सहयोगियों को साथ लेकर चलना. मंत्रिमंडल विस्तार हो या नीतिगत फैसले, उन्होंने भाजपा नेतृत्व और अपने विधायकों दोनों को विश्वास में लिया. यही कारण है कि उनकी सरकार में सार्वजनिक मतभेद या सत्ता के भीतर खींचतान कम नजर आई. यह गठबंधन मजबूरी नहीं, बल्कि कामकाजी साझेदारी के रूप में सामने आया.
नगर निगम और बीएमसी चुनावों की तैयारी में भी यह फर्क साफ दिखा. जहां उद्धव ठाकरे गठबंधन सहयोगियों से तालमेल बिठाने में हिचकते रहे, वहीं शिंदे ने सीटों, रणनीति और जमीनी समीकरणों पर स्पष्ट संवाद रखा. इससे यह संदेश गया कि शिंदे सत्ता के अकेले केंद्र नहीं, बल्कि टीम लीडर हैं.
कुल मिलाकर, एकनाथ शिंदे ने यह साबित किया कि गठबंधन अहंकार से नहीं, संवाद, भरोसे और व्यावहारिकता से चलता है. और यही बात उन्हें उद्धव ठाकरे की राजनीति से अलग खड़ा करती है.
3-बताया क्यों मजबूत है रिमोट वाली राजनीति के आगे जमीनी पकड़
मराठी राजनीति में छवि का बहुत महत्व रहा है. एकनाथ शिंदे ने खुद को हमेशा मैदान में रहने वाला कार्यकर्ता” के रूप में प्रस्तुत किया. ठाणे, मुंबई और कोंकण बेल्ट में उनकी पहचान एक ऐसे नेता की रही जो कार्यकर्ताओं के साथ बैठता है, उनके सुख-दुख में शामिल होता है.
इसके विपरीत, उद्धव ठाकरे की छवि धीरे-धीरे घर से शासन करने वाले नेता की बनती गई. कोविड काल में यह छवि और मजबूत हुई. नगर निगम चुनावों में, जहां स्थानीय संपर्क निर्णायक होता है, शिंदे की जमीनी छवि ने मराठी मतदाता को आकर्षित किया.
2023-2024 में मनोज जरंगे पाटिल के आंदोलन में शिंदे ने जीआर सौंपा, 25 मिलियन से अधिक मराठों के लिए आरक्षण का रास्ता खोला. ठाकरे सरकार में यह नहीं हुआ, जिससे मराठा वोट शिंदे की ओर शिफ्ट हुए. चुनावों में यह मुद्दा केंद्रीय रहा.
लाड़की बहिन योजना (महिलाओं को 1500 रुपये मासिक), वारकरी पेंशन, पंढरपुर यात्रा सुविधाएं, समृद्धि महामार्ग, थाणे मेट्रो आदि मराठी बहुल इलाकों में असरदार रहीं. फडणवीस के साथ मिलकर शिंदे ने विकास पुरुष की इमेज बनाई.
4- बनाया हिंदुत्व और मराठी अस्मिता का अजेय मिश्रण
शिंदे ने बाल ठाकरे की हिंदुत्व विचारधारा को बरकरार रखा. उद्धव की कांग्रेस गठबंधन को तुष्टिकरण बताकर उन्होंने हिंदू-मराठी वोट साधा. मराठी मेयर का नारा देकर ठाकरे के नारे को अपने पक्ष में मोड़ा.
एकनाथ शिंदे ने भाजपा के साथ सत्ता साझेदारी जरूर की, लेकिन उन्होंने अपनी मराठी पहचान को भाजपा में विलय नहीं होने दिया. यह संतुलन उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता रही.
मराठी मतदाता, खासकर मुंबई और ठाणे में, भाजपा को अक्सर गैर-मराठी नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में देखता रहा है. शिंदे ने खुद को उस मराठी चेहरे के रूप में पेश किया जो भाजपा के साथ रहते हुए भी मराठी हितों की आवाज है. इसने उन्हें दिल्ली की पार्टी के सामने खड़े मराठी नेता की छवि दी.
5-फोकस में रखे जनता से जुड़े मुद्दे और विकास
मुख्यमंत्री बनने के बाद शिंदे ने शहरी विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थानीय परियोजनाओं पर जोर दिया. बीएमसी चुनावों की तैयारी में सड़कों, फ्लाईओवर, पुनर्विकास योजनाओं और झुग्गी पुनर्वास जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया.
नगर निगम चुनावों में यह संदेश दिया गया कि शिंदे सरकार और शिंदे गुट के नगरसेवक होने का मतलब है सीधा काम और फंड की आसान उपलब्धता. व्यावहारिक राजनीति में यह तर्क भावनात्मक अपील जितना ही असरदार होता है.
शिंदे अपने मुद्दों को लेकर कितने फोकस हैं, इसका अंदाजा नगरीय निकाय चुनाव में जीत के बाद आई उनकी प्रतिक्रिया में मिलता है. शिंदे से आजतक ने सवाल किया कि आपने तो ठाकरे ब्रांड को हरा दिया. इस पर उन्होंने इतना ही कहा कि चुनाव में सिर्फ 'विकास' का ब्रांड चला है.