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डर का साया या न्याय का सवाल, UGC के नए नियमों पर क्यों है बवाल?

UGC के नए नियम बहुत से छात्रों के लिए न्याय के दरवाजे खोल सकते हैं. पर सवर्ण छात्रों में जो डर पैदा हुआ है उससे इनकार भी नहीं किया जा सकता है. किसी को न्याय दिलाने के लिए कुछ लोगों के साथ अन्याय हो जाए तो उसे ठीक नहीं कहा जा सकता. न्याय बहुसंख्यक की खुशी से नहीं बल्कि सबकी सुरक्षा और सम्मान से हासिल हो सकता है.

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अलंकार अग्निहोत्री (Photo- ITG)
अलंकार अग्निहोत्री (Photo- ITG)

बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने यूजीसी के नए नियमों पर छिड़े विवाद को मुद्दा बना दिया है. सोशल मीडिया में इस विवाद को लेकर काफी दिनों से लगातार चर्चा हो रही थी. चूंकि देश के राजनीतिक दल इस संवेदनशील मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं इसलिए यह मुद्दा अभी तक दबा हुआ था. पर कितने दिन आखिर इस मुद्दे पर राजनीतिक दल मुखर नहीं होंगे. अंतत: राजनीति तो होनी ही थी. अग्निहोत्री के इस्तीफे के बाद जैसे ही देश में छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किए हैं बीजेपी हो या कांग्रेस सभी दलों के नेताओं के बयान आने शुरू हो गए हैं. कुछ दलों के प्रवक्ताओं ने भी मोर्चा संभाल लिया है. हालांकि अभी भी पार्टियां अपना स्टैंड क्लीयर नहीं कर रही हैं.

अलंकार अग्निहोत्री का कहना है कि प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों पर कथित हमले और यूजीसी के प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 के प्रावधानों के विरोध में उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. उनका कहना है कि ये नियम कैंपस में जातिगत भेदभाव रोकने के बजाए सवर्ण छात्रों के उत्पीड़न का कारण बन जाएगा. उन्होंने लगे हाथ ब्राह्मणों के उत्पीड़न के कई उदाहरण भी दे दिए. जिसके चलते ऐसा लगा कि कहीं उनकी कोई राजनीतिक मंशा तो नहीं है. क्योंकि उन्होंने ब्राह्रण सासंदों और विधायकों को उनका फर्ज भी याद  दिलाया. फिलहाल इसका उन्हें फायदा मिला और उन्हें तुरंत ही ब्राह्मण संगठनों का समर्थन मिल गया. अग्निहोत्री ने इस मुद्दे को ऐसी हवा दी कि चिंगारी शोला बनकर भड़क उठी है. तमाम चर्चित चेहरे यूजीसी के इस बिल के खिलाफ सामने आ गए हैं. कवि कुमार विश्वास हों या ब्रजभूषण शरण सिंह के सांसद पुत्र प्रतीक भूषण सिंह हो, बीजेपी विधायक और आरजेडी प्रवक्ता कंचन यादव और प्रियंका भारती आदि खुलकर यूजीसी विवाद पर अपना पक्ष रखने लगी हैं. 

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अग्निहोत्री को मिल रहे ब्राह्मण संगठनों के समर्थन से साफ है कि सामान्य जातियां खुद को निशाने पर महसूस कर रही हैं. सबसे ज्यादा हंगामा इसी बात पर है कि नए नियमों में OBC  को भी 'जातिगत भेदभाव' की कैटेगरी में शामिल किया गया है. जनरल कैटेगरी के छात्रों का मानना है कि OBC को पहले से ही आरक्षण जैसी सुविधाएं मिल रही हैं, ऐसे में उन्हें भी इस कैटेगरी में रखना बाकी छात्रों के साथ अन्याय हो सकता है. 

दरअसल हमारे देश मेंओबीसी जातियों के लिए कोई स्पष्ट मानक नहीं बन पाया है. जैसे जाट हरियाणा में सवर्ण हैं पर यूपी और राजस्थान में ओबीसी हैं.पर तीनों राज्यों के जाट आपस में बहू-बेटी का संबंध रखते हैं. ठीक इसी तरह अन्य जातियों विशेषकर राजपूतों में भी राज्यों के आधार पर पिछड़े और अगड़े का निर्धारण होता है. सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर हरियाणा का एक जाट यूपी के एक जाट का उत्पीड़न करेगा तो यूजीसी क्या अपने नियम के हिसाब से इसे जातिगत उत्पीड़न मानेगी?

वैसे ही उत्तर प्रदेश और बिहार के वैश्य समुदाय में बहुत से जातियां ओबीसी कैटगरी में आती हैं , पर उनके पास धन बल की कोई कमी नहीं है. बहुत सी ओबीसी जातियां उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक में डॉमिनेंट मानी जाती हैं. इनके पास खेती भी है और ये राजनीतिक ताकत भी रखती हैं. समाज में इन जातियों के लोग दबंग की हैसियत रखते हैं. जाहिर है कि ऐसी परिस्थिति में अन्याय की पूरी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है. किसी को न्याय दिलाने के लिए कुछ लोगों के साथ अन्याय हो जाए तो उसे ठीक नहीं कहा जा सकता. न्याय बहुसंख्यक की खुशी नहीं, बल्कि सबकी सुरक्षा और सम्मान है. एक भी व्यक्ति के साथ हुआ अन्याय पूरे न्याय को खारिज कर देता है.
 

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