मध्य प्रदेश के सीहोर जिले से एक अनोखा मामला सामने आया है. यहां के एक कारोबारी परिवार के तीसरी पीढ़ी के सदस्य ने दावा किया है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उनके दादा ने ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का ‘वॉर लोन’ दिया था, जो आज तक वापस नहीं किया गया.
65 वर्षीय व्यवसायी विवेक रुथिया का कहना है कि उनके दादा सेठ जुम्मा लाल रुथिया ने साल 1917 में ब्रिटिश प्रशासन को यह राशि दी थी. उस समय प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) चल रहा था और भारत में ब्रिटिश सरकार ने युद्ध प्रयासों के समर्थन के लिए स्थानीय नागरिकों से धन जुटाया था.
1917 में दादा ने 35 हजार रुपये का दिया था लोन
न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक रुथिया के अनुसार, उनके पास 4 जून 1917 का एक प्रमाण पत्र है, जिस पर तत्कालीन 'पॉलिटिकल एजेंट इन भोपाल' के हस्ताक्षर हैं. प्रमाण पत्र में उल्लेख है कि 'सेठ जुम्मा लाल ने इंडियन वॉर लोन के तहत 35,000 रुपये की सदस्यता ली और सरकार साम्राज्य के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई.'
विवेक रुथिया का दावा है कि उनके दादा का निधन 1937 में हुआ था और उन्होंने अपनी वसीयत में इस ऋण से जुड़े दस्तावेजों और पत्राचार का उल्लेख किया है. उनका कहना है कि ब्रिटिश शासन समाप्त होने के बाद भी यह ऋण अब तक नहीं चुकाया गया.
यूके सरकार को कानूनी नोटिस भेजने की तैयारी
रुथिया का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत एक संप्रभु राष्ट्र पर अपने पुराने ऋण चुकाने की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी होती है. वो अपने वकील से परामर्श कर यूनाइटेड किंगडम सरकार को कानूनी नोटिस भेजने की तैयारी कर रहे हैं.
स्थानीय लोगों के अनुसार, स्वतंत्रता से पहले रुथिया परिवार सीहोर और भोपाल रियासत के सबसे संपन्न परिवारों में से एक था. आज भी सीहोर शहर का बड़ा हिस्सा उनकी जमीन पर बसा हुआ है. रुथिया का दावा है कि ब्याज और समय के हिसाब से 35 हजार रुपये की वह राशि अब करोड़ों में पहुंच चुकी है.