बालाघाट जिले के तहसील मुख्यालय खैरलांजी निवासी युवक प्रसन्नजीत रंगारी आखिरकार सात साल बाद पाकिस्तान की जेल से रिहा होकर अपने घर लौट आया है. मानसिक बीमारी के चलते भटकते हुए सरहद पार कर गए प्रसन्नजीत को पाकिस्तान की जेल में सुनील अदे के नाम से बंद रखा गया था.
31 जनवरी को उनकी रिहाई हुई और अटारी-वाघा बॉर्डर पर भारतीय अधिकारियों को सौंपे जाने के बाद अब वे सुरक्षित अपने परिजनों के बीच पहुंच चुके हैं. प्रसन्नजीत की घर वापसी में बालाघाट जिला प्रशासन ने मानवीय संवेदनशीलता दिखाते हुए बड़ी भूमिका निभाई.
कलेक्टर मृणाल मीना के निर्देश पर गठित टीम अमृतसर गई और प्रसन्नजीत को लेकर लौटी. शुक्रवार शाम प्रसन्नजीत अपनी बहन के घर महकेपार पहुंचा, जहां वर्षों बाद बेटे की वापसी से परिवार में खुशी और भावुकता का माहौल है.
पढ़ाई में अव्वल, किस्मत से हारा
बालाघाट जिले के खैरलांजी में रहने वाला प्रसन्नजीत रंगारी कभी पढ़ाई में होनहार छात्र हुआ करता था. कर्ज लेकर पिता लोपचंद रंगारी ने उसे जबलपुर के गुरु रामदास खालसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बी-फार्मेसी की पढ़ाई करवाई. साल 2011 में एमपी स्टेट फार्मेसी काउंसिल में उसका एडमिशन भी हुआ. लेकिन मानसिक स्थिति बिगड़ने के बाद उसकी ज़िंदगी धीरे-धीरे बिखरती चली गई.
साल 2017-18 में प्रसन्नजीत घर से लापता हो गया. परिवार ने हर जगह तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला. समय के साथ परिजनों ने उसे मृत मान लिया…फिर दिसंबर 2021 में अचानक एक फोन कॉल आया, जिसने सब कुछ बदल दिया. पता चला कि प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में बंद है.
आखिर कैसे पहुंचा पाकिस्तान?
प्रसन्नजीत से जब मीडिया ने पाकिस्तान पहुंचने का जरिया पूछा, तो उनकी बातें विरोधाभासी थीं. उन्होंने बताया कि वे जबलपुर से दिल्ली ट्रेन से गए थे, लेकिन उसके आगे पाकिस्तान कैसे पहुंचे, इस पर वे कभी ट्रेन तो कभी किसी अन्य वाहन की बात कह रहे हैं. उनकी बहन संघमित्रा के अनुसार, प्रसन्नजीत की याददाश्त काफी धुंधली हो गई है.
31 जनवरी को पाकिस्तान ने सात भारतीय नागरिकों को रिहा किया. अटारी-वाघा बॉर्डर पर सभी को बीएसएफ के हवाले किया गया. इसके बाद इमिग्रेशन, कस्टम और मेडिकल जांच की प्रक्रिया पूरी की गई. 6 नागरिक अपने परिवारों के पास पहुंच गए, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण प्रसन्नजीत को घर लाने में परेशानी थी. ऐसे में बालाघाट जिला प्रशासन आगे आया.
कलेक्टर मृणाल मीना के निर्देश पर टीम गठित कर अमृतसर भेजी गई. अब प्रसन्नजीत सुरक्षित अपने घर पहुंच चुका है. हालांकि सात साल पाकिस्तान की जेल में रहने के बाद उसकी मानसिक स्थिति अभी ठीक नहीं है.
पाकिस्तान की जेल में मिला ये काम
प्रसन्नजीत ने बताया कि जेल में सुबह 7 बजे उठाया जाता था और उससे बगीचे की साफ-सफाई का काम कराया जाता था. दिन में दो बार रोटी मिलती थी और नॉनवेज भी खाने को मिलता था. राहत की बात यह है कि घर लौटने पर वे अपनी बहन और जीजा को पहचान पा रहे हैं.
परिवार ने शासन से मांग की है कि प्रसन्नजीत के समुचित मानसिक उपचार की व्यवस्था की जाए. सात साल बाद घर लौटे बेटे को देखकर परिवार की आंखों में खुशी के आंसू हैं. यह सिर्फ एक रिहाई नहीं, बल्कि प्रशासन की संवेदनशीलता और एक बहन के अथक संघर्ष की जीत है. (रिपोर्ट: अतुल वैद्य)