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प्रेम कहानीः यही तो हक है मेरा

सोचो कि अगर मैं तुम्हारी ज़िंदगी से नहीं जाती तो क्या होती तुम्हारी ज़िंदगी? क्या तुम इतने बड़े स्टार जर्नलिस्ट होते? लाखों तुम्हारे दीवाने हैं. क्या ये सब तुम कर पाते?

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प्रतीकात्मक इमेज [ GettyImages ]
प्रतीकात्मक इमेज [ GettyImages ]

फोन की घंटी ने मेरा ध्यान भंग किया. देखा तो अनजाना नंबर था. कोई बैंक वाला होगा या फिर इंश्योरेंस कंपनी से होगा. एक घंटे में मेरा शो जाने वाला था. मैं अपने नोट्स पढ़ रहा था. अनमने ढंग से उसने फोन उठाया था. 'हैलो' कहते ही उधर से आयी आवाज़ सुनकर उसका दिल धड़क गया गया था. इतना ही तो कहा गया था.

'पहचानो तो जानें...'

कुछ नहीं बोल पाया मैं, सोच में ही पड़ गया. हैरान भी था. इस एक फोन का इंतज़ार मैं तब से करता आया था जबसे मेरे हाथ में मोबाइल आया.

'इतनी जल्दी भूल गये?' उधर से आवाज़ आयी.

'इतनी जल्दी? 20 साल हो गये हैं. 20 साल जल्दी तो नहीं है वैसे? 'वो उन्हें याद करें जिसने भुलाया हो उन्हें...हमने ना भुलाया ना कभी याद किया' . मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल गया.

'अरे मेरे शायर, शाबाश. आज भी अंदाज़ वही है तुम्हारा.' हंसते हुए उसने कहा.

'ज़रूरी तो नहीं कि हर कोई बदल जाये?' मैंने कहा

'ओह इतने साल बाद भी बिटर है कोई? नाराज़ हो. वैसे तुम्हें नाराज़ नहीं होना चाहिये.'

'क्यूं, मुझे क्यूं नाराज़ नहीं होना चाहिये?'

'सोचो कि अगर मैं तुम्हारी ज़िंदगी से नहीं जाती तो क्या होती तुम्हारी ज़िंदगी? क्या तुम इतने बड़े स्टार जर्नलिस्ट होते? लाखों तुम्हारे दीवाने हैं. क्या ये सब तुम कर पाते?' हंसते हुए कहा उसने.

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मैं कुछ नहीं बोला. उसको सुनता रहा.

'तुम्हें तो मेरा शुक्रिया अदा करना चाहिये मन. मैं तुम्हें छोड़ कर चली गयी. तुम्हें अपनी कामयाबी का क्रेडिट मुझे देना चाहिये 'मन'.'

20 साल बाद उसके मुंह से अपना नाम सुनकर फोन पर ही मैं मुस्कुरा दिया था. अमन को हमेशा मन कह कर ही बुलाया है उसने.

'हां, माया तुम सही कहती हो. दरअसल तुम ना होती तो शायद आज जो कुछ भी हूं मैं वो ना होता. 20 साल बाद मेरी ज़बान पर उसका नाम आया था.'

'अब आये तुम लाइन पर मन,' उसने चहकते हुए कहा.

'माया, तुम्हें जाना नहीं चाहिये था.'

'नहीं जाती तो क्या कर लेते हम. तुम लखनऊ शहर में छोटे से पत्रकार थे. स्कूटर पर घूमते थे. साल 2000 में 12 हज़ार रुपये सेलेरी थी तुम्हारी. कोई सपना नहीं था तुम्हारा, सिवाय मेरे. तुम अपनी ज़िंदगी में खुश थे.'

'तुम्हीं मेरा सपना थीं माया. मेरी ज़िंदगी थीं तुम.' मैंने उसकी बात काटकर कहा.

'मन, किसी को चाहना ही ज़िंदगी नहीं होती. ज़िंदगी की कुछ जरूरतें होती है. जो प्यार में दिखायी नहीं देती. प्यार हमें ब्लाईंड बना देता है. संघर्ष से दूर ले जाता है.'

'मैं नहीं मानता.'

'खुद को ही देख लो. खैर यहां बहस नहीं करते. आराम से सोचना. बस दीदी ने बताया कि तुम उनसे मिले थे. उनसे तुम्हारा नंबर मिला तो सोचा फोन कर लूं. याद तो तुम्हें हमेशा किया. आज भी तुम साथ ही हो. हमेशा रहोगे. खुद को कोसना बंद कर दो मन.' उसने धीरे से कहा. एक दर्द था उसकी आवाज़ में. मुझे ऐसा लगा.

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'अच्छा ये बताओ कि तुम्हारे परिवार में कौन -कौन है?' माया ने पूछा.

'दो बेटे हैं मेरे,' मैंने कहा.

'ओह, लेकिन तुम्हें तो हमेशा से बेटी चाहिये थी. तुमने तो नाम भी सोच रखा था ना? क्या नाम था?'

वो आगे कुछ कहती इससे पहले ही मैंने उसकी बात काट कर पूछ लिया कि 'तुम्हारे कितने बच्चे हैं?'

'एक बेटी और बेटा है' वो बोली.

'और राज, वो कैसा है?'

'मस्त है, बिज़नेस में डूबा है. काम से उसे प्यार है. पैसा कमाना उसका शौक.'

'और तुम क्या करती हो?'

'मैं बस ज़िंदगी जीती हूं. बच्चों के साथ बिज़ी रहती हूं. राज का घर संभालती हूं. इतना काफी है मेरे लिये.'

'लेकिन तुम तो हमेशा अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी?'

'तब पैरों पर खड़ा होना ज़रूरी था, लेकिन शादी के बाद राज के घर आकर लगा कि मेरे काम करने ना करने से यहां किसी की सेहत पर फर्क नहीं पड़ेगा. इसलिये मैंने कोशिश ही नहीं की.' वो इत्मीनान से बोली.

'पर तुम तो ऐसी ना थीं? तुम तो इंडीपेंडेंट रहना चाहती थीं.' मैंने फिर उसे कुरेदा.

'क्या तुम आज भी 20 साल पहले वाले मन हो? नहीं ना. तो फिर मैं वैसी कैसे रह सकती हूं. नॉस्टालजिया में जीने से कुछ नहीं होता. चलो, बाय... हां, मुझे फोन करने की ज़रूरत नहीं है. जब भी मेरा दिल करेगा मैं फोन कर लूंगी.' कह कर उसने फोन काट दिया.

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उसकी बातों पर मुस्कुराते हुए मैंने अपना सिर डेस्क पर टिका दिया. ऐसी ही है माया. आंधी तूफान की तरह आती है. वैसे ही चली जाती है.                   

20 साल पहले ऐसे ही अचानक माया ने मेरे सिर पर बम फोड़ा था. पांच साल से हम दोनों साथ थे. तय था कि हमें शादी करनी है. मेरे घर वालों को भी पता था कि ये शादी करेंगे. उसके घरवालों का पुख्ता आइडिया नहीं था. एक दिन मैं और माया पूरे दिन एक साथ थे. छोटे शहरों में तब मिलने की जगह बहुत कम थी. उस दिन साथ करने वाला एक सहयोगी कहीं बाहर गया था. उसके घर की चाबी मेरे पास थी और मैं माया साथ रूमानियत भरे दिन की मस्ती में डूब उतरा रहा था कि अचानक ही उसने कैज़ुअली कहा था, 'मेरे पापा कहीं गये हैं. शायद मेरे लिये कोई लड़का देखने.'

मेरा मूड खराब हो गया, पर अगले दिन इससे भी बड़ा झटका लगा, जब माया ने फोन पर कहा था कि 'मेरी शादी तय हो गयी है. आज लड़के वाले रोका करने आ रहे हैं. मेरी इंगेजमेंट है.' मुझे काटो तो खून नहीं. यकीन ही नहीं हो रहा था कि कल तक जो लड़की मेरे साथ थी आज उसकी शादी तय हो रही है.

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बेचैनी में बड़ी मुश्किल से वह दिन कटा था. अगले दिन माया का फोन आया था. उसने अपने घर बुलाया था. मैं अपने स्कूटर पर उसके घर गया था. उसके घर में उस वक्त उसकी मां के अलावा और कोई नहीं था.

हम दोनों ड्राईंग रूम में बैठे थे. माया एकदम नॉर्मल थी. वो बड़े चाव से बता रही थी कि कल इंगेजमेंट में क्या हुआ. राज के बारे में बता रही थी. राज ऐसा है वैसा है. मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था. राज, राज और राज. बस उसकी बातों में वही था. राज की वहां फैक्टरी है. राज की यहां फैक्टरी है. राज के ऑफिस में इतने लोग काम करते हैं. राज के पास इतनी गाड़ियां हैं.

मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. मैंने उससे जानने की कोशिश की कि ये क्या है? तुम ऐसा कैसे कर सकती हो?

अब यही सच्चाई है हमारी अमन. पूरा नाम लिया था उसने मेरा. अब मैं माता पिता का दिल नहीं तोड़ सकती. कहते हुए माया ने अपनी नज़रें नीची कर ली थीं. मेरी आंखों में झांकने का साहस शायद माया में नहीं था.

माया की शादी शहर के रईस घराने में हो रही थी. यहां शादी करके उसे जीवन में कभी कोई दिक्कत नहीं होनी थी.

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मेरा दिल डूब रहा था.

'माया तुम ये कैसे कर सकती हो? मेरे बारे में सोचा है तुमने?

'इसी में तुम्हारी भलाई है अमन.'

'क्या भलाई है. नहीं चाहिये ये भलाई.' मैं ने ज़िद की.

'मुझे मुश्किल में मत डालो अमन. मैं लड़ने की हालत में नहीं हूं.'

'एक दिन में ऐसा क्या हो गया माया. परसों हम साथ थे. परसों हमारे बीच जो कुछ हुआ उसके बाद तुम ऐसा कैसे कर सकती हो? तुम इंगेजमेंट के लिये कैसे तैयार हो गयी माया. ओह, पैसा...?

पैसों के आगे तुमने प्यार को बेच दिया.' मुझे यही फिल्मी डायलॉग सूझा.

प्यार में चोट खाये आशिक का आखिरी सहारा फिल्में ही होती हैं.

माया ने मेरी तरफ नज़रें उठायी. वो डबडबा रहीं थीं. उनमें एक कातर भाव था. वो दया की फरियाद कर रही थी. शायद वो मेरे सवालों का सामना नहीं करना चाहती थीं. और मैं दिल और दिमाग में अंदर ही अंदर फट रहा था. हज़ारों सवाल थे मेरे पास. जवाब किसी एक का भी नहीं. सारे सवालों के जवाब जिसके पास थे, वह तो किसी और की हो चुकी थी.

इससे पहले कि मैं कुछ और कह पाता बाहर गेट पर एक गाड़ी कर रुकी. माया फुर्ती से उठी और अपनी आंखें पोंछ लीं.

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'शायद राज आया है.' कहते हुए वो बाहर निकल गयी.

कुछ ही देर में एक खूबसूरत सा बांका जवान उसके साथ आया. माया ने उससे मेरा परिचय कराया.

'अच्छा तुम अमन हो? माया ने बताया. यहीं लोकल पेपर में रिपोर्टर हो.' उसने कहा.

मैंने हाथ मिलाते हुए राज की बातों पर सिर हिला दिया.

राज अपने बारे में बताने लगा. वो मुझसे क्या कह रहा था मुझे बिलकुल भी याद नहीं क्यूंकि मेरी नज़रें तो माया पर थी. और माया की नज़रों में जो मैं देख रहा था उससे मुझे लगा कि उसी वक्त इस धरती को फट जाना चाहिये, ताकि मैं उसमें समा जाऊं.

माया की आंखों में जो प्यार मेरे लिये होता था. वो प्यार आज राज के लिये था. उसकी आंखों में मुझे राज दिख रहा था. वो अंदाज़, वो भाव मैं पहचानता था. वो मेरा था. लेकिन अब नहीं, अब किसी और का हो चुका था.

मैं बहाना बनाकर वहां से उठकर चला आया... कभी ना लौटने के लिये. फिर मैं माया से कभी नहीं मिला. मैं अपना दुश्मन बन गया. खुद से इंतकाम लेने लग गया. माया से इंतकाम लेने का कोई मतलब नहीं था. वो अब मेरी नहीं थी. शराब और सिगरेट मेरे साथी हो गये. चलते फिरते मैं लोगों से झगड़ा करने लगा. मेरा शहर मेरे लिये बेगाना हो गया. हर गली, हर मोड़ मुझे माया की याद दिलाता था. तंग आकर मैंने अपना शहर छोड़ दिया.

दिल्ली में आकर मैं एक टीवी चैनल में काम करने लगा. कहते हैं कि जो इश्क में नाकाम होते हैं किस्मत उन पर मेहरबान होती है. मैंने अपना सारा वक्त काम में झोंक दिया. देखते ही देखते मेरा नाम हो गया. मेरी तस्वीरें छपने लगीं. लोग पहचानने लगे. मां बाप की तरफ से आये शादी के हर रिश्ते को मैंने ठुकरा दिया. मुझे शादी करनी ही नहीं थी. लेकिन कहते हैं ना कि इश्क पर बस नहीं होता. कुछ साल के बाद मुझे फिर प्रेम हुआ. अपनी एक सहयोगी के साथ. मैंने भी शादी कर ली. मेरे आज दो बच्चे हैं.

प्राइम टाइम एंकर से मैं देश के नंबर वन चैनल में मैनेजिंग एडिटर बन गया. तमाम बड़े शो मैं करता हूं. प्रधानंमत्री तक मुझे इंटरव्यू देने लगे. जीवन में इतना कुछ पा लेने के बाद भी एक कसक मन में हमेशा रही.

वो ये कि माया मेरे बारे में क्या सोचती है? क्या माया को अपने फैसले पर अफसोस होता होगा? मेरी कामयाबी माया के लिये क्या है?

आज उसके फोन से इन सवालों का जवाब मिल गया.

मेरी कामयाबी दरअसल मेरी नहीं है. मेरी कामयाबी माया की देन है. माया इस पर अपना अधिकार जताती है. माया मुझ पर आज भी अपना हक समझती है. माया के दिल में आज भी मैं हूं. माया आज भी मुझसे प्यार करती है.

माया का मुझ पर हक जताना मुझे अच्छा लग रहा है.

 

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