कहानी - न्यू ईयर नाइट और एक क्राइम
जमशेद कमर सिद्दीक़ी
वो सर्द रात साल की आखिरी रात थी... 31 दिसंबर की रात ... जब पूरा शहर रौशनी से नहाया हुआ था... जश्न का रंग शहर की सड़कों पर रौशनी बनकर बिखरा हुआ था। थोड़ी-थोड़ी देर में पुलिस की तेज़ रफ़्तार गाड़ियां सायरन बजाती हुई शोर में थोड़ी सी सतर्कता घोलते हुए गुज़र जाती थी। उनके गुज़रते ही जश्न में झूम रहे लोग एक पल के लिए चौंक जाते। किसी ने बताया कि पुलिस ने रेड अलर्ट जारी किया है… इनफॉर्मेशन है कि कुछ संदिग्ध लोग शहर दाखिल होते हुए देखे गए हैं और वो नए साल की रात किसी खतरनाक घटना को अंजाम दे सकते हैं। हालांकि इस अलर्ट के बावजूद भी जश्न में कोई कमी नहीं आई... सेक्टर बीस की उस चौड़ी सड़क के किनारे बने हुए विनसेंट कैफे में खूब चहल-पहल ही... कांच की बड़ी-बड़ी दीवारों से आर-पार नए साल के ज़बरदस्त जश्न की रंगत दिख रही थी। महंगे फर्नीचर, खूबसूरत झालरें, अमीर लोगों के हाथों में ग्लास ... विनसेंट कैफे में हर तरफ नए साल का जश्न छलक रहा था। इस कैफे के सिक्योरिटी एडमिनस्ट्रेटर के तौर पर मुझे तीन साल हो गए थे। कैफे की पूरी हिफ़ाज़त मेरी ज़िम्मेदारी थी। 58 सिक्योरिटी गार्ड्स की हमारी टीम को मैनेज करना, बड़े इवेंट्स पर स्ट्रैटिजी बनाना और एक्शन लेना मेरी ड्यूटी का हिस्सा था। वैसे, इस कैफे में आने वाले ज़्यादातर लोगों को मैं जानता था, लेकिन हर साल नए साल की जश्न की रात पर बहुत सारे नए चेहरे आते हैं... इसलिए सब पर नज़र रखना ज़रूरी होता है। मैंने अपनी कमर पर बेल्ट से लगे हुए वायरलेस को निकाला और अंगूठे से एक बटन दबाते हुए कहा... गेट नंबर तीन पर दो गार्ड्स और भेजिए... जल्दी... और मेन गेट के सामने से ये भीड़ हटवाइये... कहते हुए मैं दूसरे गेट की तरफ चल दिया। (बाकी की कहानी के लिए नीचे स्क्रॉल करें या इसी कहानी को ऑडियो में सुनने के लिए ठीक नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें)
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(बाकी की कहानी यहां से पढ़ें) तभी मेरा फोन बजा... मां का मैसेज था... लिखा था – टीवी में बता रहे हैं... दिल्ली में ठंड बहुत हो गयी है... कान ढके रखना बेटा... मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी। हम चाहें दुनिया में कुछ भी बन जाएं....कितने भी बड़े हो जाएं लेकिन मां के लिए बच्चे ही रहते हैं। मुझे मां और बाउजी पर अचानक बहुत प्यार आने लगा। कैफे की भीड़ से बाहर की तरफ आया जहां थोड़ी खामोशी थी... मैंने फोन मिलाया... मां ने उठाया...
हैलो मम्मी...
हैलो बेटा
मम्मी.... हैप्पी न्यू ईयर... मैने कहा तो मां ने हंसते हुए जवाब में कहा – हैप्पी न्यू ईयर बेटे... अच्छा सुनो... वो मैंने कहा था न न्यू ईयर वाले पैसे... बेटा वो भेज दो...
मैंने गहरी सांस ली और थोड़ा समझाने वाले लहजे में कहा, मां... क्या आप भी... पूरी दुनिया का ठेका आप ने ले रखा है क्या... अरे नया साल है थोड़ा सेलिब्रेट कीजिए... ये क्या हर नए साल पर आप मदर टेरेसा बन जाती हैं...
मां थोड़ा खामोश रहीं... तो मुझे लगा मैंने ज़्यादा बोल दिया... मम्मी, आई मीन.. पिछले साल भी आपने डोनेट किया था... अरे कुछ खुशियां अपने लिए भी रखिए... थोड़ा सेलिब्रेट कीजिए...
मां ने कहा, सेलिब्रेट करने का सही तरीका तो यही है कि जिसके पास जितना कम हो उतना वो दे दे, जिसके पास उससे ज़्यादा है... वरना सिर्फ नया साल मुबारक हो... कहने से मुबारक थोड़ी हो जाता है...
नहीं, मम्मी... मैंने मम्मी की बात काटते हुए कहा मैं आपको पैसे भेजूंगा पर शर्त यही है कि वो पैसे आप अपने ऊपर खर्च करेंगी... थोड़ा पापा के साथ घूम आइये कहीं.... कितने साल से नहीं गयी हैं कहीं...
मैं मम्मी से बात कर ही रहा था कि अचानक मेरा वायरलेस बजा, पता चला कि कैफे के बैक साइड गेट पर कुछ लड़कों के बीच झग़ड़ा हो गया है। मैंने कहा अच्छा मम्मी... फोन रखता हूं... कुछ काम है... कहते हुए मैं तेज़ी से वहां पर पहुंचा तो देखा कि दो लड़कों में हाथापाई हो रही थी। आप लोग प्लीज़ पीछे हो जाइये... प्लीज़... कहते हुए मैंने उन दोनों लड़कों सिक्योरिटी गार्डस के ज़रिए पकड़ा और समझाया-बुझाया। ये जगह विनसेंट कैफे की पीछे तरफ थी, जो एक अंडर कंसट्रक्शन रोड से लगी हुई थी जिसमें शायद रोड में सीवर के बड़े-बड़े पाइप डाले जा रहे थे। कुछ दूर रोड पर वो पाइप्स सड़क पर आढ़े-तिरछे पड़े दिखाई दे रहे थे। पर रात को वो सुनसान रहती थी इसलिए कैफे से लगी उस खाली सड़क पर लोगों के बैठने उठने का इंतज़ाम कर दिया गया था। वहां म्यूज़िक का इंतज़ाम था, और लकड़ियों का एक गट्ठर भी जलवा दिया गया था। कुछ ड्रिंक्स भी रखे थे और सजावट के तौर पर कुछ चमकीले सितारे वगैरह लटक रहे थे और ऊपर एक बड़ा सा लाल रंग का बैनर था जिस पर सफेद लिखावट थी – हैप्पी न्यू ईयर 2024... वो बैनर मैंने ही अपने सिक्योरिटी ऑफिसर्स के ज़रिए बंधवाया था... हलकी हवा में बैनर धीरे धीरे डोल रहा था।
ख़ैर... मैं वहां से दूसरी तरफ जाने लगा... पर ठीर उसी वक्त मेरी नज़र रोड पर दूसरी तरफ सुनसान जगह पर ख़ड़े एक शख्स पर गयी। एक आदमी जो एक पेड़ की आढ़ में खड़ा एक टक इस तरफ देखे जा रहा था। मेरी नज़र उस पर ठहर गयी। वो अधेड़ उम्र का आदमी, सांवला सा... दाढ़ी बढ़ी हुई... बाल बिखरे... आंखे लाल ... उसने कोई पुराना सा फटी हुई मैली कमीज़ पहनी थी, जिसका रंग कभी सफेद रहा होगा पर, अब मटमैला हो गया था... और उसी रंग का एक पैजामा सा था... वो नंगे पैर था और इस तरफ लगातार देख रहा था। मुझे वो आदमी संदिग्ध लगा। क्या वो कुछ करने वाला था...
मेरी नज़रें उस खतरनाक से चेहरे पर गड़ गयीं। वो चुपचाप एक टक इस तरफ देख रहा था... मैं कुछ देर उसे देखता रहा... फिर अचानक कैफे के अंदर से शोर तेज़ होने लगा.... क्योंकि 12 बजने ही वाले थे... शोर बढ़ने लगा। म्यूज़िक रुक गयी... मैं वहीं रहना चाहता था लेकिन अंदर के इंतज़ाम देखने के लिए मुझे वहां से जाना पड़ा। माहौल में शोर बढ़ने लगा और फिर नए साल का काउंट- डाउन शुरु हो गया... 10, 9 8 7 6 5 4 3 2 1
और इसी के साथ म्यूज़िक बजने लगी... लोग एक दूसरे से गले मिलने लगे और बाहर बहुत सारी आतिशबाज़ी आसमान में रौशनी बिखेरने लगी। मुबारकबाद के उस शोर शराबे में लोग नाचने-गाने लगे... नई उम्मीदें, नए सपनें, नई एसपिरेशंस.... लिए नया साल आ गया था। हर कोई जश्न में मुब्तिला था लेकिन मेरे ज़हन में वो आदमी ठहर गया था... न जाने क्यों मुझे लग रहा था कि वो... वो कुछ करने वाला है। मैं वापस कैफे की बैक साइड आया तो देखा वो आदमी उस जगह नहीं है... मैंने इधर उधर नज़र दौड़ाई तो देखकर चौंक गया। वो मुझे दिखा पर इस बार वो कैफे के थोड़ा और करीब आ गया था। उसने रोड़ क्रॉस कर ली थी और अजीब नज़रों से जहां लोग खड़े थे, नए साल के बैनर के नीचे... उस तरफ देख रहा था। जैसे उसके शैतानी मन में कुछ खतरनाक चल रहा हो। मैं सिक्योरिटी एजेंसीज़ में लंबे वक्त से काम कर रहा हूं... इसलिए आदमी की नज़र पहचानता हूं। कोई आदमी जब कुछ गलत करने के मंसूबे मन में लिए आगे बढ़ता है तो उसके हाव भाव कुछ बदल जाते हैं... औऱ वही हाव-भाव वही चाल उस वक्त उस शख्स थी की... मैं यकीन से कह सकता था कि कुछ तो खतरनाक उसके मन मे चल रहा था... वो कुछ भी हो सकता था... शायद उन्हीं संदिग्धों में से एक जिन्हें पुलिस की सायरन बजाती गाड़ियां ढूंढ रही थीं, या कोई और क्रिमिनल जो कोई बड़ी वारदात को अंजाम देना चाहता था, कुछ लूटना चाहता था या किसी का कत्ल करना चाहता था। औऱ मैं... बिल्कुल गलत नहीं था।
हैप्पी न्यू ईयर दोस्त.... तभी वहां पर खड़े मिस्टर अस्थाना जो कि कैफे के रिग्यूलर कस्टमर थे वो मेरे पास से गुज़रते हुए बोले तो मैंने मेरी तरफ बढ़ा उनका हाथ पकड़ कर मुस्कुराते हुए कहा, ओह... थैंक्यू हैप्पी न्यू ईयर टू यू टू सर...
- सब सही है, चकाचक?
- येस सर एवरिथिंग ऑलराइट... मैम नहीं आईं? मैंने कहा तो वो उनके खराब तबियत के बारे में बताने लगे और यहां से इधर-उधर की बात होने लगी... अस्थाना साहब जैसे ही गए मैंने फिर से उस तरफ नज़र की... जहां वो शख्स थोड़ी देर पहले खड़ा था... अरे कहां गया... मैं चौक कक बुदबुदाया औऱ यहां वहां देखने लगा। तेज़ कदमों से आगे बढ़ते हुए मैं लगभग दौड़ने लगा... पर वो आंखों से ओझल हो गया था। किसी संदिग्ध का आंखों से ओझल हो जाना बहुत रिस्की हो जाता है। मैंने फौरन अंदर की तरफ भागा.... और एडमिन रूम में जाते हुए सीसीटीवी के बड़े से मॉनिटर के पास जाकर बैठ गया। उस बड़ी सी स्क्रीन में पूरे कैफे के 20 कैमरों की फुटेज छोटे-छोटे ब्लॉक्स में चल रही थी। मैंने हड़बड़ाई नज़रों से उस स्क्रीन पर देखने लगा। फ्रंट साइड के ओपन एरिया में कुछ लोग खड़े बातें कर रहे थे, बैक साइड में लोग अभी भी बैनर के नीचे खड़े हाथ में ग्लास लिए झूम रहे थे, पार्किंग में गाड़ियों की कतार थी, मेन गेट पर सिक्योरिटी गार्ड्स मुस्तैदी से सबको जांच रहे थे.... तभी मेरी नज़र किनारे वाले एक वीडियो पर पड़ी, पीछे वाली सुनसान सड़क पर पर गेट के पास लगे एक न्यू ईयर कटआउट के पीछे से दो खौफनाक आंखें झांक रही थीं। ये.... ये वही था।
to be continued
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