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हिंदी कहानी | ईद मुबारक | स्टोरीबॉक्स विद जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

शायद मैं अकेली थी जिसे ईद का इंतज़ार नहीं था। इंतज़ार करें भी तो किसका। कुछ लोग आपकी ज़िंदगी से इस तरह जाते हैं कि सब कुछ बेरंग लगने लगता है, खासकर तब जब आपको पता हो कि वो इसी दुनिया के किसी हिस्से में आप के बारे में सोच रहे होंगे - सुनिए स्टोरीबॉक्स में एक खास कहानी 'ईद मुबारक'

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Jamshed
Jamshed

ईद मुबारक
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी


सुबह की आज़ान के साथ ही सहरी का वक्त खत्म हो गया... मैंने बावर्चीखाने में खड़-खड़े कमरे की तरफ झांक कर देखा... रेहान मेरा छ साल का बेटा सोया हुआ था। मैंने रोज़ा रखने की दुआ की और फिर नमाज़ की तैयारी करने लगी। वैसे इस बार ईद का मुझे बिल्कुल इंतज़ार नहीं था... ईद का मतलब तो खुशी होती है... पर अकेले शख्स के लिए क्या ईद और क्या खुशियां.... मुझे गुज़रे हुए सालों की ईद याद आती थी... ख़ैर... 

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मैं उन लोगों में से हूं जो सहरी करने के बाद सो नहीं पाते क्योंकि नींद टूट जाती है तो दोबारा आनी मुश्किल होती है। इसलिए नमाज़ के बाद कुछ देर तस्बीह पढ़ती हूं, फिर दफ्तर का बचा हुआ काम निपटाने के लिए लैपटॉप लेकर बैठ जाती हूं। कुछ काम ऑफिस जाने से पहले ही निपटा लो तो फिर जल्दी ऑफिस से निकलने में भी आसानी होती है। 
ख़ैर, तीन चार घंटे गुज़रे तो मैंने रेहान को उठाया, उसे प्यार किया... फिर उसे तैयार किया... उसका टिफिन तैयार किया, बैग रेडी किया और फिर दफ्तर जाने की तैयारी करने लगी। तैयार होने के दौरान मैं आइने के सामने खड़ी हुई तो कुछ उलझी हुई लटें सुलझाते वक्त मेरी नज़र आंखों के नीचे उभर आए काले घेरों पर पड़ी... मैं उन्हें छूने लगी। ऐसा लग रहा था कि वो सारी रातें जो मैंने जगकर तन्हा काटीं, वो रातें उन्हीं आंखों के नीचे जम गई थी। मैं अपने बोझिल आंखें और थके हुए चेहरे को ग़ौर से देखने लगी, उसमें और कुछ हो न हो खुद पर यकीन तो था। 
"मम्मी संभाल कर" उस सुबह स्कूटी मैं कुछ स्पीड में चला रही थी, रेहान ने मुझे कस के पकड़ा हुआ था। मैं गुलाबी हेलमेट लगाए, किसी नौसिखिये की तरह ट्रैफिक से निकाल रही थी। नौसिखिया ही तो थी मैं, अभी स्कूटी पर मेरा हाथ पूरी तरह सेट थोड़ी हुआ था। दो ही महीने तो हुए थे जब मैंने कार बेच दी थी। स्कूटी में काम चल जाता था, कार की कोई खास ज़रूरत थी नहीं। वैसे भी जब ज़िंदगी के रास्ते अकेले तय करने होते हैं तो सफर में ज़्यादा एहतियात रखना पड़ता है। साल भर पहले मेरा डिवोर्स हुआ था। तब से रेहान की पूरी ज़िम्मेदारी मुझ पर ही थी। अब हर काम मेरे अकेले ज़िम्मे में थे। सोसाइटी की मीटिंग से लेकर, बैंक के छोटे-मोटे काम तक और राशन की लिस्ट बनाने से लेकर रेहान की पैरेंट-टीचर मीटिंग तक, सब अकेले-अकेले करते हुए मैंने खुद को ऐसे घेर लिया था कि यादों का बोझ अब कम लगने लगा था। हां, ये और बात है कि रेहान के मासूम सवालों का जवाब देना अब भी उतना ही मुश्किल होता था जितना पहले। मुश्किल तो तब भी होता था जब रेहान के सवाल खामोशी की दीवारें लांघ नहीं पाते थे। शाम को दूसरे बच्चों को अपने पापा के साथ पार्क में खेलते हुए देखकर, उसकी आंखों में उतर आई उदासी मैं पढ़ लेती थी।
 गुड मॉर्निंग मैम... दफ्तर के गेट पर खड़े सिक्योरिटी गार्ड ने कहा तो मैं उसे जल्दी से जवाब देते हुए अंदर चली गयी... आज मैं फिर से लेट थी... ऑफिस में मेरी दोस्त नेहा के तीन मैसेज भी पड़े थे – कहां है तू... मैं इस हफ्ते में तीसरी बार.... मैं तेज़ तेज़ अपनी सीट की तरफ बढ़ने लगी कि जाकर चुपचाप बैठ जाऊं और किसी को पता न चले... पर जब मैं कॉरिडोर की तरफ बढ़ रही थी तो देखा कि सामने से संजय सर यानि मेरे बॉस चले आ रहे हैं। 
ओह शिट... मेरे मुंह से निकला और मैं फोन में देखने लगी। दिल की धड़कने बढ़ रही थीं। आज संजय सर ज़रूर डाटेंगे... दो दिन पहले ही उन्होंने वार्निंग दी थी कि मैं वक्त से आऊं। 
हैलो... गुड मॉर्निंग... सर की आवाज़ आई तो मैंने फोन से नज़रें उठाईं। 
गुड मॉर्निंग सर... उन्होंने पूछा, पीपीटी तैयार है सैटरडे के लिए?
येस सर, बस कुछ लास्ट मिनट चेक हैं.. वो ऑलमोस्ट रेडी है
गुड... बाकी वेन्यू वगैरह... 
वो सब हो गया... ज़हीर सर को मेल कर दिया था मैंने... 
ओके गुड... मैंने कहा और फिर सर की नज़रें पढ़ने लगी.. मुझे लगा कि वो इससे पहले की मुझे टोंके मैं खुद ही बोल देती हूं... सर वो आज मैं फिर से लेट... 
- इट्स ओके... कोई बात नहीं, मुझे ज़हीर ने बताया कि कल रात को तुम देर तक ऑफिस में थी... पर देखो टाइम से निकल जाया करो... सेफ्टी भी एक कंसर्न है... है ना.. चलो कहते हुए सर तो चले गए... पर मैं सोचती रही कि कल देर तक ऑफिस... मैं तो कल जल्दी निकल गयी थी... ज़हीर सर ने बॉस को झूठ क्यों बोला... ख़ैर मैं अपनी सीट पर आ गयी। 
 “थैंक्स नहीं बोलोगी” एक जानी-पहचानी आवाज़ से मैं चौंक गई। देखा तो ज़हीर सर मेरे सामने खड़े थे। ज़हीर सर मेरे सीनियर थे। मैं उन्हें रिपोर्ट करती थी और वो संजय सर को। ज़हीर वैसे मेरे हमउम्र भी थे, लेकिन काम के मामले में उनका कोई सानी नहीं था। हैंडसम थे और अक्सर आउट आफ दा वो जाकर मेरी मदद करते थे, जैसे आज की। शुरु शुरु में मुझे उनके इन अहसानों पर गुस्सा आता था क्योंकि मुझे लगता था कि वो शायद मेरे डिवोर्स्ड होने की वजह से मुझपर तरस खा रहे हैं... पर बाद में मुझे एहसास हुआ कि उनके मन में मेरे लिए कुछ था। 
 “क्यों नहीं बोलूंगी...आज आप ने बचा लिया वरना डांट पड़ती” 
“कोई बात नहीं, आई नो तुम रेहान को स्कूल ड्रॉप करने के चक्कर में लेट हो गए होगी और फिर रमज़ान भी हैं तो.. वैसे कैसा है रेहान... यार लेकर आओ उसे कभी... कहीं बाहर ही मिलवा दो... ” 
- हां मैं, बनाती हूं कुछ प्लैन... कहते कहते हुए मैंने उन्हें टालने की कोशिश की और काम करने लगी। वो कुछ देर मेरे पीछे खड़े रहे और फिर वापस लौट गए। 
तलाकशुदा लोगों के लिए ये दुनिया बहुत अलग होती है। दुनिया की नज़रें आप पर अलग तरह से उठती हैं, लोग आपको जज करते हैं। आपको बेचारा समझते हैं... दूसरों का क्या कहूं मेरे पापा खुद हर सातवें दिन मेरे लिए नए रिश्ते ढूंढकर फोन करते थे। और बर बार उनका भी यही डायलॉग होता था... अरे बिटिया, ज़िंदगी बहुत तवील है, ये सफर अकेले नहीं कटेगा... वैसे सच बताऊं तो ऐसा नहीं कि मैंने ज़हीर के बारे में कभी सोचा नहीं, सोचा था एक बार... वो अच्छे भी लगते थे मुझे... मेरी मदद करते थे... हमेशा काम के लिए खड़े रहते थे... पर... पर सच बताऊं... अब हिम्मत टूट गयी थी। आइने पर एक बार शिगाफ़ आ जाए न ... तो फिर कोई भी तस्वीर आइने के सामने रखो... वो शिगाफ़ वो दरार... उस चेहरे पर दिखती है। वो आइना मैं थी। मैं अब ज़िंदगी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहती थी जहां मुझे किसी पर भरोसा करना पड़े... अब मैं लोगों पर भरोसा करना भूल गयी थी। 

एक दिन जब मैं दफ्तर में बैठी अपना काम कर रही थी तो मेरे पास रेहान के स्कूल से फोन आया। टीचर ने हड़बड़ाई आवाज़ में बताया कि रेहान झूले से गिर गया है। वो बेहोश है, हम उसे अस्पताल ले जा रहे हैं। मेरे हाथ में थमा फोन कांपने लगा…  मैं बेहोश सी होने लगी... मेरे कॉलीग्स ने मुझे संभाला... मुझे ... मुझे स्कूल जाना है ... रेहान के स्कूल... अभी मैंने कहा तो मेरे सामने ज़हीर सर खड़े थे। कुछ ही देर में मैं और ज़हीर सर उस छोटे सी क्लिनिक पहुंच गए जहां रेहान एडमिट था। रेहना को ज़ख्मी देखकर मेरा तो जैसे दम ही निकल गया। ज़हीर सर ने वहां खड़े स्कूल स्टाफ को ज़ोर की फटकार लगाई और रेहान को अपनी कार में लेकर दूसरे बड़े अस्पताल गए। वो शाम तक हमारे साथ ही थे जब तक रेहान के स्टिचेस और ड्रेसिंग नहीं हो गई। उन्होने रोज़ा रखा था, पर अफ्तार के वक्त तक वहीं बैठे रहे... जितनी बार रोता ज़हीर उसकी हिम्मत बढ़ाते, उसे हंसाते... 
फिर पता है चींटी ने हाथी से क्या कहा, आओ... तुम मेरे पीछे छुप जाओ उन दोनों को हंसते हुए देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए थे क्योंकि उस लम्हें में मुझे कोई याद आ गया। कोई ऐसा... जो अब मेरे साथ नहीं था। शाम को अफ्तार से थोड़ा पहले ज़हीर ने मुझसे कहा, मैं कुछ खाने को ले आता हूं... मगरिब का वक्त होने वाला है... आता हूं अभी...  
वो बाहर जाने लगे तो मैंने उन्हें आवाज़ दी... वो रुक गए। मैं पास गयी और कहा क्यों कर रहे हैं आप ये सब
वो मुस्कुराए और बोले, “पता नहीं, पर हो सकता है खुदा ने वैसा ही कुछ सोच रखा हो... जो तुम सोच रही हो... आता हूं... रेहान के पास बैठो”
ज़हीर सर जा रहे थे... और मैं... मैं आंखो में आंसू लिए अपने हाथों की उन टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों को देख रही थी जिनसे कोई नाम नहीं बन रहा था। 

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शाम की गाड़ी से पापा घर आ गए थे, अपने लाडले रेहान को सही-सलामत देखकर उनके मुंह से खुदा के लिए शुक्र निकल रहा था। 
फिक्र कुछ कम ज़रूर हुई थी लेकिन मैं पापा के सवालों में ज़हीर सर को बार-बार महसूस कर रही थी 
“वो तो शुक्र मनाओ कि वो आ गए, अरे न होते तो क्या होता, ऐसे लोग अब कहां मिलते हैं आजकल” पापा बार बार उनका ज़िक्र कर रहे थे और मैं जानती थी कि क्यों... किस्सा सिर्फ पापा का नहीं था, ऑफिस में मेरी दोस्त अंजलि भी बार-बार घुमा-फिराकर एक ही बात कर रही थी, हर बात में किसी न किसी तरह सर का ज़िक्र आ रहा था। न जाने क्या था वो, सबको जल्दी थी एक ऐसे कॉनक्लूज़न पर पहुंचने की.. जिससे मैं दूर भागने की कोशिश कर रही थी। वो मेरे हमदर्द मुझे वो समझाने की कोशिश में थे जो मैं समझ रही थी लेकिन समझना नहीं चाहती थी। मुझे नहीं चाहिए था किसी का साथ। न जाने क्यों पूरी दुनिया मुझे इस तरह देख रही थी जैसे मैं मुकम्मल नही थी, अधूरी थी। शायद, ये नज़रिया सिर्फ मेरे लिए नहीं, हर तलाकशुदी लड़की के लिए लिए अपनाया जाता है। एक अकेली लड़की अधूरी ही लगती है। उस रोज़ ज़हीर सर ऑफिस नहीं आए थे। उनकी खाली कुर्सी की तरफ जितनी बार मेरी नज़र जाती मेरा मन कई तरह के सवालों से घिर जाता। इन सभी सवालों के बीच मेरे लिए खुशी की खबर ये थी कि मेरा प्रोमोशन कंफर्म हो गया था। दफ़्तर में सभी लोग मुबारकबाद दे रहे थे, कोई पार्टी मांग रहा था, कोई मुंह मीठा करवाने को कह रहा था लेकिन इस सब के बीच अंजलि के चेहरे पर वो खुशी नहीं थी। उसने अधूरे मन से मुझे मुबारकबाद दी और फिर काम में उलझ गई। 
“क्या हुआ अंजलि, परेशान लग रही हो” मैंने पूछा तो वो बाल ठीक करते हुए बोली 
“आ…नहीं तो ऐसी तो कोई बात नहीं है” 
मैंने उसके साथ वाली कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “लग तो नहीं रहा, वैसे तुम्हे भी मुबारकबाद, अहमदाबाद वाली क्रॉनफ्रेंस के लिए संजय सर तुम्हे भेज रहे हैं ना…” मैंने कहा तो कीबोर्ड पर चलती उसकी उंगलियां रुक गईं बोली, “कहां यार, कैंसिल हो गया मेरा.. मयंक जा रहा है”
“क्यों” मैंने पूछा तो बो बोली, “ज़हीर सर ने कहा... मेल इंप्लॉई को भेजना ज़्यादा ठीक रहेगा” मुझे बुरा लगा ये सुनकर। ज़हीर सर ने संजय सर से कहकर अंजलि की विज़िट कैंसिल कर दी थी। उनका कहना था कि नए शहर में मेल इंप्लॉई को भेजना सेफ रहेगा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, पहले भी वो आउटडोर काम मेल इंप्लाइज़ को ही असाइन करते थे। अंजलि के लिए मुझे बुरा लग रहा था। 
ख़ैर, शाम को ऑफिस के बाद मैं घर पहुंची, स्कूटी स्टैंड पर लगाई और डोरबेल बजाकर इंतज़ार करने लगी। मैं पापा और रेहान के लिए केक भी लाई थी, उन्हें प्रोमोशन की खुशखबरी सुनाने की बेसब्री में मैंने कई बार घंटी बजा दी। मैंने सोचा था कि जैसे ही पापा दरवाज़ा खोलेंगे तो चिल्लाकर केक आगे करते हुए कहूंगी – सरप्राइज़
दरवाज़ा खुला और मैं “स...” बस इतना ही कह पाई थी कि मेरे चेहरे पर ठहरी हुई हसी जम गई। दरवाज़ा खोलने वाला कोई और नहीं, ज़हीर सर थे। 
“सर, आप यहां?” मैंने लगभग लड़खड़ाते हुए कहा तो वो मुस्कुराकर बोले “हां, वो रेहान को देखने आया था, ऑफिस ही आ रहा था, लेकिन पापा ने रोक लिया” कहकर वो मुस्कुराए और दरवाज़े के एकतरफ सट गए, मैं अंदर आ गई। पापा भी ड्राइंग रूम थी और रेहान भी, मैंने नज़र बचाकर पापा को एक गुस्से वाला लुक दिया और दूसरे कमरे में चली गईं। ये सब क्यों हो रहा था मेरे साथ। ज़िंदगी इतनी मुश्किल क्यों है? दिक्कत ये थी मैं ज़हीर सर से नफ़रत भी नहीं कर सकती थी, काश ऐसा कर सकती तो कितना आसान होता लेकिन मैं जानती थी कि मेरे लिए उनके मन में जो कुछ है वो किसी ख़राब नीयत से नहीं है। उन्हें दूर करना शायद इसीलिए ज़्यादा मुश्किल हो रहा था। कुछ देर बाद जब मैं ड्राइंगरूम में लौट कर आई तो देखा कि रेहान, ज़हीर सर के साथ खेल रहा था। वो शायद उसे घड़ी में वक्त देखना सिखा रहे थे “और ये छोटी वाली तीन पर और बड़ी वाली दो पर, तो हो गए तीन बजकर दस मिनट” बहुत दिन बाद उस उदास कमरे में खुशी महक रही थी, पुराने उदास सन्नाटे आहिस्ता-आहिस्ता खत्म हो रहे थे, मायूसी दरक रही थी। रेहान के चेहरे पर भी वैसी खुशी, वैसा रंग मैंने अर्से से नहीं देखा था। और हां, एक किनारे बैठी पापा भी खामोश आंखों से मुस्कुरा रही थीं। 
ज़हीर सर के जाने के बाद, देर शाम जब मैं किचन में थी तो पापा वहां आ गई और बोली, “लड़का तो अच्छा है, नेक है, आखिर दिक्कत क्या है तुझे.. अपने नहीं तो कम से कम रेहान के बारे में सोचो... बल्कि मैं तो कह रहा हूं कि इसी ईद पर... निकाह की तारीख रख लेते हैं... ये ईद मुबारक हो जाएगी” पापा कि ज़बान से निकले वो लफ्ज़ सुनकर मैं हैरान रह गई। 
ये सब कुछ जो मेरे इर्द-गिर्द हो रहा था मैं जानती थी कि मेरी बेहतरी के लिए है, पापा की बात गलत नहीं थी लेकिन पता नहीं वो क्या था जो मुझे उस रिश्ते या किसी भी नए रिश्ते की दहलीज़ पर कदम रखने से बार-बार रोक रहा था। एक डर था जो शायद सिर्फ वही समझ सकता है जिसने मेरी तरह कुछ खास खोया हो। लेकिन मेरे आसपास की खामोशी भी मुझसे सवाल कर रही थी, कुछ आशंकाएं भी थी, संभावनाएं थी.. और कुछ था जो मुझे आहिस्ता-आहिस्ता मेरी ही सोच के दूसरी तरफ खींच रहा था। लेकिन इस सब के बीच मुझे रेहान के वो चेहरा भी याद था जिसपर एक ज़माने के बाद वो खुशी का रंग देखा था।
मैं हमेशा से मानती हूं कि हमारे फैसले हम नहीं, हमारे हालात लेते हैं, एक बार फिर वही हुआ.. उस रात मैं सोई नहीं। सुबह मैं अपनी खिड़की से दूर तक फैले आसमान को देख रही थी, जहां खत्म होता हुआ रात का अंधेरा आने वाली सुबह से मिल रहा था। मैंने उस रिश्ते के लिए हां कर दिया। 
ज़िंदगी बदल गई थी उसी दिन। पापा को उस तरह चहकता मैंने पहले नहीं देखा था। ऑफिस के कुछ खास लोग जिन्हें इस बात का पता चला, वो फोन पर मुबारकबाद देते नहीं थक रहे थे। कुछ रिश्तेदारों का भी कॉल आया जिन्होंने कहा, “आखिर कब तक अकेले रहती तुम, अच्छा हुआ, तुम्हें सहारा मिल गया”

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सहारा - यही वो वजह थी जिसके चलते मैं अब तक इस फैसले से पीछे हट रही थी। मैं जानती थी कि हम जिस समाज में रहते हैं वहां तलाकशुदा लड़कियों के बारे में यही सोच है। उनके लिए साथ नहीं, सहारा ढूंढ़ा जाता है। वो सहारा था या साथ, लेकिन ज़िंदगी उस एक हां से जैसे किसी बंद दीवार में एक खिड़की सी खुल गई थी। ज़िंदगी बदली तो नहीं थी लेकिन बदलते-बदलते बदल रही थी। मैं अपने अंदर भी एक खुशनुमा बदलाव महसूस कर रही थी। इतना ग़लत भी नहीं था ये फैसला। सड़क के किनारे सजी हुई फूलों की दुकान, स्कूल से मस्ती करते हुए लौट रहे बच्चे, आसमान में उड़ते हुए परिंदे, सब अच्छे लगने लगे थे। 
एक शाम, मैं और ज़हीर सर जिन्हें अब मैं उनके काफी फोर्स करने के बाद सिर्फ ज़हीर कहती थी. दफ्तर के पास वाले कॉफी हाउस पहुंचे। आमने-सामने टेबल पर बैठे हम लोग एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। कॉफी का पहला सिप लेने के बाद ज़हीर ने मेरी तरफ एक चाबी बढ़ाई, “ये क्या है…” मैंने हैरानी से पूछा तो वो बोले, “मेरी कार की चाबी, आज से तुम चलाओगे...” 
“क्यों” मैंने पूछा तो वो बोले “मैं तो पास ही रहता हूं, ऑटो से आ जाऊंगा” 
“वो ठीक है ज़हीर लेकिन... नहीं, ये आप ही रखिए... मुझे स्कूटी से ही ठीक रहता है...” मैंने फिर मना किया तो इस बार उन्होने कुछ संजीदगी से कहा, “नहीं एक्चुअली, मुझे अच्छा भी नहीं लगता कि तुम स्कूटी में आते हो, यू नो.. कैसे-कैसे लोग तुम्हें अजीब नज़रों से देखते होंगे... वैल पहले की बात और थी, अब मुझे अच्छा नहीं लगता..ले लो प्लीज़” मुझे ज़हीर से इस जवाब की उम्मीद नहीं थी, मैं एकदम हैरान थी। ज़हीर ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखते हुए मुस्कुराकर आगे कहा “और वैसे भी ये हमेशा के लिए नहीं है, शादी के बाद तुम्हें इस दो टके के ऑफिस में यूं पसीना नहीं बहाना पड़ेगा, तुम सिर्फ अपनी ज़िंदगी जीना, रेहान का ख्याल रखना, बाकी सारी ज़िम्मेदारियां मेरी”
मेरे आंखों के किनारों में नमी उतर आई थी। उस एक पल में, जैसे पूरा समाज सिमटकर मेरे सामने वाली कुर्सी पर ज़हीर बन कर बैठ गया था। मैंने कांपते हुए होठों से जब ज़हीर से कहा कि मैं शादी के बाद भी काम करना चाहती हूं तो वो मुझे बाहर के खराब माहौल से लेकर ऑफिस के लोगों का कैरेक्टर बताने लगे। मैं उनकी आंखों में उमड़ती हुई मुहब्बत का वो रंग देख रही थी, जो वो मुझे देने वाले थे और उसके बदले में मेरा सबकुछ मुझसे मांग रहे थे।
ज़हीर कोई नई बात नहीं कह रहा थे। ज़हीर भी इसी समाज का हिस्सा थे और तलाकशुदा औरतों के बारे में समाज इससे अलग नहीं सोचता। ज़हीर को भी लगा था कि ये शादी करके वो मुझपर अहसान कर रहे है इसलिए वो जो कहेंगे, मैं करूंगी।
मैंने चाबी वापस ज़हीर की तरफ खिसका दी और उठते हुए कहा, “मैं जा रही हूं...” वो हड़बड़ाते हुए बोला, “अरे क्या हुआ, मैं समझा नही” 
मैंने झिलमिलाती हुई आंखो से कहा, “ज़रुरी नहीं हम सब कुछ समझ जाएं, आप वो है जो मैं नहीं समझ पाई और मैं वो नहीं हूं जो आप मुझे समझ रहे थे...” ज़हीर के माथे पर हैरानी की लकीरें थीं, कुछ ऐसा हुआ था जिसका उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि ऐसा हो सकता है। तलाकशुदा औरतें ‘ना’ कहां करती हैं। मैंने कहा, “मुझे साथ चाहिए था सहारा नहीं ज़हीर... मैं ये शादी नहीं कर सकती…” वो कुर्सी से उठ गया, मैं वापसी के कदम बढ़ा चुकी थी, न मैंने पलट कर देखा और न ज़हीर ने आवाज़ दी। लेकिन हां, इसके बाद ज़हीर ने दफ्तर में मुझसे कभी ढंग से बात नहीं की... पर कोई बात नहीं।

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तीसवें रोज़े के बाद जब ईद की सुबह आई तो सफेद कुर्ते पायजामे पहने पापा ने मेरी तरफ देखा... और मैंने मुस्कुराकर उनसे कहा... ईद अब भी मुबारक है... पापा तो पापा की आंखों में आंसू ज़रूर थे पर वो मुस्कुरा रहे थे... और यही मुस्कुराहट मेरी ईदी थी। 
 

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