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लीक से अलग हैं सच्चिदानंद जोशी के संकलन 'पुत्रिकामेष्टि' की कहानियां

सच्चिदानंद जोशी अपनी कहानियों में ऐसे शब्द-चित्र उकेरते हैं जो पढ़ते ही हृदय से आ लगते हैं. हर बिन्दु, हर घटना में कोई न कोई सकारात्मक बिन्दु तलाशते हुए वे कहानी खत्म कर देते हैं पर उसकी अनुगूंज देर तक बनी रहती है.

पुत्रिकामेष्टि का आवरण चित्र, अपनी तरह का एक अनूठा संकलन पुत्रिकामेष्टि का आवरण चित्र, अपनी तरह का एक अनूठा संकलन

साहित्य, रंगकर्म, संस्कृति, चिंतन, पुस्तक प्रेम और पत्रकारिता- इनसे छन कर जो व्यक्तित्व बनता है उसका नाम है सच्चिदानंद जोशी. हर चीज में एक नाटकीय अन्विति तलाश लेना, नाटकों की संवादमयता में जीवन की संवादमयता को जीवंत बना देना, किसी भी घटना को जीवन की एक विशिष्ट घटना के रूप में ग्रहण करना उनकी कला का एक विशिष्‍ट पहलू है. देखी सुनी घटनाओं को ऐसी मानवीय कहानियों में ढाल देना शायद उन्होंने मानवीय सरोकारों वाली पत्रकारिता से सीखा है. वे कवि भी हैं, बल्कि कहा जाए कि जोशी दम्पती कविता और कला की वीथियों में ही सांस लेते हैं, तो अत्युक्ति न होगी. पर कवि दृष्टि ने उन्हें मामूली से मामूली घटनाक्रम के पीछे कोई न कोई मार्मिक कहानी सहेज लेने में सक्षम बनाया है, इसमें संदेह नहीं.

'पल भर की पहचान' और 'कुछ अल्प विराम' में शामिल कहानियां ऐसी ही हैं. समय-समय पर हम सभी लगभग एक से घटनाक्रम से रू-ब-रू होते हैं पर उन घटनाक्रमों से छन कर कहानी निकाल ली जाए, यह हुनर किसी सिद्ध कथाकार में ही होता है. दोनों कथा संग्रहों में उन्होंने जीवन के हर मोड़ से गुजरने वाली किसी न किसी कहानी को ऐसे ही किसी सहज घटनाक्रम से उठा कर जीवंत-वृत्तांत में बदल दिया है. मैं कहता रहा हूं 'रम्या' में जिस तरह की रम्य कहानियां लिखने का कौशल अमृत राय के पास था, लगभग उसी राह पर चलते हुए सच्चिदानंद जोशी ने अपनी कहानियां रची हैं. हाल ही में आई कथाकृति 'पुत्रिकामेष्टि' ऐसी ही कहानियों का संग्रह है, जहां एकाध लंबी कहानियों के अपवाद को छोड़ दें तो छोटी-छोटी कहानियों में किस्सागोई तो है ही; कोई न कोई मूल्य भी उनमें निहित है जो जीवन के अनुभवसिद्ध सोपानों पर चढ़ कर ही हासिल होते हैं.

जोशी अपनी कहानियों में ऐसे शब्द-चित्र उकेरते हैं जो पढ़ते ही हृदय से आ लगते हैं. हर बिन्दु, हर घटना में कोई न कोई सकारात्मक बिन्दु तलाशते हुए वे कहानी खत्म कर देते हैं पर उसकी अनुगूंज देर तक बनी रहती है. सकारात्मकता, छोटे-छोटे साधारण व्यक्ति़यों के गुणों का बखान, उम्मीद व साहस की तलाश, सादगी भरा जीवन उनकी लेखकीय दृष्टि का बखान स्वयं ही करते हैं. 'पुत्रिकामेष्टि' संग्रह में कुल तेरह कहानियां हैं, जिनमें यों तो सभी कहानियां एक बैठक में पढ़ी जा सकती हैं किन्तु 'पुत्रिकामेष्टि', 'रामभरोसे', 'बार बार दिन ये आए', 'डिक्टेशन', 'अपना घर', 'बेसन की पपड़ियां', 'ट्रेन मामा', 'कौशल विकास', 'क्षमा छोटन को चाहिए' व 'नमाज' बेहतरीन कहानियां हैं.

पुत्रिकामेष्टि कहानी में छोटे मामा का एक आमंत्रण पत्र आता है जिसमें पुत्री दिव्या के जन्मदिन को मनाने के लिए आयोजित अनुष्ठान में बुलाया गया है. आपस में घने रिश्तेदार किन्तु यह जन्मदिन किसका है और क्यों है, यह पता नहीं चलता. उनके तो दो पुत्र ही थे तो यह बेटी कहां से हो गयी. बाद में पता चलने पर यह तथ्य सामने आया कि किन्हीं जैविक असंतुलन के कारण दीपक को दिव्या बनना पड़ा तथा इस कारण पिता ने दिव्या के जन्मदिन का न्योता दिया है. यह आज के बंद और मध्ययवर्गीय संकोची समाज के लिए एक साहस का काम है कि कोई लिंग परिवर्तन और चिकित्सकीय उपचार के बाद इस आशय की सूचना भी देने का साहस करे. पर ऐसा है तभी तो यह मुद्दा कहानी का बिंदु बन जाता है. सुनीता व मैं के बीच होने वाले संवादों में इस कहानी के छोर खुलते हैं. रामभरोसे कहानी में चंद्रभूषण-दयावती दंपती बेटे-बेटी के अमेरिका में होने के कारण अकेले हैं, जिनके यहां रामभरोसे नौकर है.  वह हमेशा मालिक की डांट खाता रहता है. एक दिन रामभरोसे की मृत्यु हो जाती है. उसके बाद जब उनकी देखभाल पहले जैसी नहीं हो पाती तो जीवन भगवान भरोसे हो जाता है.
 
बार बार दिन ये आए- होटल के एक सिंगर की कहानी है जहां किसी का जन्म दिन मनाया जा रहा है. वहां उससे गाने की फरमाइश होती है. वह किन्हीं कारणों से इस अवसर पर गाता तो है पर बख्शीश नहीं लेता. शहंशाह वाले स्वाभिमान में लौट जाता है, हालांकि उसे पैसों की सख्त जरूरत होती है. डिक्टेशन- दो दोस्तों की कहानी है. बड़े बाप का बेटा है पर है क्लर्क और उसका दोस्ती बीमा आफिसर से है. वह रिटायरमेंट पार्टी के अवसर पर न्योता देता है पर बड़े दोस्तों के बीच उसमें शामिल अपने इस दोस्त के प्रति कृतज्ञता वह नहीं भूलता.

अपना घर में कमलाबाई नौकरानी है, जिसकी मालकिन बहुत ही उदारचित्त है पर संयोग से मालिक के जीवन में दूसरी औरत आती है, जो मालकिन स्वाति की ही सहेली है और उनकी बीमारी के दौरान उनकी देखभाल करने आती है. वह मालती से बहुत ही टोंकाटाकी करती है, और एक दिन मालकिन के न रहने पर उनका स्थान ले लेती है.  बड़े साब से हुए इस विवाह को कमलाबाई सह नहीं पाती और वह घर छोड़ कर चली जाती है. यह कहानी ये सीख देती है कि नौकरानियां भले ही निम्न तबके की हों पर वे भी मालिकों से सद्व्यवहार की आशा रखती हैं.  बेसन की पपड़ियां- सागर से पुणे आ बसे पैराडाइज सोसाइटी के चौधरी चौधराइन की कहानी है, जिनका दिल किराये पर रह रहे बच्चों के लिए बहुत उदार है. वे दीवाली पर बेसन की पपड़ियां बनाती हैं तो बच्चों को देना नहीं भूलतीं. ट्रेन मामा- कहानी ट्रेन में मिले त्रिपाठी जी के पुत्र प्रभात की कहानी जो हर तरह से कर्मठ है और उसके पास हर समस्या का तत्परता से समाधान होता है. बाद में कैंसर से ग्रस्त त्रिपाठी जी की मृत्यु हो जाती है पर प्रभात ट्रेन में सहयात्री बने परिवार को भूलता नहीं. एक बार इसी परिवार की किरण की बहन की शादी हुई तो सारा इंतजाम प्रभात ने देखते ही देखते कर दिया.

कौशल विकास में ट्रेनिंग के लिए एक संस्‍कृत व हिंदी टीचर नामित होते हैं. रास्ते में वे पाते हैं कि उन्हें एक भिखारी बच्ची दिखती है जो अपने भाई को भीख कैसे मांगें, यह सिखा रही थी. यह प्रशिक्षण का एक नायाब पहलू था. नमाज- एक अद्भुत कहानी है. यह धर्म और मजहब से परे मानवीय संबंधों की उत्कट कहानी है, जिसका आधार इनसानी भावनाएं हैं. यह निधि और उसकी पड़ोसी रेशमा आंटी की कहानी है. कोरोना काल में जिंदगी भर मजहब की पाबंदियों से परहेज करने वाले सेवानिवृत्त जानेमाने प्रोफेसर हसन साब अचानक हर रोज ड्राइवर के साथ मस्जिद जाने की बात कह कर बाहर निकल जाते हैं. रेशमा आंटी उन पर संदेह करने लगती हैं और निधि और उसके अफसर पति से सहयोग मांगती हैं. बाद में ड्राइवर सोनू ऐसा राज खोलता है कि सभी दंग रह जाते हैं. खास बात यह कि आंटी को उनके जन्मदिन पर इससे नायाब तोहफा नहीं मिल सकता था.

किसी भी कहानी की सबसे बड़ी सिफत यही है कि उसे प्रथमद्रष्टया किस्सागोई से भरपूर होना चाहिए और यह गुण सच्चिदानंद जोशी की कहानियों में हैं. अपनी मां मालती जोशी की तरह, जिन्होंने एक दौर में अपने उपन्यासों व कहानियों का भारी संख्या में पाठक समाज बनाया, जोशी की कहानियां उसी राह पर चलती हुई वही झलक लाने की कोशिश करती हैं. जोशी की कहानियां भले ही आज की मुख्य धारा की कहानियों से थोड़ा अलग हों पर इनमें स्वच्छ जीवनमूल्यों वाले गांधी की छवि दिखती है इसमें संदेह नहीं.

पुस्तकः पुत्रिकामेष्टि
रचनाकारः सच्चिदानंद जोशी
विधाः कहानी
भाषाः हिंदी
प्रकाशकः सामयिक प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 144
मूल्यः 395 रुपए, हार्डबाउंड संस्करण
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

 

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