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खुशवंत सिंह पुण्यतिथि विशेषः पुस्तक अंश- पाकिस्तान मेल, अंततः मनुष्यता ही अपने बलिदानों में जीवित रहती है

कहते हैं गुलामी के दिनों में जब खुशवंत सिंह के पिता दिल्ली की लगभग आधी बेशकीमती जमीनों के मालिक थे और राजे-महाराजे, गवर्नर्स और भारत के वायसराय तक उनके यहां रात्रि भोजों पर आते थे, तब खुशवंत पर लिखने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि वे पूर्णकालिक लेखक बन गए.

पाकिस्तान मेल उपन्यास का आवरण चित्र [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन] पाकिस्तान मेल उपन्यास का आवरण चित्र [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

खुशवंत सिंह देश के बेहद चर्चित लेखक, पत्रकार, उपन्यासकार, इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक थे. अंग्रेजी लेखक के रूप में उनकी ख्याति पूरी दुनिया में थी. कहते हैं गुलामी के दिनों में जब खुशवंत सिंह के पिता दिल्ली की लगभग आधी बेशकीमती जमीनों के मालिक थे और राजे-महाराजे, गवर्नर्स और भारत के वायसराय तक उनके यहां रात्रि भोजों पर आते थे, तब खुशवंत पर लिखने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि वे पूर्णकालिक लेखक बन गए.

भारत-विभाजन की त्रासदी पर केंद्रित 'पाकिस्तान मेल' खुशवंत सिंह का अत्यंत मूल्यवान उपन्यास है. सन् 1956 में अमेरिका के 'ग्रोव प्रेस एवार्ड' से पुरस्कृत यह उपन्यास मूलतः उस अटूट लेखकीय विश्वास का नतीजा है, जिसके अनुसार अंततः मनुष्यता ही अपने बलिदानों में जीवित रहती है. घटनाक्रम की दृष्टि से देखें तो 1947 का भयावह पंजाब! चारों ओर हजारों-हजार बेघर-बार भटकते लोगों का चीत्कार! तन-मन पर होनेवाले बेहिसाब बलात्कार और सामूहिक हत्याएँ! लेकिन मजहबी वहशत का वह तूफान मनो-माजरा नामक एक गाँव को देर तक नहीं छू पाया; और जब छुआ भी तो उसके विनाशकारी परिणाम को इमामबख्श की बेटी के प्रति जग्गा के बलिदानी प्रेम ने उलट दिया.

उपन्यास के कथाक्रम को एक मानवीय उत्स तक लाने में लेखक ने जिस सजगता का परिचय दिया है, उससे न सिर्फ उस विभीषिका के पीछे क्रियाशील राजनीतिक और प्रशासनिक विरूपताओं का उद्घाटन होता है, बल्कि मानव-चरित्र से जुड़ी अच्छाई-बुराई की परंपरागत अवधारणाएँ भी खंडित हो जाती हैं. आज खुशवंत सिंह की पुण्यतिथि पर साहित्य आजतक पर पढ़िए भारत-पाकिस्तान बंटवारे की त्रासदी पर लिखी गई उनकी अत्यंत पठनीय कृति 'पाकिस्तान मेल' का खास अंश.

पुस्तक अंशः पाकिस्तान मेल
 
1947 की गर्मियाँ आम गर्मियों की तरह नहीं थीं. उस साल हिन्दुस्तान के मौसम में भी एक दूसरी ही तर्ज थी. सामान्य से कुछ अधिक गर्म, शुष्क और धूलभरा. गर्मियाँ लम्बी भी हो चली थीं. किसी को याद नहीं आ रहा था कि किस साल मानसून ने आने में इतनी देर की थी. हफ्तों से छुटपुट बादल सिर्फ घिर-घिरकर छिटकते रहे थे. बारिश तो हुई ही नहीं. लोगों ने कहना शुरू किया कि ईश्वर उनको उनके पापों की ही सजा दे रहा था.
कुछ लोगों के लिए तो ऐसा सोचना जायज भी था कि उन्होंने पाप किए थे. पिछली गर्मियों में, देश को हिन्दू भारत और मुस्लिम पाकिस्तान में बाँटने की प्रस्तावित रपट से कलकत्ते में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे और कुछ ही महीने के भीतर मरनेवालों की संख्या हजारों में जा पहुँची थी. मुसलमानों ने कहा कि यह हिन्दुओं की योजना थी और मारकाट पहले उन्होंने ही शुरू की. हिन्दुओं ने यही आरोप मुसलमानों पर लगाया. असलियत यह थी कि मारकाट दोनों तरफ से बराबर हुई थी. दोनों तरफ से गोलियाँ चलाई गई थीं. दोनों ने छुरे घोंपे थे, भाले और बल्लम चलाए थे. दोनों ने बलात्कार किए थे. दोनों ने एक-दूसरे पर कहर बरपाया था.
कलकत्ते से बढ़कर दंगे उत्तर, पूर्व और पश्चिम की ओर फैलने लगे; पूर्वी बंगाल में नोआखाली तक, जहाँ मुसलमानों ने हिन्दुओं का कत्ल किया और इधर बिहार तक, जहाँ हिन्दुओं ने मुसलमानों का. मुल्ले लोग पंजाब और सरहदी सूबों में बिहार में मारे गए मुसलमानों की खोपड़ियाँ सन्दूकों में भर-भरकर घूमने लगे. सदियों से देश के उत्तर-पश्चिमी सरहदी इलाकों में रहते आ रहे हिन्दू और सिख अपना घर-बार छोड़ सुरक्षा के लिए पूरब की तरफ हिन्दू और सिखों की बहुतायतवाले इलाकों की तरफ भागने लगे. कोई पैदल ही चल पड़े, कोई बैलगाड़ियों में, कोई ठसाठस भरी लारियों में लदे, तो कोई रेलगाड़ियों से लटके या उनकी छतों पर पटे. रास्तों में उनकी मुठभेड़ें वैसे ही त्रस्त मुसलमानों से हुईं, जो सुरक्षा के लिए पश्चिम की तरफ भाग रहे थे. दंगे भगदड़ में बदल गए थे.
1947 की गर्मियों तक, जबकि पाकिस्तान के नए राज्य के निर्माण की विधिवत घोषणा की जा चुकी थी, लगभग एक करोड़ लोगकृहिन्दू, मुसलमान और सिखकृइसी भगदड़ में फँसे थे. मानसून के आगमन तक दस लाख के करीब लोग मारे जा चुके थे. पूरे उत्तर भारत में हथियार तने हुए थे, लोग भयत्रस्त थे और लुक-छिप रहे थे. शान्ति के एकाकी अवशिष्ट मरुद्वीप थे दूर सरहद पर पड़नेवाले छिटके-छितरे छोटे-छोटे दुर्गम गाँव. इन्हीं गाँवों में से एक था ‘मनो-माजरा’.
मनो-माजरा एक छोटी-सी जगह है. यहाँ सिर्फ तीन पक्की इमारतें हैं. इनमें से एक तो है महाजन लाला रामलाल का घर. अन्य दो में से एक है सिखों का गुरुद्वारा और दूसरी मुसलमानों की मस्जिद. ये तीनों पक्की इमारतें एक साँझी तिकोनी जमीन को घेरती हैं, जिसके बीचोबीच एक पीपल का पेड़ है. गाँव के बाकी सारे घर हैं चपटी छतोंवाली मिट्टी की झोंपड़ियाँ, जिनमें ठिगनी दीवारों से घिरे आँगन हैं. इन झोंपड़ियों के अगले हिस्से सँकरी गलियों के बीच खुलते हैं. नुक्कड़ों पर जाकर गलियाँ पगडंडियों में परिवर्तित हो जाती हैं और फिर निकटवर्ती खेतों में सिमटकर बिला जाती हैं. गाँव के पश्चिमी किनारे पर एक पोखरा पड़ता है. चारों ओर कीकर के पेड़ों से घिरा. केवल सत्तर परिवारों का गाँव है यह मनो-माजरा और बस एक, लाला रामलाल का परिवार ही हिन्दुओं का परिवार है यहाँ. बाकी के सारे या तो सिख हैं या मुसलमान. तादाद में लगभग बराबर-बराबर. जमीनें सारी सिखों की हैं, मुसलमान सब काश्तकार हैं और भूस्वामियों के साथ मिलकर खेती-बाड़ी करते हैं. कुछ परिवार भंगियों के हैं, जिनके धर्म के बारे में बताना मुश्किल है. मुसलमान उन्हें अपना हिस्सा समझते हैं, फिर भी जब अमेरिकन मिशनरी मनो-माजरा में आते हैं तो ये खाकी रंग की सोला टोपियाँ लगा लेते हैं. कभी यही लोग हारमोनियम की तर्ज पर अपनी औरतों के साथ मिलकर भजन भी गाने लगते हैं. कभी-कभी ये गुरुद्वारे भी हो आते हैं.
लेकिन मनो-माजरा में एक ऐसी भी चीज है जिसके आगे वहाँ का हर बाशिन्दा श्रद्धा से झुकता है. लाला रामलाल भी. पोखरे के करीब कीकर के पेड़ के नीचे बलुआ पत्थर का एक तीन फीट ऊँचा सीधा खड़ा शिलाखंड है. यह स्थानीय लोगों का आराध्य देव है. हिन्दू क्या, सिख क्या, मुसलमान क्या और ईसाई क्या, जिस किसी को भी, जब कभी इसकी विशेष अनुकम्पा की अपेक्षा होती है, चोरी-छिपे इसका जीर्णोद्धार करवाते रहते हैं.
यद्यपि कहा जाता है कि मनो-माजरा सतलज नदी के किनारे बसा हुआ है, पर असल में यह नदी से आधा किलोमीटर दूर है. हिन्दुस्तान में, वैसे भी, कोई गाँव नदी के ज्यादा करीब बसने की धृष्टता कर भी नहीं सकता. मौसम के मुताबिक नदियों का रुख भी बदलता रहता है और बिना कोई पूर्वसूचना दिए वे अपने रास्ते बदल लेती हैं. सतलज पंजाब की सबसे बड़ी नदी है. मानसून शुरू होने पर इसका पानी बढ़ने लगता है और अपने विस्तृत रेतीले तल पर फैलता हुआ दोनों छोरों के तटबन्धों पर उफनने लगता है. इसका पंकिल उपद्रव तब मील-मील चौड़ा फैल जाता है. बाढ़ें जब थम चुकती हैं तो नदी अनगिनत उथली धाराओं में विभक्त हो जाती है जो छोटे-छोटे दलदली द्वीपों के गिर्द मन्द-मन्द बहने लगती हैं.
मनो-माजरा से करीब एक मील उत्तर की तरफ सतलज पर एक रेलवे लाइन का पुल पड़ता है. यह एक बृहद् पुल है. इसके अठारह बड़े-बड़े मेहराब एक खम्भे से दूसरे खम्भे तक लहरों की भाँति फैले हुए हैं. रेलवे लाइन के लिए पुश्ता बनाने को इसके दोनों किनारों पर पत्थरों के तटबन्ध हैं. पूरब की तरफ तो पुल का पुश्ता गाँव के रेलवे स्टेशन तक बढ़ता चला गया है.
मनो-माजरा अपने रेलवे स्टेशन के लिए ही जाना जाता है. पुल पर एक समय में सिर्फ एक ही ट्रेन के गुजरने की लाइनें हैं अतः स्टेशन की अनेक लाइनों पर कम महत्त्वपूर्ण गाड़ियाँ बड़ी गाड़ियों के गुजरने की प्रतीक्षा में खड़ी रहती हैं.
मुसाफिरों के खाने-पीने की चीजें, पान, सिगरेट, चाय, बिस्कुट और मिठाइयाँ आदि बेचनेवाले दुकानदारों और फेरीवालों ने स्टेशन के इर्द-गिर्द ही एक छोटी-सी बस्ती बसा रखी है. इसलिए स्टेशन पर दिन-रात चहल-पहल मची रहती है और इसीलिए रेलवे कर्मचारी अपने आपको बहुत महत्त्वपूर्ण भी समझने लगे हैं. लेकिन असलियत यह है कि स्टेशन मास्टर अपने दफ्तर के कबूतरखाने में खुद ही टिकटें भी बेचता है और फिर निकास मार्ग पर टिकट चेकर के रूप में खड़ा टिकटें भी ‘चेक’ करता है. अपनी मेज पर पड़े टेलीग्राफ यन्त्र पर वही बेचारा सन्देश भेजता और लेता है. हाँ, जब उसे पहचाननेवाले लोग स्टेशन पर होते हैं तो वह प्लेटफार्म पर निकल आता है और उन गाड़ियों को हरी झंडी दिखाने लगता है जिन्हें वैसे भी वहाँ नहीं रुकना होता. उसका इकलौता सहायक प्लेटफार्म पर अपने काँच के केबिन में बैठा दोनों तरफ के सिगनलों को नियन्त्रित करनेवाले लीवरों पर अपना हस्तकौशल दिखलाता रहता है और पटरियों पर लगे हस्त-संकेतों को बदल-बदल शंटिंग करते हुए इंजनों को पटरियाँ बदलवाता रहता है. शाम को वही सहायक पूरे प्लेटफार्म की लैम्पों को जलाता है. अल्यूमीनियम की भारी लैम्पों को उठाकर वही सिगनलों पर लेकर जाता है और लाल तथा हरे काँच के पीछे कुंडों में फँसाता है. यह काम भी उसी का है कि सुबह वह उन्हें वापस लाए और प्लेटफार्म की बत्तियों को भी बुझाए.

हारमोनियमवाले तथा तबलावादक ने लड़की के साथ कुछ खुसुर-पुसुर की और एक-दूसरे के साथ तारतम्य बैठाते हुए अपने-अपने वाद्य बजाने शुरू किए. कुछ देर तक लड़की निरपेक्ष भाव से तबला और हारमोनियम की तानें सुनती रही. प्रारम्भिक खाना-पूरी पूरी हुई तो लड़की ने अपनी नाक सुड़की, गला खँखारा और बायाँ हाथ कान पर रखकर दायाँ मजिस्ट्रेट की ओर तानकर तेज सुर में तान छेड़ीकृ
"चिट्ठीए दर्द फिराक वालिए,
लैजा लैजा सनेया सोने यार दा..."
लड़की कुछ देर को रुकी.
वादकों ने टेक पर फिर बजाना शुरू कियाकृ
लैजा लैजा सनेया सोने यार दा...
गाना खत्म हुआ तो हुकुमचन्द ने लड़की की तरफ कालीन पर पाँच का एक नोट फेंका. लड़की ने और वादकों ने सिर नवाकर शुक्रिया जाहिर किया. बुढ़िया ने झट नोट उठाया और बटुए के हवाले करते हुए फिर अलापना शुरू किया, "तेरी शोहरत बनी रहे, मालिक. लाखों पे चल्ले कलम तेरी..."
गाना फिर से शुरू हो गया था. हुकुमचन्द ने व्हिस्की का एक बड़ा पैग बनाया और एक ही घूँट में गटक लिया. लड़की की ओर भरपूर नजर देखने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी. अब जो गाना वह गा रही थी, हुकुमचन्द को भी अच्छी तरह आता था. अपनी बेटी को भी वह यही गाना गाते हुए कई बार सुन चुके थे.
"हवा में उड़ता जाए,
मेरा लाल दुपट्टा मलमल का,
हो जी ऽऽऽ, हो जी ऽऽऽ"
वे कुछ-कुछ अनमने-से होने लगे. व्हिस्की का एक और पैग बनाकर उन्होंने अपनी अन्तरात्मा को दबाने का प्रयास किया. जिन्दगी बहुत छोटी थी, अन्तरात्माओं की पुकारें सुनने लगे तो बस हो लिया. गाने के साथ चुटकियाँ बजाते और जाँघों पर थपकियाँ देते उन्होंने भी सुर में सुर मिलाना शुरू किया, "हो जी ऽऽऽ, हो जी ऽऽऽ."
साँझ का झुटपुटा काली रात में तब्दील होने लगा था. चाँद का कहीं ओर-छोर भी नहीं दिख रहा था. नदी के करीब के दलदलों से मेंढकों की टर्र-टर्र और नरकटों के जंगलों से शलभों की टिमटिमाहट शुरू हो गई थी. बैरा लालटेन लेकर आ पहुँचा. लालटेन की परछाईं हुकुमचन्द के ऊपर पड़ रही थी. रोशनी से मुँह छिपाती बैठी लड़की पर उनकी दृष्टि पड़ी. बिलकुल बच्ची-सी दिखती थी और कुछ खास खूबसूरत भी नहीं थी. बस, जवान थी और अनछुई. छातियों में अभी सहज उभार तक नहीं आया था. लड़की निश्चय ही पुरुष-संसर्ग से अनछुई प्रतीत होती थी. उनके दिमाग में एक बार खयाल कौंधा कि अरे, यह तो मेरी अपनी बेटी से भी छोटी है...! उन्होंने झट एक और पैग बनाया. धत्तेरे की! वे भी किन पचड़ों में पड़ रहे थे. यही जिन्दगी है. जो सामने आए, उसी को निभाते चलो. नियम-सिद्धान्त सब किताबी बातें हैं. उसे पैसे चाहिए थे और उन्हें...खैर. वैसे भी वह रंडी ही तो थी! और लग भी रही थी. उसकी साड़ी के सलमे-सितारे चमक रहे थे. नाक में हीरे की लौंग भी लिश्कारे मार रही थी. कोई भी भ्रम अब बाकी न रहे, हुकुमचन्द ने एक पैग और उँड़ेला. इस बार उन्होंने अपनी मूँछें रेशमी रूमाल से पोंछी. अबकी बार वे जरा जोर से सुर में सुर मिलाते हुए अँगुलियों की थाप दे रहे थे.
लड़की एक के बाद एक फिल्मी गाने सुनाती रही. ‘टैगो’ और ‘सम्भा’ की विदेशी धुनों पर आधारित गाने चुक गए तो मजिस्ट्रेट साहब ने फरमाइश की, "कुछ भी गाओ, जो भी तुम्हें आता हो...कुछ भी, कुछ नया और मजेदार..."
लड़की ने अंग्रेजी शब्दों की भरमारवाला एक गाना गाना शुरू कियाकृ
"आना मेरी जान, मेरी जान,
संडे के संडे..."
हुकुमचन्द जी खिल उठे, "वाह, वाह..."
गाना पूरा होते ही उन्होंने पाँच का एक नोट लड़की की ओर बढ़ाया, पर उछाला नहीं. इशारा किया कि आओ और ले जाओ. बुढ़िया ने लड़की को साहब की ओर धकेला, "अरी जा. सरकार बुला रहे हैं तुझे."
लड़की उठकर मेज के पास गई. पैसे लेने के लिए उसने हाथ बढ़ाया. हुकुमचन्द ने अपना हाथ खींचकर सीने पर धर लिया और बेशर्मी से मुस्कराने लगा. लड़की लाचार-सी अपने साथियों की ओर देखने लगी. हुकुमचन्द ने नोट मेज पर रख लिया. लड़की उसे उठा पाती इससे पहले ही उन्होंने लपककर पुनः उसे उठा लिया और सीने पर रख दिया. उनकी बाँछें तनिक और खिलने लगीं. लड़की बेचारी सकपकाकर अपने स्थान पर लौट आई. हुकुमचन्द ने नोट फिर मेज पर वापस ला रखा.
"अरी जा ना, सरकार के पास!" बुढ़िया ने लड़की को पुचकारकर समझाया. आज्ञाकारी बच्चे की भाँति वह हुक्म की तामील करती पुनः मजिस्ट्रेट के पास पहुँची. हुकुमचन्द ने उसकी कमर के गिर्द अपनी बाँह डाल दी.
"बहुत अच्छा गाती हो!"
लड़की फटी-फटी आँखों से अपने साथियों को ताकने लगी.
"सरकार तेरे से बात कर रहे हैं. कुछ कह रहे हैं. बोलती क्यों नहीं?" बुढ़िया ने उसे फटकारा. फिर मजिस्ट्रेट की ओर मुखातिब होकर बोली, "हुजूर, अभी बहुत छोटी है और जरा शरमाती है. धीरे-धीरे सीख जाएगी..."
हुकुमचन्द ने व्हिस्की का गिलास लड़की के होंठों से लगाया, "थोड़ी-सी पीओ ना! एक घूँट ही सही, मेरी खातिर..."
लड़की चुपचाप वैसे ही खड़ी रही. उसने मुँह नहीं खोला. बुढ़िया ने कहना शुरू कियाकृ
"सरकार, इसे पीने-पिलाने के बारे में कुछ नहीं मालूम! अभी बिलकुल नादान है. अभी सोलह की भी नहीं हुई. मर्दजात से एकदम नावाकिफ है. समझिए, आपके लिए ही पाल-पोसकर बड़ा किया है मैंने इसको..."
"अच्छा, पीना नहीं है तो खा ही लो कुछ," हुकुमचन्द ने बुढ़िया की रट को नजरअन्दाज करते हुए कहा और तश्तरी में से एक कबाब उठाकर लड़की के मुँह में ठूँसने को हुए. लड़की ने उनके हाथ से कबाब पकड़ ली और खाने लगी.
हुकुमचन्द ने उसे अपनी गोद में खींच लिया और उसके बालों में अपनी अँगुलियाँ उलझा दीं. तेल चुपड़े घुँघराले किए हुए बालों में जगह-जगह हेयर पिन लगे थे. हुकुमचन्द ने कुछ पिन निकालकर उसके जूड़े को ढीला किया. बाल उसके कन्धे पर फैल गए. गवैए और बुड्ढी औरत उठकर खड़े हो गए.
"हमें इजाजत हो, सरकार!"
"अच्छा, आप जाओ, ड्राइवर आप लोगों को घर छोड़ आएगा."
बुढ़िया ने फिर से वही राग अलापना शुरू किया, "तेरा नाम और रुतबा बढ़े. हजारों, लाखों पे तेरी कलम..."
हुकुमचन्द ने नोटों की एक गड्डी निकालकर मेज पर रख दी. पैसे लेकर औरत और उसके साथी मोटरगाड़ी में बैठकर चल दिए. लड़की वहीं रह गई.
बैरा आदेश लेने के लिए खड़ा था, "साहब, खाना परोस दूँ."
"नहीं रहने दो! मेज पर ही रहने दो. हमें जब जी करेगा, खुद ही ले लेंगे. तुम अब जाओ."
बैरे ने मेज पर खाना लगा दिया और अपने क्वार्टर को चल दिया.
हुकुमचन्द ने हाथ बढ़ाकर लालटेन की बत्ती नवा दी. बत्ती बुझते ही वहाँ अँधेरा छा गया. बेडरूम की खिड़की से, बस, प्रकाश की हल्की-सी झलक बाहर आ रही थी. हुकुमचन्द का भीतर जाने का कोई इरादा नहीं था. बाहर इस वातावरण मंे ही उन्हें अच्छा लग रहा था.
मनो-माजरा के स्टेशन पर कुछ वैगनें काटकर मालगाड़ी स्टेशन छोड़कर पुल की ओर बढ़ रही थी. गड़गड़ाहट के साथ गाड़ी बढ़ी आ रही थी. इंजन की चिमनी से उड़ती चिनगारियाँ उसकी बढ़ती हुई गति की सूचक थीं. इंजन की भट्ठी में कोयले झोंके जा रहे थे. लाल-सन्तरी-सी एक प्रज्वलित रेखा पुल के आर-पार होती हुई दूसरी तरफ नरकटों के जंगलों में विलीन हो गई. गाड़ी की गड़गड़ाहट का स्वर हल्का होने लगा था. इसके गुजर जाने के बाद उन्हें लगा कि जैसे उनकी प्राइवेसी फिर लौट आई.
हुकुमचन्द ने गिलास में और व्हिस्की उँडेली. लड़की उनकी गोद में बुत-सी बैठी थी, एकदम अकड़ी-सी.
"मुझसे नाराज हो क्या? कोई बात ही नहीं कर रहीं?" हुकुमचन्द ने उसे अपने से और करीब सटाते हुए कहा. लड़की ने न उनकी तरफ ताका, न कुछ जवाब ही दिया.
मजिस्ट्रेट को भी कौन-सा उसकी प्रतिक्रिया से कुछ लेना-देना था! आखिर उन्होंने उसकी कीमत अदा की थी. लड़की का चेहरा उन्होंने अपने करीब किया और उसकी ग्रीवा के पृष्ठभाग और कर्णलोपों को चूमने लगे. मालगाड़ी का शब्द अब शान्तप्राय हो गया था. चारों तरफ निपट एकान्त था, सन्नाटा. उन्हें अपनी तेज होती साँसें सुनाई दे रही थीं. उन्होंने लड़की की अँगिया का फीता खोल दिया.
अचानक ही गोली के चलने की आवाज रात्रि की निस्तब्धता को भेद गई. लड़की छिटककर दूर जा खड़ी हुई.
"तुमने क्या गोली की आवाज सुनी?"
लड़की ने सिर हिलाया, "कोई शिकारी होगा शायद!" इतनी देर में पहली बार उसके मुँह से कोई बोल फूटे थे. वह फिर से अपनी अँगिया को कसने लगी.
"ऐसी अँधेरी काली रात में कोई शिकारी नहीं हो सकता."
दोनों कुछ देर चुपचाप खड़े रहे. हुकुमचन्द कुछ आशंकित-से हुए और लड़की ने जैसे राहत की साँस लीकृमदिरा, तम्बाकू और पायरिया की मिली-जुली गन्ध से बसाती साँसों से मुक्ति. किन्तु कुछ ही देर में पुनः निस्तब्धता छा गई. हुकुमचन्द ने सोचा, सब ठीक-ठाक है. अपने आपको और आश्वस्त करने के लिए उन्होंने एक घूँट और भरा. लड़की समझ गई कि अब बचाव का कोई चारा नहीं बचा था.
"पटाखे-पटूखे छोड़े होंगे किसी ने. हो सकता है कहीं कोई शादी-ब्याह हो रहा हो," हुकुमचन्द ने लड़की को बाँहों में ले लिया, "आओ न, हम लोग भी शादी कर लें."
लड़की मूक ही बनी रही. हुकुमचन्द के हाथ उसके बदन पर फिसलते रहे और वह चुपचाप बिना प्रतिकार किए झेलती रही. उन्होंने उसे गिलासों, तश्तरियों और बोतलों के बीच वहीं कालीन पर लिटा दिया. लड़की ने साड़ी से अपना चेहरा ढाँपकर मुँह को एक तरफ मोड़ लिया, ताकि उनकी दुर्गन्ध युक्त साँसों से बची रहे. हुकुमचन्द उसके कपड़ों का छोर-छोर ढूँढ़ रहे थे.
तभी मनो-माजरा की तरफ से लोगों के चीखने-चिल्लाने और कुत्तों के जोर-जोर से भौंकने की आवाजें आने लगीं. हुकुमचन्द ने उधर रुख किया. गोली चलने की दो आवाजें आईं और कुत्तों का भौंकना तथा लोगों का शोरगुल सहसा ही थम गया.
"तेरी ऐसी की तैसी..." बड़बड़ाते हुए हुकुमचन्द ने लड़की को छोड़ दिया. वह उठी और कपड़े झाड़ते हुए खड़ी हो गई. सर्वेंट क्वार्टरों से बैरा और जमादार उत्सुकतापूर्वक बतियाते हुए लालटेनें उठाए चले आ रहे थे. थोड़ी देर बाद ही हैडलाइटों की तेज रोशनी से बँगले के अग्रभाग को आलोकित करती मोटरगाड़ी पोर्टिको में आकर खड़ी हो गई.

• पुस्तकः पाकिस्तान मेल
• लेखकः खुशवंत सिंह
• भाषाः हिंदी
• प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
• मूल्यः रुपए 191 पेपरबैक संस्करण
• पृष्ठ संख्याः 208

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