जब इरफ़ान खान भारत से दूर विदेश में अपनी दुर्लभ बीमारी का इलाज करवा रहे थे, तब यहां दर्शक और प्रशंसक उनके जल्दी से सेहतमंद होकर लौटने की कामना कर रहे थे. सभी की दुआएं और प्रार्थनाएं उनके साथ हैं. यह पूंजीभूत प्रार्थना इरफ़ान की जीवन धारा और विश्वास की शक्ति थी. इरफ़ान ने तब कहा था कि जिंदगी कई बार ऐसे मोड़ पर ले आती है जब अनिश्चित ही निश्चित जान पड़ता है. मिजाज से योद्धा इरफ़ान की मानसिक अवस्था और अहसास को हम उनकी नीचे लिखी पंक्तियों में महसूस कर सकते हैं, जो उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार अजय ब्रह्मात्मज के साथ अपने भावपूर्ण शब्द में शेयर किए थे. खास बात यह कि ब्रह्मात्मज ने अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ' ... और कुछ पन्ने कोरे रह गए: इरफ़ान' में उनकी ढेर सारी बातों, लेखों, साक्षात्कारों और फिल्म समीक्षाओं के साथ इस पत्र को भी समेटा है. यह इरफ़ान की जीवनी नहीं है, पर इसमें उनके साक्षात्कार और उन पर लिखे संस्मरण हैं. यह पुस्तक इरफान के अनोखे व्यक्तित्व को उन्हीं के शब्दों में उभारती है. उनके मित्रों-परिचितों के संस्मरण उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को व्यक्त करते हैं. इरफ़ान को जानने-समझने के लिए यह एक अंतरंग पुस्तक है.
फिलहाल इरफ़ान की जयंती पर उसी पुस्तक के सौजन्य से हम उनके पत्र को यहां अविकल रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं....
लंदन से आया इरफ़ान का पत्र
कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरो एन्डोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं, मैंने पहली बार यह शब्द सुना था. खोजने पर मैंने पाया कि मेरे इस शब्द पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं, क्योंकि यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है.
अभी तक मैं एक अलग खेल में था. अपने इस सफ़र में मैं तेज़-मंदगति से चलता चला जा रहा था... मेरे साथ मेरी योजनायें, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं. मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था, तेज ट्रेन राइड का लुत्फ उठा रहा था कि अचानक किसी ने मेरे कंधे पर थपथपाया. जब मैंने मुड़कर देखा तो वह टीसी था, जिसने कहा, 'आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं.' मेरी समझ में नहीं आया, मैं अचंभित था, 'नहीं...नहीं यह मेरी मंजिल नहीं है...ना मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.' ...
जवाब मिला, 'नहीं यहीं है. अगले किसी भी स्टाप पर उतरना होगा, आपका गन्तव्य आ गया...' जिंदगी कभी कभी ऐसे ही होती है.
अचानक एहसास हुआ कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं...लहरों को क़ाबू करने की ग़लतफ़हमी लिए.
इस हड़बोंग, सहम और डर में घबराकर मैं अपने बेटे से कहता हूं, 'आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूं...मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता. मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ होकर जी पाऊं. मैं खड़ा होना चाहता हूं.
ऐसी मेरी मंशा थी, मेरा इरादा था...
कुछ हफ़्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया. बेइंतहा दर्द हो रहा है. यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द... अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है... कुछ भी काम नहीं कर रहा है. ना कोई सांत्वनाऔर ना कोई दिलासा. पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आई है... दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ.
मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है. ...बाहर का नज़ारा दिखता है. कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है. सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है... वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है. मेरे बचपन के ख्वाबों का मक्का, उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ...मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं.
मैं दर्द की गिरफ्त में हूं.
और फिर एक दिन यह अहसास हुआ...जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे ...ना अस्पताल और ना स्टेडियम. मेरे अंदर जो शेष था, वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था...मेरे अस्पताल का वहां होना था. मन ने कहा...केवल अनिश्चितता ही निश्चित है.
इस अहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया...अब चाहे जो भी नतीजा हो, यह चाहे जहां ले जाये, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद... या फिर दो साल... चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया.
पहली बार मुझे शब्द 'आज़ादी' का एहसास हुआ सही अर्थ में! एक उपलब्धि का अहसास.
इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया. वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं...फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं.
इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग... सभी मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम जोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं. मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिलकर एक हो गयी हैं, एक बड़ी शक्ति... तीव्र जीवन धारा बनकर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही हैं.
अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है... मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं. लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नई दुनिया दिखाती हैं.
अहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो. जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!
जून 2018
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सरस्वती बुक्स से प्रकाशित अजय ब्रह्मात्मज की पुस्तक '...और कुछ पन्ने कोरे रह गए: इरफ़ान'
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