साठोत्तरी पीढ़ी के महत्त्वपूर्ण कहानीकार एवं सिद्धहस्त नाटककार असग़र वजाहत का आज जन्मदिन है. इस अवसर पर हम 'साहित्य आजतक' पर उनके बहुचर्चित उपन्यास 'धरा अंकुराई' का अंश दे रहे. यह उपन्यास कथाकार असगर वजाहत के बहुचर्चित उपन्यास-त्रयी का तीसरा भाग है. पहले के दो उपन्यासों ‘कैसी आग लगाई’ और ‘बरखा स्वाई’ ने अच्छीखासी लोकप्रियता अर्जित की थी. इस उपन्यास-त्रयी में वजाहत ने जीवन के तीन अलग-अलग क्षेत्रों से बावस्ता मित्रों के माध्यम से पूरे देश की नब्ज को टटोलने का प्रयास किया है, और इसमें पूरी तरह से सफल भी हुए हैं.
वजाहत के इस उपन्यास के तीन प्रतिनिधि पात्र हैं, और तीनों की खासी दोस्ती है. पहला मित्र पत्रकार बनता है, दूसरा राजनीति में सक्रिय होता है और तीसरा प्रशासनिक सेवा में अपनी जगह बनाता है. बस उपन्यास के काथानक इन्हीं तीनों मित्रों के इर्दगिर्द घूमते हैं, और हमारा देश, समाज, सब इनकी मार्फत उभर आते हैं. असगर वजाहत अपने इस उपन्यास में अतीत के कई स्तरों को उभारने में सफल होते हैं.
इस उपन्यास की प्रकाशकीय टिप्पणी है, ''धरा अंकुराई वस्तुत: जीवन की सार्थकता और प्रासंगिकता को तलाशते हुए लिखी गई कृति है. नायक को लगता है कि अब तक तो मैं औरों के आदेशों का अंधानुगमन ही करता रहा. दूसरों द्वारा तय किए गए लक्ष्यों व कार्यों को पूरा करते-करते अपना मूल स्वभाव ही बिसार बैठा. आखिर मेरे जीवन की प्रासंगिकता क्या है?... उल्लेखनीय है कि यह एक सनातन अथवा यक्ष प्रश्न है.
उपन्यास-अंशः धरा अंकुराई
- असगर वजाहत
संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र में नई सरकार बन गई. हमारे पुराने मित्र और राजनीति के मैदान के धाकड़ खिलाड़ी हाजी शकील अहमद अंसारी की पार्टी ने मिली-जुली सरकार बना ली. हाजी साहब को उनकी वरिष्ठता और योगदान के मुताबिक गृह मंत्रालय सौंपा गया. अख़बारों और टी.वी. पत्रकारों ने पहले तो चुनाव और फिर नई सरकार को सिर पर उठा रखा था. मैंने अपने पुराने मित्र शकील अहमद अंसारी को फ़ोन मिलाया तो उनके निजी सचिव रियाज़ ने फ़ोन उठाया. वह मेरी आवाज़ पहचान गया. क्यों न पहचानता? उसे मालूम है कि हाजी साहब अगर कभी-कभी 'तौबा तोड़ते’ हैं तो मेरे और अहमद के साथ ही यह सम्भव होता है. हम तीनों में पैंतीस साल पुरानी दाँत-काटी दोस्ती है.
''जी सर...हाजी साहब को अभी फ़ोन देता हूँ.’’ उसने कहा और फिर फ़ौरन ही शकील की आवाज़ आई.
''कहाँ हो...अरे अब तो दिल्ली आ जाओ.’’
मैं हँसा- ''तुम वहाँ हो तो और किसका गुज़र हो सकता है.’’
''वही पुरानी आदत...खैर बताओ सब कैसा है? नूर भाभी कैसी हैं और हीरा मियाँ क्या कर रहे हैं?’’
''दोनों ख़ुश हैं...हीरा ने थीसिस जमा कर दी है और नूर एन.जी.ओ. में काम कर रही हैं.’’
''भाई अहमद के क्या हाल हैं...मुझे उसका एक मेल यू.एस. से मिला था.’’
''उसका ऑपरेशन हो गया है...ठीक हो रहा है...जल्दी ही आएगा. और सरकार कैसी चल रही है?’’
''ये सब फ़ोन पर बतानेवाली बातें नहीं हैं. दिल्ली आओ तो बात हो.’’
''चलो अब तो आना ही पड़ेगा...वैसे मैं दो साल से टाल रहा हूँ.’’
''ऐसी भी क्या बेज़ारी...माना कि तुम्हें पसन्द नहीं लेकिन कुछ दिन के लिए ही आ जाओ.’’
एक दो और छोटी-मोटी बातों के बाद बातचीत ख़त्म हो गई. मैं अख़बार में छपी नए मंत्रिमंडल की तस्वीरें देखने लगा. नई सरकार बन गई है, क्या होगा? ये सरकार न बनती तो क्या कुछ होता? चन्द सौ लोग और उनसे जुड़े चन्द हज़ार लोग ज़्यादा फ़ायदा उठा पाएँगे. बस यही होगा. पहले वे घोटाले करते थे, अब ये घोटाले करेंगे. नीतियों में जो भी फ़र्क हो आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा? जैसे मज़दूर, रिक्शाचालक, गरीब किसान, छोटे-मोटे मध्यम या निम्न मध्य लोगों की जिन्दगी पर क्या फ़र्क पड़ेगा? क्या धनवान ग़रीब हो जाएगा? क्या उसकी सम्पत्ति ले ली जाएगी? मतलब प्राय: सब कुछ उसी गति से चलता रहेगा, जिस गति से चल रहा था. तो क्या राजनीतिक दलों में कोई अन्तर नहीं है? क्या सबका 'एजेंडा' एक ही है? फिर नई सरकारें क्यों बनती हैं? चुनाव पर देश खरबों रुपया क्यों खर्च करता है? क्यों नहीं सभी दल मिलकर एक सरकार बना लेते और उसे चलाते रहें? जहाँ तक जनता की भलाई या नीतियों का सवाल है, सब दल लगभग सहमत हैं कि जिस तरह से देश चल रहा है वैसे ही चलता रहेगा.
''मैं चाहता तो ये था कि तुम्हें कोई अच्छी ख़बर सुनाऊँ लेकिन लगता है मेरा अच्छी ख़बरों का कोटा ख़त्म हो गया है.’ अहमद के ई-मेल की इन लाइनों ने भयानक शंकाएँ पैदा कर दीं. मैं स्क्रीन पर आँखें गड़ाकर पढ़ने लगा. उसने लिखा था- 'अमेरिका में ऑपरेशन के बाद तीन महीने रहा. 'केयर सेन्टर’ में तीन महीने गुजारने और ऑपरेशन के बाद पूरी देख-भाल, दवाएँ खाने, दर्द झेलने के बावजूद चलने-फिरने के काबिल नहीं हो सका. डॉक्टरों का कहना है इसमें एक साल तक लग सकता है. भाई साहब की यही राय है कि मैं एक साल यहाँ रहूँ लेकिन मेरा दिल, जो अब तक किसी भी ऑपरेशन से महफूज़ है, लगातार इन्कार करता रहा. मैं भाई साहब से कहता रहा कि एक साल का ये वक़्त हिन्दुस्तान में अच्छी तरह गुज़ार सकता हूँ. दवाएँ खाता रह सकता हूँ और डॉक्टरों से 'कानटैक्ट’ बना रह सकता है. लेकिन भाई साहब तैयार ही नहीं थे.
"पता नहीं शायद उनके दिल में ये था कि छोटे भाई के इलाज की पूरी जि़म्मेदारी उनके ऊपर है. चाहे जितना पैसा ख़र्च हो जाए, लेकिन इलाज उन्हें कराना है. मैं ये सब जानते हुए कि पैसे कि कमी न तो भाई साहब के पास है और न मेरे पास है, इसरार करता रहा कि मुझे हिन्दुस्तान भिजवा दीजिए. भाई साहब और मेरे दरम्यान ये 'डिबेट’ एक महीने तक चलती रही. मुझे जब यह लगा कि बात बन नहीं रही है तो मैंने डॉक्टरों को 'इन्वाल्व’ किया. उनसे कहा कि ठीक होने के लिए मुझे जो 'इमोशनल सपोर्ट’ चाहिए वह हिन्दुस्तान में ही मिल सकती है. डॉक्टर मेरी राय से मुत्तफ़िक़ थे. उन्होंने भाई साहब से कहा और नतीजे में मैं दिल्ली आ गया हूँ. अपने मयूर विहार वाले फ्लैट में हूँ. कुछ पुराने फारेन सर्विस के दोस्त हैं जो हाय हेल्लो कर देते हैं. एक-दो ऐसी ख़वातीन भी रहती हैं जिनसे उस ज़माने में जब 'आतिश’ जवान था, कुछ रस्मोराह थी. बकौल मख़दूम मोहिउद्दीन- 'इस शहर में एक आह-ए-ख़ुश चश्म से हमको. कम-कम ही सही निस्बते पैमाना रही है.’’
शेर पढ़कर मैं हँसा. अहमद का यह प्यारा शेर है. क्यों न होता. हर शहर में उसने एक राग अलापा था जब 'आतिश’ जवान था.
''तो सुनो...अब मैं दिल्ली में हूँ. सुना तुम दिल्ली नहीं आते और इस प्यारे शहर से नफ़रत करने लगे हो. यार ऐसा मत करो...’’
मुझे फिर हँसी आ गई.
''कोई बात नहीं दिल्ली से नफरत करते रहो लेकिन मुझसे तो नफरत न करो...अच्छा हाँ अपना यार शकील होम मिनिस्टर हो गया है. यार मुझसे ग़लती हो गई...मैं भी साला 'पॉलिटिक्स’ ज्वाइन कर लेता तो अच्छा था. अब्बा जान का बनाया हुआ 'बेस’ तो था ही.’’
मैं अतीत में चला गया. लखनऊ में सौ साल पुरानी शानदारी कोठी. राजा अरगला सर सैयद इक़बाल अहमद का महल. पुराने झाड़-फानूस, घिसे हुए ईरानी काली. रंग-बिरंगी काँच की खिड़कियों से आती रोशनी. तीन-चार पीढ़ियों की, शानदार फ्रेम में जड़ी, क़द्दे-आदम तस्वीरें. विशाल ड्राइंग रूम लेकिन सब ज़वाल की तरफ़ मायल. खाक और धूल में अटा हुआ. लंबे विशाल कॉरीडोर! आगे लॉन जो सूखकर किसी 'बेवा की जवानी या बनिए की किताब’ बन गया था. पीछे बाग़ जहाँ लौंडे गुल्ली-डंडा खेला करते थे. धोबी कपड़े सुखाया करते थे, सर्वेन्ट क्वाटर में चिन्ना का विशाल खानदान आबाद था. आज वह महल नहीं. उसकी जगह सैकड़ों डीलक्स फ्लैट बन गए हैं.
अहमद ने आगे लिखा था- ''चलो जो हुआ ठीक ही हुआ, अब साठ साल की उम्र में कभी ज़िन्दगी की किताब खोलता हूँ तो लगता है, मैंने ज़िन्दगी को पूरी तरह जिया है और अब सिक्के का दूसरा पहलू सामने आ रहा है. तुम कहा करते थे न कि हर खुशी के पीछे एक दुख छिपा होता है. तो मेरी सारी खुशियों के पीछे यही दुख थे जिन्हें मैं देख नहीं सकता था. शायद कोई नहीं देख पाता. मैं ज़िन्दगी भर जितना 'बिज़ी’ रहा आजकल उतना ही 'फ्री’ हूँ और सोचते-सोचते अक्सर शूजा और दिलबर की याद आती है. यार देखो कितनी अजीब बात है जो आपने लम्बे अर्से से नहीं देखा उसकी याद आपको कितना मजबूर कर देती है. दिलबर की याद एक इसी तरह का ज़ख्म है. तुम्हें तो याद होगा शूजा ने मुझसे शादी तो ज़बरदस्ती की थी. इसलिए मैं कभी उसे बीवी का दर्जा दे नहीं पाया लेकिन दिलबर मेरा बेटा है. मेरी अकेली औलाद और उसे मैंने सालो से नहीं देखा. मेरे दिमाग में उसकी वह तस्वीर है जब वह दो साल का था. उसे मेरी क्या याद होगी मैं नहीं जानता. यार शूजा ने मेरे साथ जो ज़ुल्म किया है उसका हिसाब नहीं हो सकता. पता नहीं वह कहाँ है, शायद सिडनी में है. दिलबर अब आठ साल का हो गया होगा. क्या वह अपनी माँ से यह न पूछता होगा कि मेरे डैडी कौन हैं? कहाँ हैं? कैसे हैं? पता नहीं शूजा उसे क्या बताती होगी. अब तो यही उम्मीद है कि दिलबर कुछ और बड़ा होकर मेरी तलाश में हिन्दुस्तान आएगा तो शायद मुझे ढूँढ़ निकाले. उसके पास सबसे बड़ा सुराग़ है उसका 'बर्थ सर्टीफिकेट’. उसी के सहारे वह मुझ तक पहुँच सकता है. लेकिन यार तब तक क्या मैं ज़िन्दा रहूँगा? अब सोचता हूँ कि शकील से कहूँ- ''होम मिनिस्टर के लिए शूजा और दिलवर का पता लगाना मुश्किल न होगा.’’
अहमद का ई-मेल पढ़ने के बाद मैं सो नहीं सका. कुछ पढ़ने की कोशिश की तो पढ़ न सका. करवटें बदलता रहा फिर धीरे से उठा और अपने कमरे से निकलकर अनु के कमरे में चला आया. हम दोनों अपने कमरे के दरवाज़े खुले रखते हैं. अनु के कमरे में टेबुल लैम्प जल रहा था. किताब मेज़ पर खुली पड़ी थी. उसके चेहरे पर आधी रोशनी पड़ रही थी. बाल रोशनी में चमक रहे थे. वह बेखबर सो रही थी. मैं खड़ा उसे देखता रहा. मैं उसके साथ अपना दुख बाँटने आया था. मैं आया था कि उसे वह सब पता सकूं जो अहमद ने मुझे लिखा था. लेकिन मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि उसे जगा दूँ. मैं खड़ा उसे देखता रहा. बच्चों जैसा भोला और मासूम चेहरा. छोटी सी पतली नाक और चमकता छोटा-सा हीरा. मुझे लगा कि उसे जगाए बिना ही उससे मेरी बातचीत हो रही है. मेरे अन्दर जो तनाव था वह कम हो रहा है. मैं आगे बढ़ा लैम्प ऑफ किया और कमरे से बाहर निकल गया.
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उपन्यासः धरा अंकुराई
लेखक: असगर वजाहत
विधाः उपन्यास
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
मूल्यः रुपए 495/
पृष्ठ संख्या: 208