इक बार फिर से मिट्टी की सूरत करो मुझे
इज़्ज़त के साथ दुनिया से रुखसत करो मुझे... शायरी की दुनिया के सदर मुनव्वर राना ज़िंदगी की जंग हार गए. उनका जाना किसी पेड़ के पत्ते के झरने और फिर न उगने की तरह है. अपनी शायरी से एक पूरे ज़माने को मुतास्सिर करने वाले मुनव्वर साहब अब दूसरे सफ़र की ओर बढ़ चले हैं. एक ऐसा सफ़र जहां न अस्पताल है और ना ही मुशायरा का मंच. लंबे काले जुब्बे को अपनी पहचान बनाने वाले राना के साये में न जाने कितने ही शायरों की शायरी ने सांसे लीं.
उनकी शायरी ने एक तरफ बुजुर्गों की हिमायत की तो वहीं दूसरी तरफ नई नस्लों को मोहब्बत के अदब सिखाए. मुशायरों में अपनी तबीयत पर खुलकर बात करने वाले मुनव्वर अपनी बीमारियों पर बेबाकी से शेर कहने का हुनर रखते थे और उस दर्द को सामईन की वाह वाही से छिपा लेने की कला उनसे बेहतर किसी में न थी.
थकन को ओढ़ के बिस्तर में जा के लेट गए
हम अपनी क़ब्र ए मुकर्रर में जा के लेट गए...
जैसे शेर लिखकर शायद वे अपनी मौत को खुदा से मांगते हुए कहते हैं-
ऐसे उडूं कि जाल न आए खुदा करे
रस्ते में अस्पताल न आए खुदा करे...
यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि मुनव्वर साहब के होने के क्या मायने थे. उनके होने से शायरी की दुनिया क्यों मुनव्वर थी. शायरी पढ़ते हुए रो देना, सीना पीट कर शेर कहना, उनकी शायरी की तासीर को दिखाता है. किसी ने सही कहा कि 'एक शायर का रोना, इक ज़माने के रोने जैसा है...' ये बात मुनव्वर राना को देखने से ज़ाहिर होती है. न जाने कितने ही बार उन्हें सुनकर लोगों ने अपने आसूं बहाए और अपने उठते हुए रोंगटे को हाथों से रगड़ कर बैठा दिया.
ज़माना उनकी मां पर लिखी गई शायरी पर जान छिड़कता है. 'उदास रहने को अच्छा नहीं बताता है, कोई भी जहर को मीठा नहीं बताता है. कल अपने आपको देखा था मां की आंखों में, ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है...' मां और मां के प्रेम के लिए ऐसे अनगिनत शेर लिखकर उर्दू शायरी का रूख बदल देने वाले अजीम अजीम शायर मुनव्वर राना का दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ. उन्होंने 71 वर्ष की उम्र में लखनऊ के पीजीआई में अंतिम सांस ली.
मुनव्वर साहब लंबे समय से बीमार चल रहे थे और गले के कैंसर से पीड़ित थे. सामान्य तौर पर उर्दू गजल इश्किया इजहार के लिए जानी जाती है, लेकिन मुनव्वर ने 'मां' और अन्य रिश्तों पर बेहतरीन ग़ज़ल लिखी और उसे आम लोगों के बीच मशहूर कर दिया. उर्दू शायरी में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है.
मां पर बहुतों ने काफ़ी कुछ लिखा मगर मुनव्वर राना का नाम इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है. मां को अपना महबूब बना कर उन्होंने कहा-
अभी ज़िंदा है मां मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है
***
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
मां बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
***
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में मां आई
***
आखिर ऐसी शायरी कौन लिख सकता है? इन शायरी को लिखने के लिए शायर से कहीं बढ़कर एक सच्ची औलाद होना ज़रूरी है और राना साहब ने अपनी मां की मोहब्बत में जो लिखा वो आज हम सबकी ज़ुबान पर है.
"वो मुझे छोड़कर यूं आगे बढ़ा जाता है, जैसे अब मेरा सफर खत्म हुआ जाता है." मशहूर शायर मुनव्वर राना के निधन पर प्रोफेसर वसीम बरेलवी की यह पहली प्रतिक्रिया थी. बरेलवी साहब ने कहा कि मुनव्वर के साथ दर्जनों बार मंच साझा किया. वो देर से मंच पर आए मगर, अमिट छाप छोड़ी. उनके जाने से उर्दू-साहित्य का बड़ा नुकसान हुआ है. मुनव्वर राना के निधन से उर्दू और हिंदी गजल और शायरी में रूचि रखने वालों में शोक की लहर है और सोशल मीडिया पर उन्हें याद करने का क्रम जारी है.
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, 'तो अब इस गांव से रिश्ता हमारा खत्म होता है, फिर आंखें खोल ली जाएं कि सपना खत्म होता है. देश के जानेमाने शायर मुनव्वर राना जी का निधन अत्यंत हृदय विदारक. दिवंगत आत्मा की शांति की कामना. भावभीनी श्रद्धांजलि.'
यह यों ही नहीं है कि मुनव्वर साहब के न होने से उर्दू शायरी की दुनिया बहुत उदास है. कवि कुमार विश्वास ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'मुनव्वर राना नहीं रहे. उनके जीवन के आख़री दशक में उनसे गंभीर मतभेद रहे. किंतु कवि-सम्मेलनीय यात्रा के शुरुआती दौर में मंचों पर उनके साथ काफ़ी वक्त बीता. उन तमाम यादों के साथ उन्हें श्रद्धांजलि सहित ईश्वर से प्रार्थना कि उनके परिजनों को शक्ति प्रदान करे. ऊं शांति ऊं.'
कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने एक्स पर लिखा, 'जिस्म पर मिट्टी मलेंगे पाक हो जायेंगे हम, ऐ ज़मीं एक दिन तेरी खुराक हो जायेंगे हम. अलविदा मुनव्वर साहब, आपका जाना अदबी दुनिया का बड़ा नुकसान है. मैं भारत जोड़ो न्याय यात्रा में हूं और इस खबर ने अंदर तक दुखी कर दिया है. इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन.'
सोशल मीडिया पर मुनव्वर राना को चाहने वाले उनके एक प्रशंसक ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देते हुए लिखा कि 'तुम्हें भी नींद सी आने लगी है, थक गए हम भी; चलो हम आज ये क़िस्सा अधूरा छोड़ देते हैं.'
मुनव्वर राना अपनी लेखनी में हिंदी और अवधी शब्दों का प्रयोग किया करते थे और फारसी और अरबी से परहेज करते थे. यह उनकी शायरी को भारतीयों के लिए सुलभ बनाता था और गैर-उर्दू इलाकों में आयोजित कवि सम्मेलनों में उनकी लोकप्रियता को बढ़ाता था.
उर्दू के इस अजीम शायर मुनव्वर राना का जन्म 26 नवंबर, 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में हुआ था हुआ था, लेकिन उन्होंने अपना ज्यादातर जीवन कोलकाता में बिताया. आखिरी सालों में वे लखनऊ आ गए थे. वे अपनी शायरी में अवधी और हिंदी शब्दों का प्रयोग प्रमुखता से करते थे. यही कारण है कि उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ती चली गई.
मुनव्वर राना अपने बेबाक बोल के लिए भी जाने जाते रहे हैं. उनकी एक रचना 'शाहदाबा' के लिए उन्हें 2014 में उर्दू भाषा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इससे पहले 2012 में उर्दू साहित्य में सेवाओं के लिए उन्हें शहीद शोध संस्थान की ओर से माटी रतन सम्मान से सम्मानित किया गया था.
मेरी मुठ्ठी से ये बालू सरक जाने को कहती है
कि अब ये ज़िंदगी मुझसे भी थक जाने को कहती है
उनका जाना एक सदी के ख़त्म होने जैसा है. सियासत, मुफ्लिसी, और ज़िंदगी को अपने कलम की जादू में समेटने वाले मुनव्वर राना को नम आंखों से खिराज-ए-अकीदत.
# साहित्य तक की ओर से यह श्रद्धांजलि लेख जुनैद क़ादरी ने लिखा है.