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लोक परंपरा और स्त्री पहचान का अद्भुत संगम है जयश्री बर्मन की कला

मां, मातृत्व और परंपरा के स्त्रीपक्ष को लेकर देश की जानी-मानी कलाकार जयश्री बर्मन (Jayasri Burman) ने कैनवस पर कूची से कमाल किया है. जयश्री के चित्रों में सम्मोहन भी है और स्पंदन भी.

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देश की जानी-मानी कलाकार जयश्री बर्मन. देश की जानी-मानी कलाकार जयश्री बर्मन.
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कला जगत के जाने माने नामों में से एक हैं जयश्री बर्मन
  • जयश्री के चित्र और मूर्तियां आपको लगातार चौंका सकते हैं

अतीत के पन्नों को पलटें तो तकरीबन 40 साल पहले तक का चित्रकथा संसार जिन छवियों के ज़रिए भारत की लोककथाओं, सांस्कृतिक संदर्भों, परीकथाओं और धार्मिक दृष्टांतों को रचता दिखाता आया है, वो अब समय के साथ प्रचलन और प्रकाशन से बाहर हो चुकी हैं. लेकिन जयश्री बर्मन के काम को देखते हैं तो ऐसा लगता है कि आधुनिक होती सच्चाइयों में चित्रकारी की वो पुरानी शैली अभी भी ज़िंदा है और लगातार पनप रही है.

इसका यह मतलब नहीं कि जयश्री बर्मन का कला संसार एक परिपाटी को आगे खींचता कोई रथ है. जयश्री अपनी कला से अतीत का वर्तमान से सामना कराती हैं. वो सोच के घोड़ों को खोलकर आगे जाने देती हैं लेकिन पीछे बनते कदमों के निशान अकेले नहीं खड़े हैं, उनमें परंपरा, संस्कृति और स्त्रीत्व का बोध है.

भारत के कलाजगत में कुछ चुनिंदा जाने माने नामों में से एक हैं जयश्री बर्मन. जयश्री की कलाकृतियों को देखते समय जो एक चीज़ दिमाग में बैठती है वो है विविधता और विस्तार. जयश्री के चित्र और मूर्तियां आपको लगातार चौंका सकते हैं. जबतक आप जयश्री के बारे में एक धारणा बनाते हैं, वो उसे खोलकर आपको आगे एक नए विस्तार के मुहाने पर खड़ा कर देती हैं.

जयश्री की नई कलाकृतियां

हाल ही में दिल्ली के बीकानेर हाउस में जयश्री बर्मन के चित्रों और मूर्तिकला की एकल प्रदर्शनी आयोजित की गई. कोरोना के समय में लंबे समय से कलादीर्घाओं को देखने के लिए तरस गए कलाप्रेमियों के लिए यह एक शानदार प्रस्तुति थी. जयश्री के छोटे-बड़े और कुछ विशाल चित्र लोगों को अपनी ओर खींचते हुए नज़र आए. चित्रों के अलावा जयश्री ने अपनी मूर्तिकला को भी इस प्रदर्शनी का हिस्सा बनाया था. कांसे, फाइबर की इस विशाल मूर्तियों को किसी इमारत के अंदर नहीं ले जाया जा सकता था. गैलरी के बाहर खुली जगह में खड़ी ये मूर्तियां लोगों के बीच आकर्षण और चर्चा का विषय बनीं.

जयश्री की कलाकृतियों में जो एक चीज स्थायी है वो है मातृपक्ष. स्त्री की दृष्टि से स्त्रियों के संसार को देखती-दिखाती हैं जयश्री. उनकी पेंटिंग्स हों या मूर्तियां, महिला हर सृजन के मूल में खड़ी दिखती है. वो हारी हुई महिला से ज़्यादा उस महिला को सामने लाती नज़र आती हैं जिन्होंने कथा संसार से लेकर आजतक की दुनिया को गढ़ा और संवारा है.

इस चित्रों में नारी के बाद दूसरी बड़ी विशेषता है गति. चित्रों में एक लय है, एक गति है. कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है. लगातार चलता हुआ. बहता हुआ. नदियां जयश्री को आकर्षित करती हैं. लेकिन नदियां केवल पानी के बहते श्रोत नहीं हैं, वो मां हैं जो सींचती है, जीवन देती है, सृजन करती है. जिसके किनारों पर दुनिया पैदा होती है और पोषित होती है.

नदियों की सप्तधाराओं से लेकर मकर पर बैठी गंगा या कच्छप पर आसन्न यमुना, कमलासनी या सिंहासनी देवियां, अन्नदात्री या माया, कितने ही भाव और बिंब हैं जो आपको परंपरा और संस्कृति की अनंत कथागंगा में लेकर चली जाती है. पुरुष है तो पुत्र की तरह, ग्राही की तरह, सहजीवी की तरह. जयश्री का स्त्रीपक्ष बहुत मजबूत है, विशाल है और ऐसा लगता है कि जयश्री के चित्र महिलाओं को छोटा आंकने के सभी तर्कों को ध्वस्त करते हुए सबसे शक्तिशाली पहचान को सृष्टि के केंद्र में स्थापित करती हैं और वो पहचान है- मां.

जयश्री नदी की तरह अपनी कला में सबकुछ समेटे चलती हैं. रंगों के विविध प्रयोग हैं. रंगों के चयन में भी पारंपरिक प्रभाव दिखता है. लाल, नीला, हरा, पीला और सुनहरा जैसे रंग उनकी कृतियों को संवारते हैं. ऐसा लगता है जैसे जयश्री खुद नदी की धारा में बहती एक दृष्टा हैं जो चित्रों में ठीक वैसे ही दिखाना-उतारना चाहती हैं, जैसा कि हम देख पाते हैं. इसीलिए लाल जहां मातृसत्ता की शक्ति का संवाहक बनता है तो वहीं नीला रंग नदियों और जल के प्रतीक को मजबूती से रखता है.

पहचान और प्रभाव

जयश्री अपनी कृतियों में इस प्रभाव को स्वीकार करती हैं. वो बताती हैं कि चित्रों को उकेरने से पहले वो कोई तैयारी नहीं करतीं. एक छोटा सा कैनवस उठता है और फिर विचारों की यात्रा उसमें रंग भरती चली जाती है. फिर एक बड़ा कैनवस सामने होता है और विचारों की यही यात्रा विशालता में बदल जाती है.

जयश्री के पति, परेश मइती भी देश और दुनिया में स्थापित कलाकार हैं. उनके चित्र और मूर्तियां दुनियाभर में ख्याति अर्जित कर चुके हैं. परेश के काम को देखने पर नाव, बड़ी इमारतें और खेवनहार दिखते हैं. यही वो बात है जहां दोनों के कलाकर्म में उनकी व्यक्तिगत पहचान को भी देखा जा सकता है. परेश के काम में एक पुरुष है जो नाव लेकर यात्रा पर निकलना चाहता है, जीतना चाहता है, पाना चाहता है. जयश्री नाव नहीं, नदी से चिपकी हुई हैं. वो समेटे रहना चाहती हैं. संजोना चाहती हैं, संभालना चाहती हैं. शायद यही कारण है कि प्रयोगों के मामले में जयश्री का काम अपने पति की तुलना में थोड़ा संकोची है क्योंकि कितनी भी दूरी तक जाने की कोशिश करती जयश्री पीछे के किसी भी छोर को, परंपरा को और बिंबों को छोड़ना नहीं चाहती हैं.

जयश्री बताती हैं, पति का कलाकार होना कभी चुनौती नहीं रहा. न इससे कोई प्रतिस्पर्धा वाला भाव आया. एक दूसरे को हम साहस देते आगे बढ़ते रहे हैं. दोनों को अपना और एक-दूसरे का काम पसंद है. लेकिन इस सब के बावजूद दोनों ने अपनी-अपनी पहचान को कहीं भी कमज़ोर नहीं पड़ने दिया है. और यही दोनों के काम को विशेष और अलग बनाता है.

जयश्री पिछले 12 वर्षों से इन चित्रों और मूर्तियों पर काम कर रही थीं. तो क्या कोविड की वजह से काम में और दिक्कतें आईं, जयश्री बताती हैं- ऐसा नहीं है. कोविड ने एक दबाव बनाया और अनुशासन दिया. वरना मेरी यात्रा तो शायद और आगे जारी रहती और इस कलेक्शन को पूरा करने में शायद और वक्त लगता.

निःसंदेह, जयश्री की ये कृतियां कैनवस पर कमाल करती नज़र आती हैं. बहुत बड़े में भी बहुत महीन, बहुत छोटे में भी बहुत विशाल और बहुत गहरे में भी बहुत सारा जीवन... ऐसे संजोयन के लिए जयश्री का यह काम यादगार साबित होगा.

 

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