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जन्मतिथि पर विशेषः उजाले की इबारत और 81 के अशोक वाजपेयी

रचना और आलोचना की लंबी पारी खेलने वाले अशोक वाजपेयी ने कविता को जीवन और मनुष्यता की रागात्मकता से जोड़ा है. उनके जन्मदिन पर 'थोड़ा-सा उजाला' पर चर्चा के बहाने उनके लेखन और कवि दृष्‍टि पर एक नज़र

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'थोड़ा-सा उजाला' का आवरण और अशोक वाजपेयी 'थोड़ा-सा उजाला' का आवरण और अशोक वाजपेयी

अशोक वाजपेयी आज 16 जनवरी, 2022 को अपने जीवन के इक्यासी वर्ष पूरा कर रहे हैं, और कल से बयासीवें वर्ष में प्रवेश कर जाएंगे. रचना और आलोचना की लंबी पारी खेलने वाले अशोक वाजपेयी ने कविता को जीवन और मनुष्यता की रागात्मकता से जोड़ा तो कला-संगीत और साहित्य को एक दूसरे के निकट लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हाल ही में आए उनके पद्य और गद्य संग्रह 'थोड़ा-सा उजाला' पर चर्चा के बहाने उनके लेखन और कवि दृष्‍टि पर विचार कर रहे हैं हिंदी के सुधी कवि समालोचक डॉ ओम निश्चल 
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अंधेरा और उजाला प्राय: दोनों कवियों को लुभाते रहे हैं. हर कवि प्राय: यही कहता पाया जाता है कि यह अंधेरे का समय है, मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' जैसे हिंदी कवियों के लिए एक कसौटी बन गयी अपने समय को देखने और रचने की. आर्थिक संकटों और बीमारियों से जुझते हुए भी मुक्तिबोध ने कविता में हमेशा अपने समय को उकेरा. साठ के आसपास का वह युग कोई बहुत समुज्ज्वल न था. आजादी मिले दो दशक ही हुए थे. लेकिन आजादी के इस उजाले को लेकर कवियों ने कितने रूपक बुने. वे आजादी की फलश्रुति से संतुष्ट न थे. लिहाजा कवियों का एक बड़ा वर्ग उस मोहभंग का गवाह बना जिसके बड़े कवियों में मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, कैलाश वाजपेयी, राजकमल चौधरी और धूमिल थे. अशोक वाजपेयी की एक कवि के रूप में उठान उन्हीं दिनों की है पर उनमें तब के 'अंधेरे से' कोई ज्यादा याराना न था. वे एक सुखी जीवन के कवि थे जब 'शहर अब भी संभावना है' की कविताएं रच रहे थे. एक लंबे अरसे तक वे प्रेम, श्रृंगार, विरह, अवसान और पारिवारिकता की कविताएं रचते रहे. इसमें संशय नहीं कि आज भी वे जब कि एक दर्जन से ज्‍यादा संग्रहों के कवि हैं, हजार से ज्यादा कविताएं लिख चुके हैं किन्तु अधिकांश में वे अपनी एक अलग मुद्रा अख्तियार करने वाले कवि हैं. जिस तरह का विक्षोभ मुक्तिबोध में अपने समय के पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से था, आजादी की व्यर्थता से धूमिल का सरोकार था, लोकतंत्र के प्रहसन से लोहियावादी रघुवीर सहाय का सरोकार था, व्यवस्था के भीतर के राजनीतिक नरक से सरोकार मगध के कवि श्रीकांत वर्मा का था, विश्वव्यापी मूल्यहीनता और विक्षुब्धता से सरोकार कैलाश वाजपेयी की कविताओं का था या अभी ही जिस तरह उजेले-अंधेरे जैसे बिम्बों से मलय की कविताओं का सरोकार है- उससे अलग रचते रहने के बावजूद अशोक वाजपेयी आज प्रासंगिक कवि बने हुए हैं, तो इसके पीछे आज की उनकी कविताओं का अपने समय के सम्मुख होना भी है तथा उस सांप्रदायिकता को बराबर निशाने पर लेते रहना है जो राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के वशीभूत राजनीतिज्ञों की आंख पर पट्टी की तरह बंधी हुई है. 

हिंदी कविता अपने समय से प्रारंभ से ही बहुत आक्रांत रही है. जिस आपातकाल की कोख से कई तेजस्वी कवि पैदा हुए- दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों को ही देख लें, उस आपातकाल की ज्यादतियों को अशोक वाजपेयी का कवि नजरंदाज करके चलता है, कवि धर्म के रूप में जब कि चाहिए था कि अभिव्यक्ति के संकटों पर लगातार बोलने वाला यह कवि आपातकाल पर बोलता पर कारण जो भी रहे हों अशोक वाजपेयी गैर राजनीतिक कविता की अपनी जानी पहचानी सरणि पर चलते रहे हैं. पर हिंदी कविता में अपने समय की छाया लगातार पड़ती रही है और समय की छाया के आलोक में ही हम कवियों की प्रासंगिकता को तौलते हैं. आपातकाल, संपूर्णक्रांति, आर्थिक सुधार, भूमंडलीकरण, साम्राज्यवाद, पूंजीवाद इत्यादि वे कारक हैं जो कविता की रीढ़ में सदैव रोमांच पैदा करते रहे हैं. 

गए लगभग डेढ़ दशकों से अशोक वाजपेयी ने कविता में विरोध और असहमति का मोर्चा संभाला है जब उन्होंने गुजरात त्रासदी को लेकर कुछ कविताएं लिखीं. तब से उनकी मुखरता को लक्षित किया जाने लगा पर ऐसे एकाधिक प्रसंगों के बावजूद इससे पहले तक वे प्रतिरोध और अहसमति के कवि नहीं थे. उत्तर जीवन में आकर और सांप्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध एक कवि और सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में उनका प्रतिरोध लगातार मुखर होता रहा है. सत्याग्रह वेब पोर्टल पर उनकी टिप्पणियां इस बात की गवाही देती हैं. साथ ही इधर के उनके संग्रहों 'कहीं कोई दरवाजा', 'कम से कम' और अब 'थोड़ा-सा उजाला' उनके ऐसे संग्रहों में हैं जिनमें अपने समय को लेकर उनकी कुछ सख्त और संवेदनशील तहरीरें पढ़ी जा सकती हैं. 

वे प्रारंभ से ही मुक्तिबोध का महत्त्व पहचानते थे. रुग्ण मुक्तिबोध की शय्या के पास खड़े श्रीकांत वर्मा और उनकी तस्वीर सदैव इस बात से आश्वस्त करती है कि उन युवा दिनों में भी कविता के अप्रतिहत रथी के अवदान से वे अभिभूत थे. वे जिन दिनों 'अंधेरे में' जैसी कविताएं नहीं लिख रहे थे, तो भी वे अपने समय की लिखी जा रही कविता से गहरे प्रतिकृत थे. 'फिलहाल' की उनकी आलोचना कविता में पैदा होने वाले तत्‍कालीन उबाल को मूल्यांकित कर रही थी तो अपने अन्य आलोचनात्मक उपक्रमों 'कुछ पूर्वग्रह' व पिछले कुछ साल पहले आए 'कविता के तीन दरवाजे' इत्यादि में वे कविता की गंभीर आवाजों को सहेज रहे थे. कविता की तीन बड़ी विभूतियों मुक्तिबोध, शमशेर और अज्ञेय के महत्त्व और उनके कवित्व पर जिस तरह के विश्लेषणों के साथ वे सामने आते हैं, वह उनके भीतर के शुद्ध आलोचक के अंत:करण का परिचायक है. 

ऐसे सतत कविता प्रेमी और अब कविता को शुद्ध कविता के गलियारे से निकाल कर अपने बौद्धिक अंत:करण की इकाई के रूप में बदलने वाले अशोक वाजपेयी की हाल ही में आई पुस्तक 'थोड़ा सा उजाला' उनके मुखर और व्यवस्था विरोधी कवि और बुद्धिजीवी होने का प्रमाण देती है. कोई कवि सदैव उजाले का ही गान करे यह जरूरी नहीं है. कम से कम अशोक वाजपेयी के लिए तो यह कहा ही जा सकता है कि घोर अंधेरे में भी उन्होंने प्रेम, आसक्ति, पारिवारिकता और उम्मीद का गान किया है. उनकी कविताओं में; बल्कि देखा जाय तो उजाले के बिम्‍ब ज्यादा मिलेंगे बनिस्बत अंधेरे के. पर वे जैसे अपने वक्त का उजाला लिखने में कुशल रहे हैं वैसे ही अपने समय का अंधेरा लिखने में. यह संग्रह उस समय आया है जब कोरोना के नौ माह लगभग निष्क्रिय और एकांत के अंधेरे से भरे रहे हैं. इस अवधि में लोगों के बीच सामाजिक दूरियों का प्रचार भी इतना किया गया है उसने हम सबको असामाजिक सा बना दिया है. शारीरिक दूरी कायम रखने के बजाय सामाजिक दूरी के शोरोगुल ने आदमी-आदमी के बीच खाईं पैदा की है. कैलाश वाजपेयी होते तो कम से कम अपनी ये पंक्तियां जरूर दुहराते: 
किसी भी अंकुर का मुरझाना
सार्वजनिक शोक है
जो आदमी आदमी के बीच खाईं हों
ऐसे सब ग्रंथ अश्लील कहे जाऍं. ( महास्‍वप्‍न का मध्‍यांतर)
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राजनीतिक सांप्रदायिक समय में कवि
ऐसे अश्लीलता भरे समय में जब आजादी के अमृत महोत्सव की दुंदुभि मच रही है, काशी की रंगशाला में रोशनियां जगमग हैं. न मरे हुओं का शोक है न डरे और बचे हुओं का कोई शाश्वत उपचार. लिहाजा एक तरह की राजनीतिक निर्लज्जता हर तरफ पसरी है. एक कवि ऐसे में 'अंधेरे में' जैसी कविताएं न लिखे तो क्या करे. वह सत्ता की उत्सवता के पीछे का आर्तनाद सुनता है बल्कि वही सुन पाता है कि इस दुंदुभि में कैसी-कैसी आवाजें अनसुनी की जा रही हैं और इस उत्सवता पर प्रश्नचिह्न लगाने वाला संशय के घेरे में होता है. कोरोना के एकांत में कवियों की सक्रियता अपनी तरह से रही है; इधर अनेक संग्रह आए हैं, अनेक बन रहे हैं. स्वातंत्र्योत्तर व साठोत्तर की तरह ही अब कोरोनोत्तर जैसे पद एक विभाजक रेखा की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं. इस कोरोनोत्तर दौर की कविताओं और टिप्पणियों में अशोक वाजपेयी की कविताएं भी शुमार की जाएंगी इसमें संदेह नहीं. 

इस अंधेरे समय में जब उजाले का सबसे ज्यादा गान हो रहा है -आस्था और भक्ति के कांधे पर अभी भी जड़ीभूत आसक्ति सिर टिकाए हुए है, अशोक वाजपेयी की ये कविताएं इस संकट को अपनी तरह से मूर्त करती हैं. उनकी कविता के दो अंश . 
नि:शब्द प्रार्थनाओं की चिथड़ा हो गयी चिन्दियां 
फहरा रही हैं -
दहलीज़ पर इतिहास 
भुला दी गयीं घिसी चप्पलों सा रखा हुआ है
कोई पुरखा पुकारता है : 
आंगन में कोई सिसकता है मुँह अँधेरे. 
             (समय एक ढहता हुआ मंदिर है, पृष्ठ 52)

भाषा में, पड़ोस में 
भय बैठ गया है 
देवता नहीं आएंगे
पर क्या हम, फिर भी 
कविता से अभय की उम्मीद कर सकते हैं?
               (कहां गए देवता!) 

इस संग्रह का आवरण अंधेरे से आच्‍छादित लगता है- इस समय की ही निराशा को व्यंजित करता हुआ. यानी आवरण लगभग काला. यानी एक तरह से यह अपने समय की अश्वेत चेतना को पहचानने का जतन हो जैसे. इस संग्रह के पूर्ववर्ती भाग में कविताएं हैं और पश्चावर्ती भाग में उनके विचार जो 'सत्याग्रह' पर प्रकाशित हुए थे. कितने विक्षोभ से भर कर वे कहते हैं -

हम अपना समय नही लिख पाएंगे
यह ठहरा हुआ निर्जन समय 
जिसमें पक्षी और चिड़ियां तक चुप हैं
जिसमें रोजमर्रा की आवाज़ नहीं, सिर्फ गूंज भर है. (पृष्ठ 13)

यह कोरोना का चुप्पियों भरा समय है जिसे अशोक वाजपेयी दर्ज कर रहे हैं. कोरोना पर आए अनेक संग्रहों संकलनों में इस समय को कवियों ने ऐसा ही कुछ व्यंजित किया है. सारी गतियां अवरुद्ध हैं, सारा समय जैसे विलंबित है. प्रकृति उत्फुल्ल दिख रही है पर मनुष्य  चेतना जैसे मुरझा रही है. फूल ऐसे बिहँस रहे हैं जैसे वे हमारे कुसमय पर हँस रहे हों, गिलहरियां मुँह चिढ़ा रही हों. यह नाउम्मीदी का समय हो जैसे कि जैसे कवि अपना समय नहीं लिख पा रहा है. यह वही कवि है जो कम से कम में उम्मीद का गान लिख रहा था. पर वह कोरोना से पहले का वक्त था. अंधेरा तो था पर इतना घना न था. वह राजनीतिक अंधेरा था, यह कोरोना और महामारी का अंधेरा है. वह चाहता है पृथ्वी का मंगल हो. वह कविता के सूने गलियारों में पुकार रहा है, गा रहा है, सिसक रहा है- पृथ्वी का मंगल हो, पृथ्वी पर मंगल हो. वह मंगल मंगल कहता हुआ भी परम संशयी लगता है. कवि होता ही है परम संशयी. संशयग्रस्त न हो तो कवि ही न हो. तभी तो वह पूछता है --
कहां रखती है पृथ्वी अपनी स्वस्तिकामनाएं 
कहां छुपाती है अपने विलाप?
कहां छोड़ देती है अपनी हँसी?
कहां आकाशगंगाओं के तुमुल में
खोजती है अपना मंगल? (पृष्ठ. 15)

अशोक वाजपेयी कवि के प्रतिरोध के लिए प्रतीकों की शरण में जाते हैं. जैसे आठवें दशक की कविता एक वक्त प्रतीकों से खेल रही थी. पेड़, बच्चे, नदी, तानाशाह, शासक सब प्रतीकों में व्य्क्त हो रहे थे. 'वे आ सकते हैं' ऐसे ही प्रतीकों का आश्रय लेती हुई कविता है जिसमें वे कहते हैं-

वे कभी भी आ सकते हैं
मुस्टंड, भयावने
लाठी भॉंजते हुए भक्ति की 
बुलंद आवाज़ में तहकीकात करने. 
...तुम्हारी भाषा गटर के काबिल है- कह कर 

वे तुम्हें गटर में ढकेल कर चले जाएंगे
वे आ सकते हैं- कभी भी. (पृष्ठ 28)

पर वाजपेयी अंधेरे की शिनाख्त- करते हुए वे उजाले की पगडंडियां भूल नहीं जाते. उजाले की प्रार्थनाएं भूल नहीं जाते. वे ऐसा करते रहे हैं. 'कहीं कोई दरवाजा', 'कम से कम' के साथ इस संग्रह में भी उजाले का पराग झरता दिखाई देता है. कवि इस बात से वाकिफ है कि वे उजाले को छेंक रहे हैं, उसे चकाचौंध में बदलने की कोशिश कर रहे हैं, उस पर अंधेरे का कानून लगा रहे हैं, पर इससे उजाले की हत्या नहीं हो सकती. वह इस बात से आश्वस्त है कि 

मेरे दिये में एक रोशन हाथ की तरह 
लौ उठ रही है-
उसी की रोशनी में कविता चुपचाप उजाले की इबारत लिख रही है (पृष्ठ 49)

पिछले दिनों नागरिकता को लेकर खासा बहसें चलीं. कवि को किसी जाति धर्म और नागरिकता से भला क्या लेना देना. वह तो अपने को पूरे विश्व की आवाजाही का कवि मानता है. इसे लेकर हिंदुस्तान में लंबे आंदोलन चले. सरकार की इस मुहिम का विरोध भी किया गया कि कोई सदियों से रह रहा व्यक्ति अपने होने का प्रमाण क्योंकर दे जब कि सरकार के पास उसके होने के सारे प्रमाण हैं. इसे लेकर युवा कवि सौम्य मालवीय जैसे अनेक कवियों ने कविताएं लिखीं. इस प्रश्न पर अशोक वाजपेयी ने भी लिखा. अब वह समय नहीं रहा में इस बात पर कवि का क्षोभ दिखता है. खास तौर पर अपने आदमी होने की व्यर्थता पर भी. कवि के ही शब्दों में-
मेरा आदमी होना, मेरी भाषा, मेरी कविता
कुछ भी साक्ष्य नहीं है मेरे होने का 
था एक बड़ा कवि जो कभी अपने आदमी से ऊब गया था
दूर चिली में 
मैं तो अपने देश में ही आदमी होने से वंचित किया जा रहा हूँ (पृष्ठ 71)

अशोक वाजपेयी ने यहां कबीर के कुछ पदों को लेकर कविताएं लिखी हैं- 
यहि घट चंदा, यहि घट सूर, 
मेरी काया में गुलज़ार और हंसा करो पुरातन बात.
ऐसा वे पहले भी 'कहीं कोई दरवाजा' की कई कविताओं में कर चुके हैं. यह एक तरह से कवि परंपरा का आवाहन भी है. वह अंतत: कविता से अभय की उम्मीद मांगता है क्योंकि कविता कवि की निर्भयता का ही प्रतीक है. तभी तो कोई कवि कह पाता है : निरभय निरगुन गाऊँगा . 
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असहमति और अवज्ञा की वैचारिकी
थोड़ा-सा उजाला- अशोक वाजपेयी की प्रतिक्रियाओं और विचारों का आलेखन भी है. वे सार्वजनिक प्लेटफार्म से जो कुछ कहते रहे हैं, उसमें हमारे समय की आभा को पढ़ा गुना जाता रहा है. हम जानते हैं कि वे कांग्रेसी सत्ता के नजदीकियों में रहे हैं. इसलिस कांग्रेस की गलतियों से बचते बचाते रहे हैं. आपातकाल पर उनका मौन कइयों को कचोटता रहा है. उन पर कम्युनिस्टों द्वारा बहुतेरे बौद्धिक आक्रमण हुए और होते रहे हैं, जिसके प्रत्युत्तर में वे भी साम्यवादियों को भला बुरा कहते रहे हैं पर जब असहिष्णुता की मुहिम चली तो सारे साम्यवादी उनके झंडे तले आए. आज भी सच कहें तो अशोक वाजपेयी की कविता से कम्युनिस्टों का खास लेना देना नहीं है. सरकार व व्यवस्था के खिलाफ उनकी मुखरता उन्हें रास अवश्य आती है क्योंकि राजनीति में कम्युनिस्टों का पराभव भले हुआ हो, वे बौद्धिकता के स्तर पर पढ़ाकू रहे हैं और इसलिए लेखन की मुख्यधारा की कमान आज भी वामपंथियों के हाथ ही समझी जाती है.  

मार्च 2020 से अक्तूबर 2020 के दौरान की गयी इन टिप्पणियों में कोरोना के विवश एकांत, भाषा, कविता, मूल्य, साहित्य  की राजनीति, कविता की उलझन, अंत:करण का गणतंत्र, कला, हिंदुत्व, पितृसत्तात्मकता और हिंदुत्व, आधुनिकता और हिंसा, वैचारिक ईमानदारी और गांधी चर्चा के साथ-साथ अनेक राजनीतिक मुद्दों पर उन्होंने लिखा है. लेकिन ये आलेख पेशेवर राजनीतिक के लेख नहीं हैं, भाषा, साहित्य और कविता-कला में रमे जमे बौद्धिक व्यक्ति के लेख हैं सो वक्त जरूरत इन आलेखों में एक वैचारिक छौंक भी दिखती है. इन लगभग पचास साठ टिप्पणियों में कुछ को बतौर उदाहरण हम देख सकते हैं. 

'वे कोरोना के एकांत में मल्लिकार्जुन मंसूर को सुन रहे हैं. ऐसा लगता है कि एकांत ही गा रहा है. उन्हें लगता है यह विस्मय और रहस्य की दो धाराओं के बीच निश्‍छल पर कलकल बहते हुए अविराम संकीर्तन की तरह है. कोरोना के इस विवश एकांत में वे अनसुन हाहाकार और धवल शांति का एक वितान तना हुआ देखते महसूसते हैं. वे सूसन सौण्टैग की जीवनी पढ़ते हुए उनके निजी जीवन के रोमांच, नये नये संबंधों, प्रेम और रति से उनके अनुभवों से गुजरते हैं. एक स्वतंत्र उदार और मित्रबहुल जीवन जीने वाली बौद्धिक इकाई की तरह वे मानती रहीं कि साहित्य और कलाओं आदि का बुनियादी काम हमें अधिक देखना, अधिक सुनना और अधिक महसूस करना सिखाना है.' 

एक नोट में वे ईराकी अमेरिकी कवि दुन्या मिखाइल की एक कविता अनूदित करते हैं जिन्हें 1995 में अमन और सेंसरशिप से तंग आकर स्वदेश छोड़ना पड़ा था. उनकी काव्यकृति 'इन हर फेमिनाइन साइन' से वे एक कविता उद्धृत करते हैं जिसका एक अंश खासा विचारोत्तेजक और संवेदनशील है -

हम विचलित नहीं होते जब 
घास मरती है. हमें पता है
वह वापस आयेगी 
एक ऋतु या दूसरी में. 
मृतक वापस नहीं आते
पर वे हमेशा प्रकट होते हैं
घास की हरीतिमा में. 

इन टिप्पणियों में वे बार-बार हमारे समय में क्षीण हो रही आलोचना की ताकत की बात उठाते हैं जो लगातार सत्तामुखी बनती जा रही है, उससे प्रश्नाकुलता का साहस छिनता जा रहा है. वे कहते हैं, 'दुर्भाग्य से आलोचना ने भी इसमें जो भूमिका निभाई है वह वैचारिक प्रश्नाकुलता की नहीं, साहित्य के सत्ता प्रतिष्ठानों के पृष्ठ पोषण की रही है.' सदियों से सनातन और सहिष्णु माने जाने वाले 'हिंदू और हिंदुत्व' को लेकर वे इस बात से चिंतित दिखते हैं कि इस हिंदुत्व में कोई 'अन्य' आकार ले रहा है जो इन दिनों संगठित, आक्रामक और सक्रिय होकर लोकतंत्र पर छा गया है. वे यह शक जताते हैं कि शायद बहुसंख्यक हिंदू भयातुर है और इसीलिए चुप है. वे हिंदुत्व के दायरे में स्त्री-विमर्श को इस तर्क के आईने में विचारते हैं कि क्या पितृसत्तात्मक हिंदुत्व स्त्री के अधिकारों और उसकी स्वतंत्र सत्ता और साहसिक तर्क को लेकर संकीर्ण है. क्योंकि स्त्रियां इसी पितृसत्तात्मक हिंदुत्व की पौरुषेय सत्ता को चुनौती दे रही हैं. पितृसत्ता की जड़ीभूत बर्फ कैसे पिघले यह न केवल स्त्रियों की चिंता है बल्कि उस बौद्धिक समाज की भी जो स्त्रियों को एक स्‍वतंत्र इकाई मानने पर बल देती है. 

बहरहाल, अशोक वाजपेयी ने एक कवि के रूप में अब अपने जिस कवि धर्म का निर्वाह कर रहे हैं, वे गाहे ब गाहे आलोचना का विषय भी बनते रहे हैं. लोग आज भी उन्हें कांग्रेस पक्षधर चिंतक के रूप में देखते हैं, यद्यपि उनकी सोच का दायरा किसी दलीय प्रतिबद्धता की कसौटी पर नहीं आंका जा सकता. देखना यह होता है कि कोई कवि अपने जीवन आचरण से कला, सभ्यता, साहित्य और जीवन मूल्यों को क्या कुछ नया और स्वीकार्य देता है जो समाज हित और अंतत: लोकहित में हो. अशोक वाजपेयी की इन कविताओं और टिप्पणियों को लोकमंगल और समाजहित की इसी कसौटी पर देखा जाना चाहिए. 
साहित्य आजतक की ओर से जन्मदिन की शुभकामनाएं.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

 

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