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गांधी जयंती विशेषः उदास महात्मा ने जब माउंटबेटन से कहा था- पर मैं विभाजन कब चाहता था?

विश्व में जहां महात्मा गांधी के विचार उत्तरोत्तर सम्मान पा रहे हैं, वहीं राष्ट्रपिता के रूप में समादृत इस महानतम शख्सियत के चरित्र और फैसलों पर कई अधकचरे लोग सवाल उठाते हैं.

महात्मा गांधी [फाइल फोटो ] महात्मा गांधी [फाइल फोटो ]

वह जनता के बीच उन्हीं के जैसे होकर भी सबसे अलग और महान थे. मन, वचन और कर्म से इतने एक कि कोई उन्हें महात्मा कहता, तो कोई बापू. गांधी तो वह थे ही. एक ऐसी महान आत्मा, जिनके सत्य, अहिंसा से पूर्ण विचारों के समक्ष समूची दुनिया उनके जीवनकाल में भी अभिभूत थी- और आज भी नतमस्तक है. वह दुनिया में उपनिवेशवाद के खात्मे के सबसे बड़े योद्धा थे, और वह भी केवल एक लाठीधारी. लाठी, जो किसी पर चलती नहीं थी, बल्कि उन्हें सहारा देती थी.

विश्व में जहां महात्मा गांधी के विचार उत्तरोत्तर सम्मान पा रहे हैं, वहीं राष्ट्रपिता के रूप में समादृत इस महानतम शख्सियत के चरित्र और फैसलों पर कई अधकचरे लोग सवाल उठाते हैं. सोशल मीडिया पर बापू के खिलाफ बाकायदा अभियान चलाकर लगातार उनके चरित्र हनन की कोशिशें की जाती हैं. फर्जी चित्र पोस्ट किए जाते हैं, कभी उन्हें मुसलमानों का हितैषी बताया जाता है, तो कभी कुछ का कुछ कहा जाता है. कई बार तो इतिहास से अपढ़, कुपढ़ पीढ़ी को यह बताया जाता है कि बापू देश विभाजन के भी जिम्मेदार थे. ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं कि तथ्य वह नहीं है, जो वे बता रहे. महात्मा का जीवन एक खुली किताब था और उनके कालखंड पर दस्तावेजों की भरमार है.

आज 2 अक्टूबर को, महात्मा गांधी की जयंती पर हम वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राज खन्ना की पुस्तक 'आजादी से पहले, आजादी के बाद' का वह अंश आपके सामने रख रहे हैं, जो यह बताती है कि भारत विभाजन लार्ड माउंटबेटन सहित उन भारतीय नेताओं की अधीरता का नतीजा थी, जिन्हें जल्द से जल्द आजादी चाहिए थी. भले ही ऐसा करने के पीछे उनके दिमाग में अंग्रेजों की तरह कोई कूटनीतिक साजिश न होकर सदियों से गुलाम देश को आजाद कराने की हड़बड़ी भर थी, पर जो भी था, देश बंटा और महात्मा गांधी इससे आखिरी सांस तक दुखी थे. न केवल हिंदू कट्टरपंथी, बल्कि मुसलिम कट्टरपंथियों की आंख की किरकिरी बन जाने वाले बापू, अपनों से ही छले गए थे, और इसके लिए केवल जिन्ना, लियाकत अली, माउंटबेटन ही नहीं, पंडित नेहरू और सरदार पटेल भी जिम्मेदार थे. अफसोस की इतिहास के इस सच की तरफ आज कोई ध्यान नहीं देना चाहता, न ही जानना चाहता है, न ही चर्चा करना चाहता है. न ही सत्तारूढ़ दल न ही विपक्ष. जो लोग बंटवारे के बाद सिंध,पंजाब से पलायन कर आए, वे आखिरी सांस तक गांधी जी से नाराज रहे और कुछ तो नफरत करने की यह खेप अपनी आज की पीढ़ी को भी दे गए. पर तथ्य क्या था, पढ़िए इस अंश मेंः

विभाजन और गांधीजी

गांधीजी बैठक में नहीं थे. पर कार्यवाही में छाए हुए थे. देश की किस्मत का फैसला लिया जा चुका था. अब फिक्र इस फैसले पर गांधीजी की प्रतिक्रिया की थी. वाइसराय माउंटबेटन चिंतित थे. गांधीजी खिलाफ गए, तो हालात काबू के बाहर चले जाएंगे. तीन जून, 1947. देश के विभाजन को भारतीय नेताओं की औपचारिक मंजूरी का दिन. बैठक में माउंटबेटन के साथ सरदार पटेल, पंडित नेहरू, आचार्य कृपलानी, मोहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली खान और सरदार बलदेव सिंह मौजूद थे. विभाजन, उसकी प्रक्रिया और अंग्रेजों की वापसी की सार्वजनिक घोषणा इस बैठक के जरिए होनी थी. बैठक में फिर से बहस-मुबाहसा शुरू न हो जाए, इसका माउंटबेटन ने पहले ही पुख्ता इंतजाम किया था. एक दिन पहले वे इन नेताओं से बैठक कर चुके थे. अगले दिन की जाने वाली घोषणा की मंजूरी वे ले चुके थे. जिन्ना फिर भी टालमटोल कर रहे थे. उन्होंने आखिरी मंजूरी के लिए फैसले को मुस्लिम लीग की नेशनल काउंसिल के सामने रखने का पेंच फंसाया. जिन्ना को 'कटा-बंटा दीमक लगा' पाकिस्तान कुबूल करने में हिचक थी. माउंटबेटन ने तकरीबन धमकाने वाले अंदाज में उन्हें सिर्फ रात भर का वक्त दिया. ताकीद की, बैठक में मेरी घोषणा पर आप सिर्फ स्वीकृति में सिर हिलाएंगे.
तीन जून की बैठक की कार्यवाही के आगे कुछ अंश हैं...

माउंटबेटन: यदि अतीत भुलाया जा सके तो बेहतर भविष्य के निर्माण की शुरुआत मुमकिन है. इसके लिए नीचे के नेताओं को आरोप-प्रत्यारोप से रोका जाए, क्योंकि उससे हिंसा हो सकती है.

लियाकत अली खान: निचले नेताओं को रोका जा सकता है, लेकिन जो सबसे बड़े हैं, जैसे गांधीजी, वे बात तो अहिंसा की करते हैं, लेकिन उनकी प्रार्थना सभाओं के कई भाषण हिंसा को उकसाने वाले हैं.

माउंटबेटन: कल उनसे भेंट के दौरान मैंने उन्हें उनके जिन सुझावों को माना जा सकता था और जिन्हें नहीं तो क्यों, इसकी जानकारी दी. वह व्यक्ति जो भारत की एकता के लिए जिया, काम किया और कामना की, उसके मनोभावों को मैं समझ सकता हूं. उनकी प्रार्थना सभाओं के भाषणों की मैंने बात की. उनका मौन दिवस था. उन्होंने लिखकर एक मैत्रीपूर्ण नोट दिया. उम्मीद की जाती है, वे परिस्थितियों को समझते हुए सहयोग करेंगे. वे हमेशा साफ करते रहे हैं कि वे कांग्रेस के चवन्नी के भी सदस्य नहीं हैं.

कृपलानी: मैं लियाकत अली की शिकायत पर चकित हूं. गांधीजी ने जो भी और जब भी कहा अहिंसा के पक्ष में कहा. कांग्रेस के सभी सदस्यों ने हमेशा संयुक्त भारत के विचार को माना. गांधीजी की गतिविधियां हमेशा अहिंसक रहीं.

माउंटबेटन: मैं सहमत हूं, लेकिन यह तब, जब उनके भाषणों का सावधानी से विश्लेषण किया जाए. लेकिन निश्चय ही, खासतौर से कम समझ वालों की भावनाओं को तब उकसावा मिलता है, जब वे कहते हैं, विभाजन गलत है. हमें इसे रोकना चाहिए. हमें हार नहीं माननी है.

सरदार पटेल: उन्हें भरोसा है कि एक बार जब निर्णय ले लिया जाएगा तो गांधीजी उसे स्वीकार करेंगे.

माउंटबेटन: वे आश्वस्त हैं. निर्णय जो भी हो, महात्मा गांधी अहिंसा पर बल देंगे.

लियाकत अली खान: हाल में गांधी ने जिन शब्दों का प्रयोग किया, उसका अर्थ निकलता है कि वे (जनता) वाइसराय और नेताओं के निर्णय की ओर ध्यान न दें. इसके स्थान पर वे जो उचित समझें, उसे करें. ऐसे बयानों का मतलब यही निकलता है कि जनता अगर चाहती है कि विभाजन न हो तो वह अपने मुताबिक आगे बढ़े.

सरदार पटेल: मैं नहीं समझता कि ऐसा कोई निष्कर्ष निकलता है.

जिन्ना: अगर गांधी इस लाइन पर आगे बढ़ेंगे तो यह संदेश जाएगा कि जनता वह निर्णय न माने जो इस बैठक में लिया जाए. वे यह नहीं मानते कि गांधी के इरादे खराब हैं, लेकिन इन दिनों उनकी भाषा ऐसी भावनाओं को बढ़ा रही है कि मुस्लिम लीग ताकत के जोर पर पाकिस्तान हासिल करने जा रही है, जबकि खुद उन्होंने (जिन्ना ने) उनकी (गांधी की) सार्वजनिक रूप में आलोचना से परहेज किया है.

माउंटबेटन: इस विषय पर पर्याप्त विचार कर लिया गया. वे गांधी का विशेष स्थान स्वीकार करते हैं. लेकिन निश्चित है कि कांग्रेस के नेता इस विषय को देखेंगे और अपने सर्वोत्तम प्रयास करेंगे.

पुस्तक 'आजादी से पहले, आजादी के बाद'

उन दिनों अपनी प्रार्थना सभाओं में गांधीजी प्राय: दोहराते थे, 'भले सारे देश में आग भड़क उठे, हम एक इंच भूमि पर भी पाकिस्तान नहीं बनने देंगे.' कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा विभाजन की मंजूरी देने के बाद गांधीजी गहरी वेदना में थे. उन्हें लगातार महसूस हो रहा था कि कांग्रेस के नेता उनसे दूर होते जा रहे हैं. ऐसी ही एक सुबह एक कार्यकर्ता ने उनसे कहा, 'फैसले की इस घड़ी में आपका कहीं जिक्र ही नहीं है.' उनका जवाब था, 'मेरे चित्र को हार पहनाने के लिए हर कोई उत्सुक रहता है. लेकिन सलाह मानने को कोई तैयार नहीं है.' दिल्ली की हरिजन बस्ती में निवास कर रहे गांधी को बगल की चटाई पर लेटी मनु ने एक रात अपने में ही उन्हें बुदबुदाते सुना, 'आज मेरे साथ कोई नहीं है. पटेल और नेहरू तक समझते हैं कि जो मैं कह रहा हूं, वह गलत है और अगर बंटवारे की बात पर समझौता हो जाए तो शांति रहेगी. ये लोग सोचते हैं कि उम्र के साथ मेरी समझ-बूझ भी कम होती जा रही है. हां, शायद सब लोग ठीक ही कहते हों और मैं ही अंधेरे में भटक रहा हूं.'

बेशक गांधी खुद को अकेला महसूस कर रहे हों. पर माउंटबेटन को आम आदमी पर उनकी पकड़ का अहसास था. माउंटबेटन को लगा, 'जिन्ना ने भारत की एकता की आशाओं पर पानी फेर दिया. कहीं गांधी विभाजन की योजना पर पानी न फेर दें.' कांग्रेस का कोई पदाधिकारी न होने के कारण गांधी ने माउंटबेटन की अन्य नेताओं के साथ बैठक में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया था. माउंटबेटन ने उन्हें अलग से मिलने को राजी किया. दो जून, 1947. वह सोमवार का दिन था. गांधीजी के मौन का दिन. माउंटबेटन ने उन्हें विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की पूरी योजना की जानकारी दी. गांधीजी ने जेब से पुराने लिफाफे निकाले और उसके सादे हिस्से पर लिखना शुरू किया, 'मुझे खेद है, मैं बोल नहीं सकता. सोमवार का व्रत दो हालत में भंग करने की मैंने गुंजाइश रखी थी. किसी उच्च पदाधिकारी से किसी समस्या के बारे में बात करनी हो या किसी बीमार की देखभाल करनी हो. लेकिन मैं जानता हूं कि आप नहीं चाहते कि मैं अपना मौन भंग करूं. मुझे दो-एक बातों के बारे में कुछ कहना है, लेकिन आज नहीं. हम दोनों की फिर भेंट हुई तो कहूंगा.'

तीन जून, 1947 की बैठक के फैसलों की जानकारी माउंटबेटन के रेडियो पर भाषण के जरिए सार्वजनिक हुई. उस दिन रेडियो पर पंडित नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और सरदार बलदेव सिंह भी बोले. नेहरू ने भाषण की शुरुआत, 'मुझे कोई प्रसन्नता नहीं है, से की. उन लाखों लोगों के लिए जो बेघर हो गए. हजारों जो जानें गईं और तमाम महिलाओं की मौत से भी बदतर यातनाओं के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते नेहरू उदास थे. वादा किया उनके कष्टों में मदद का. भरोसा दिलाया ऐसी त्रासदी फिर न दोहराए जाने का. उनका बुझा लहजा उनके चेहरे और दिल का हाल बयान कर रहा था, 'मुझे कतई प्रसन्नता नहीं है कि इन प्रस्तावों की सराहना करूं. लेकिन मुझे संदेह नहीं है कि यही सही रास्ता है. पीढ़ियों से हम आजाद संयुक्त भारत के लिए संघर्ष कर रहे थे. उसके कुछ हिस्से यदि अलग होंगे तो यह निर्णय स्वीकार करना हम किसी के लिए भी दु:खद होगा. लेकिन फिर भी मैं संतुष्ट हूं कि व्यापक दृष्टि से यह निर्णय सही है.'

उधर जिन्ना उत्साह से लबरेज थे. उन्होंने खुशी जाहिर की कि रेडियो के शक्तिशाली माध्यम से वे सीधे अपने लोगों से पहली बार मुखातिब हैं. हालांकि इस मौके पर भी उस उर्दू भाषा में नहीं बोल पाए, जो आगे पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बनी. उनका संबोधन अंग्रेजी में था. जीत की खुशी के बीच वे कहना नहीं भूले कि निर्णय से हम पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं. अब हमें इस पर विचार करना है कि अंग्रेज सरकार के इस प्रस्ताव को हम समझौते या फिर मामले के निपटारे के रूप में स्वीकार करें. उन्होंने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए मुसलमानों के हर तबके की मदद, तकलीफों और कुर्बानियों को याद किया.

गांधीजी की निराश प्रतिक्रिया थी, 'ईश्वर उनकी रक्षा करे. उन्हें सद्बुद्धि दे.' लेकिन माउंटबेटन का ध्यान अब भी गांधीजी की ओर था. उन्हें खबर मिली कि गांधी कांग्रेस नेताओं से खुद को अलग करके अपनी प्रार्थना सभा में विभाजन की योजना की निंदा करने वाले हैं. फौरन ही माउंटबेटन के दूत गांधीजी के पास पहुंचे. चार जून को माउंटबेटन और गांधीजी फिर आमने-सामने थे. माउंटबेटन ने अपनी पूरी क्षमता के साथ गांधीजी की भावनाओं को थपकियां दी. कहा, 'इसे माउंटबेटन योजना गलत कहा जा रहा है. इसे तो गांधी योजना कहा जाना चाहिए.' गांधीजी की सवालिया निगाहों की ओर देखते माउंटबेटन ने कहा, 'आप ही ने तो कहा था कि फैसला हिंदुस्तानियों पर छोड़ दीजिए. हर प्रांत की जनता वोट देकर तय करेगी कि किसके साथ रहना है? यह आपकी कही बात तो है.'

'पर मैं विभाजन कब चाहता था', गांधीजी ने पूछा.

माउंटबेटन ने कहा, 'अगर कोई ऐसा चमत्कार हो जाए कि विधानसभाएं एकता के पक्ष में वोट दे दें तो विभाजन रुक जाएगा.' और फिर माउंटबेटन के अगले वाक्य ने गांधीजी के लिए कुछ कहने को नहीं बाकी रखा, 'अगर इसके लिए वे सहमत नहीं हैं तो आप यह तो नहीं चाहेंगे कि हथियार के जोर पर हम उनके निर्णय का विरोध करें.'

गांधीजी की प्रार्थना सभा का वक्त हो गया था. वे उठे. हरिजन बस्ती के लिए, जहां लोग उनकी ललकार सुनने की आस लगाए थे. कितनी ही बार उन्होंने कहा था, 'देश के दो टुकड़े होने के पहले उनके दो टुकड़े होंगे.' शाम स्तब्ध करने वाली खामोशी के बीच लोगों ने गांधीजी को सुना, 'वायसराय को दोष देने से कोई फायदा नहीं. अपने आपको देखिए. मन को टटोलिए. तब पता लगेगा. जो हुआ है, उसका कारण क्या है?'

माउंटबेटन के मुताबिक हिंदुस्तान आने के बाद से उन्होंने कांग्रेस के नेताओं को लगातार अपने नजदीक लाने की कोशिश की. ताकि अगर टकराव की नौबत आए तो उनकी मदद से गांधी को बेअसर कर दूं. वर्षों बाद माउंटबेटन ने कहा, 'मुझे बहुत अजीब लगा कि एक तरह वे सभी गांधी के खिलाफ और मेरे साथ थे. एक तरह से वे मुझे बढ़ावा दे रहे थे कि मैं उनकी ओर से गांधी का सामना करूं.'

#वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राज खन्ना की पुस्तक 'आजादी से पहले, आजादी के बाद' के विभाजन और गांधीजी अध्याय का अंश उनकी अनुमति से प्रस्तुत किया गया है. पुस्तक के प्रकाशन प्रतीक बुक्स हैं और हार्ड बाउंड संस्करण का मूल्य है 500 रुपए.

 

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