उन्होंने 'कूल' की नई परिभाषा गढ़ ली है, क्योंकि सिगरेट का सुट्टा कूल नहीं रह गया है. लेकिन लगता है, अब हुक्का बारों पर गाज गिरने की बारी है. 2 अक्तूबर, 2008 से सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर पाबंदी के बाद महानगरों और टीयर-3 यानी छोटे शहरों में हुक्का बारों की बाढ़ आ गई थी.
4 जनवरी 2012: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
मगर एक के बाद एक राज्य सरकारें सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (प्रतिबंध) कानून, 2003 के तहत इन पर रोक लगा रही हैं, ताकि किशोर-किशोरियों को हुक्के या शीशे और इसके जरिए इस्तेमाल किए जाने वाले दूसरे प्रतिबंधित पदार्थों के सेवन से रोका जा सके. हुक्का बारों की विदाई की शुरुआत हुई बंगलुरू से जहां मार्च, 2011 में इन पर रोक लगा दी गई. इसके बाद अक्तूबर में महाराष्ट्र और फिर दिसंबर में राजस्थान, हरियाणा और पंजाब ने हुक्का बारों पर पाबंदी लगा दी.
28 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
इन प्रतिबंधों के बावजूद हुक्का या शीशा बार शहरी नौजवानों के पसंदीदा अड्डे बने हुए हैं. दिल्ली के साकेत इलाके में बने जूक कैफे में बैठी 19 वर्षीया मृदुला शर्मा कहती हैं, ''मैं पुराने जमाने के बोरिंग कॉफी शॉप्स में जाने की बजाए यहां आना पसंद करती हूं.'' नोएडा के काफिया लाउंज में धुएं के छल्ले बनाते 18 वर्षीय राघव रस्तोगी कहते हैं, ''देखिए, मामला सिर्फ मदहोश करने वाली फ्लेवर्स या मधुर गुड़गुड़ाहट का नहीं है. हुक्के की यह बात मुझे सबसे प्यारी है कि यह पूरी तरह और बेजा बरबाद होने का एहसास कराता है.''
हुक्का पीने वाले इसके खतरों को लेकर अनजान और बेपरवाह रहते हैं. वे अक्सर इस गफलत में जीते हैं कि सिगरेट के मुकाबले यह कम नुकसानदेह है.
21 दिसम्बर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला मोहित शर्मा कहता है, ''मैं सिगरेट नहीं पीता लेकिन हुक्का पीता हूं क्योंकि मुझे लगता है कि यह कम नुकसान करता है.''
मोहित ने अपने माता-पिता से छुपाकर घर में हुक्का रखा है. 15 साल की रीमा छाबड़ा बताती है कि उसके पिता हुक्के के खिलाफ हैं लेकिन वह उनकी परवाह नहीं करती. वह कहती है, ''अगर हुक्का पीना इतनी खराब चीज होती तो मेरे दोस्त इसे क्यों पीते.''
14 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
नोएडा का 17 वर्षीय छात्र सिद्धार्थ वर्मा कहता है, ''मुझे लगता है कि पिछली पीढ़ी के लिए सिगरेट पीने का जो मतलब था, वह हमारे लिए हुक्के का है.''
गहरे कश वाले हुक्के का एक दौर करीब घंटा भर का होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का 2005 का एक अध्ययन बताता है कि ऐसे एक दौर में फेफड़ों में पहुंचने वाला धुआं 100 सिगरेटों के बराबर होता है. हुक्के में तंबाकू को जलाने के लिए इस्तेमाल होने वाला कोयला भी बड़ी मात्रा में कार्बन-मोनोऑक्साइड, धात्विक तत्व और कैंसरकारी रसायन पैदा करता है.
07 दिसंबर 2011: तस्वीरों में देखें इंडिया टुडे
डब्ल्यूएचओ की सलाह के मुताबिक, 'क्के को बार-बार पीने से इसकी लत लग जाती है. यह बात उस आम धारणा के खिलाफ है, जिसके मुताबिक बहुत थोड़ी निकोटिन होने के कारण हुक्का ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाता. डब्ल्यूएचओ की सलाह साफ कहती है कि हुक्का पीना किसी भी मायने में सिगरेट का सुरक्षित विकल्प नहीं है.
पुणे के पॉपुलर हुक्का कैफे स्काई गैराज के मालिक अमित रखोलिया मानते हैं कि 'क्के की लत लग सकती है. वे कहते हैं, ''नब्बे फीसदी हुक्केबाज इसे रोज पीते हैं.''
हुक्का पीने वालों को इससे दूर करने में कानूनी पाबंदियों का खास असर नहीं हुआ है. कइयों ने अपने घर में हुक्का रख लिया. 25 वर्षीय साहिल चौधरी ने बंगलुरू में हुक्का बार पर पाबंदी लग जाने के बाद यही किया. वे बताते हैं, ''मैंने तय किया, भाड़ में जाओ! मैंने घर में ही हुक्का रखा है ताकि जब मन हो इसे गुड़गुड़ा लूं.''
पीवीआर साकेत में सिगरेट की एक दुकान के मालिक मनीश कुमार कहते हैं, ''ढाई सौ रु. में कोई लड़का आसानी से हुक्का खरीद सकता है. फ्लेवर्ड तंबाकू का महीने भर का खर्चा सिर्फ 300 रु. पड़ता है. बच्चे अक्सर गु्रप में आते हैं और धौंसपट्टी दिखाकर हमसे तंबाकू खरीद लेते हैं.''
दिल्ली और नोएडा जैसे शहरों में भी जहां हुक्का बारों पर प्रतिबंध नहीं है, कई किशोर अपने घर में हुक्का रखते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी की 24 वर्षीया ग्रेजुएट नूपुर सरीन हुक्का खरीदकर लाईं और अब वे रोज बड़े प्यार से इसे तैयार करती और पीती हैं.
वे मानती हैं, ''हुक्का बार पर पाबंदी लगाने से कोई फायदा नहीं होने वाला. हम बीड़ी-सिगरेट की किसी भी आम दुकान से इसे आसानी से खरीद सकते हैं.'' 34 साल के दिल्लीवासी मिहिर श्रीवास्तव कहते हैं, ''यह सस्ता और सुविधाजनक भी है. मैं जब चां, पसंदीदा खुशबू वाला हुक्का पी सकता हूं.''
पहले-पहल हुक्का बार 2005 में चंडीगढ़ में खुला. मिस्टर बीन नाम के इस हुक्का बार को लोगों ने हाथोहाथ लिया. लेकिन 'क्के को शोहरत मिली मोचा कैफे चेन से, जिन्हें अरब लाउंज जैसी भव्यता प्रदान की गई थी. अक्तूबर, 2008 में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर लगी कानूनी पाबंदी के बाद हुक्का लाउंज तेजी से फलने-फूलने लगे. जैसे ही विश्वविद्यालयों को स्मोक-फ्री बनाया गया, सिगरेट एकाएक 'अनुकूल' बन गई...बुझ चुकी पिछली पीढ़ी का प्रतीक. इसकी जगह आया निर्दोष दिखाई पड़ने वाला हुक्का और इसकी फलों जैसी खुशबू और जीभ मरोड़ देने वाले इनके नाम, जैसे-टेंग ट्रिक, प्ले 20 और ट्रेल.
दिल्ली यूनिवर्सिटी की 18 वर्षीया छात्रा शिवानी रायजादा के शब्दों में, ''हुक्का शाही और ठसके वाला है. इसे पीने से होंठ काले नहीं पड़ते, त्वचा को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता और न ही आपकी सांसें गंदी होती हैं.''
हुक्का बारों तक आसान पहुंच ने भी इनकी लोकप्रियता बढ़ाई. हल्की रोशनी के बीच आरामदेह कोनों वाली भड़कीले रंग की गद्दियों के साथ तसल्ली से पसरने की पर्याप्त जगह के सामने सख्त कुर्सियों और कोहनियों को गालों से टिकाने भर की छूट देने वाली टेबलों से ठुंसे परंपरागत रेस्तरां कहां टिकने वाले थे. साथ में तरुणाई भरा जोशीला संगीत, जिसमें टेक्नो लाउंज का दबदबा रहता है.
26 वर्षीय डिजाइनर चेतन शास्त्री के मुताबिक, ''मुझे हुक्का जॉइंट्स में कॉफी बारों की औपचारिक छटा के उलट हर चीज में जैसे तसल्ली दिखाई देती है.''
दिल्ली के मनोचिकित्सक अवधेश शर्मा बताते हैं, ''हुक्का परोसने वाली ज्यादातर जगहें नौजवानों के रुझान की हैं और वहां का माहौल बेहद तसल्लीबख्श रखा जाता है. लोग वहां बस मजे के लिए भी घंटों बैठे रह सकते हैं.''
जहां तक 'क्के के फ्लेवर्स का सवाल है, इस मामले में संभावनाएं अंतहीन हैं-फलों से लेकर मसालों तक. एक फ्लेवर के लिए 500 रु. तक चुकाने पड़ सकते हैं. दो खुशबुओं की कीमत 500 से 750 रु. तक. जेब जितनी ढीली करेंगे उतनी ही मदहोश करने वाली फ्लेवर मिलेगी. हुक्के में पानी की जगह शराब भी भरी जा सकती है और दिमाग के तार झ्नझ्नाने को तंबाकू में चरस का छिड़काव भी किया जा सकता है. हुक्का बार और लाउंज प्राइवेट पार्टियों को भी अपनी सेवाएं देते हैं. हालांकि 'क्के की मांग हमेशा ऊंची बनी रहती है लेकिन बार की असली कमाई खासकर भोजन की बिक्री से होती है.
बारों पर सरकारी पाबंदी पर्याप्त नहीं है. सरकार को चाहिए कि वह ऐसी सुविधाएं देने वाली छोटी-छोटी जगहों को बंद कराए. इसके अलावा इस आदत से छुटकारा दिलाने के लिए हुक्के के दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता पैदा करने वाले प्रयासों को बढ़ावा दे.
सेहत में सेंधः हुक्का किसी भी मायने में सिगरेट से कम खतरनाक नहीं.
भ्रमः हुक्के का पानी धुएं में मौजूद नुकसानदेह तत्वों को छान लेता है.
सचः पानी से धुएं के गुजरकर आने के बावजूद तंबाकू के कैंसरकारी रसायन छन नहीं पाते.
भ्रमः हुक्के की लत नहीं लगती, क्योंकि इसमें निकोटिन नहीं के बराबर है.
सचः शीशे में इस्तेमाल किए जाने वाले तंबाकू में निकोटिन होता है. 60 मिनट तक हुक्का पीने से 100 सिगरेट पीने जितना जहर शरीर में पहुंचता है.
भ्रमः सामान्य शीशे की जगह हर्बल शीशा पीना कम नुकसानदेह है.
सचः हर्बल शीशा पीने वाले के भीतर ज्यादा टार और कैंसरकारी रसायन उड़ेलता है.
भ्रमः तंबाकू के शीरे या शहद में डूबे रहने और फलों के साथ मिले होने से हुक्का कम नुकसान करता है.
सचः इसके बावजूद तंबाकू के कैंसरकारी रसायन और निकोटिन घटते नहीं हैं.
तलब की खुशबूः हुक्के को ग्लैमरस बनाने के लिए उसके फ्लेवर्स को अनोखे नाम दिए जाते हैं.
ब्रेन फ्रीजः पीने वाले को ठंडक भरा एहसास देने के लिए तंबाकू में मिलाया जाता है मिंट का अतिरिक्त फ्लेवर.
ट्रेजर ट्रेलः मीठे-कसैले स्वाद के लिए तंबाकू में मिलाए जाने वाले फलों का फ्लेवर.
रॉयल ट्रीटमेंटः कश्मीरी सेब जैसे फ्लेवर वाला तंबाकू.
समर ऑफ 69: ठंडे और गर्म असर के लिए दो फ्लेवरों का मिश्रण.
सेक्स ऑन द बीचः रंगीन मिजाज मूड के लिए आडू या संतरे के फ्लेवर वाला तंबाकू.
साथ में अदिति पै, प्राची रेगे और ओलिना बनर्जी