जानवरों के बच्चे पैदा होते हैं तो वो कुछ समय बाद अपने पैरों पर चलना तक शुरू कर देते हैं. उनको इतनी अधिक देखभाल की जरूरत नहीं होती है. लेकिन जब इंसानों के बच्चे जन्म के समय काफी ज्यादा नाजुक होते हैं और उनको काफी केयर की भी जरूरत होती है. इंसानी बच्चे जन्म के समय इतने असहाय क्यों होते हैं कि वे खुद सिर तक नहीं संभाल पाते, चलना-फिरना तो दूर की बात है?
यह सवाल लंबे समय से वैज्ञानिकों को उलझाता रहा है. जहां कई जानवर जन्म के कुछ ही घंटों में खड़े हो जाते हैं, लेकिन इंसानी बच्चे महीनों तक पूरी तरह देखभाल पर भी निर्भर रहते हैं. आमतौर पर लोग सोचते हैं कि इंसानी बच्चे इसलिए इतने असहाय पैदा होते हैं क्योंकि उनका दिमाग बड़ा होता है और मां के कूल्हे पतले होते हैं. इसलिए बच्चे को पेट में पूरी तरह विकसित होने का समय नहीं मिल पाता और उसे पहले ही जन्म लेना पड़ता है. लेकिन नई रिसर्च बताती है कि असली वजह इससे कहीं अधिक है.
हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख (यूज़ेडएच) के रिसर्चर डॉ. मार्टिन हाउस्लर और उनकी टीम ने कई दशकों के जन्म से जुड़े आंकड़ों और बॉडी स्ट्रक्चर के डेटा पर स्टडी की. Biological Reviews of the Cambridge Philosophical Society में पब्लिश हुई स्टडी में सामने आया है कि इंसानी बच्चे की असहायता को आप बड़े दिमाग और छोटे पेल्विस से नहीं समझ सकते हैं. क्योंकि यह शरीर की बनावट, मां की एनर्जी लिमिट और भ्रूण की वृद्धि जैसी चीजों का मिला-जुला रिजल्ट है.
स्टडी के मुताबिक, डिलीवरी के समय मां के पेल्विस का साइज और बच्चे के सिर का साइज बहुत ही मामूली अंतर से बैलेंस रहते हैं. जन्म नलिका के अंदर बच्चे के मुड़ते-घूमते हुए बाहर आना पड़ता है, जिससे प्रोसेस और मुश्किल हो जाता है. हल्का सा बदलाव भी डिलीवरी को रिस्की बना सकता है.
जन्म के समय बच्चा अपने वयस्क दिमाग का लगभग 30 प्रतिशत ही विकसित कर पाते हैं, जबकि चिंपैंजी के बच्चे करीब 40 प्रतिशत तक विकसित होते हैं. अगर इंसान के बच्चे ज्यादा समय के लिए गर्भ में रहें तो उनका सिर बड़ा हो जाएगा. अगर शिशु का सिर बड़ा हो जाता है तो डिलीवरी मुश्किल हो सकती है, इसलिए दिमाग का बड़ा हिस्सा जन्म के बाद विकसित होता है.
प्रेग्नेंसी के आखिरी महीनों में मां के शरीर की लगभग पूरी एनर्जी का इस्तेमाल हो चुका होता है. स्टडी बताती है कि अगर गर्भ एक महीना और बढ़ जाए, तो कई महिलाओं के लिए इतनी एनर्जी जुटाना मुश्किल हो सकता है. यानी बच्चे के जन्म का समय सिर्फ शरीर की हड्डियों की बनावट से नहीं, बल्कि मां की एनर्जी से भी जुड़ा होता है.
वैज्ञानिक इंसानों को सेकेंडरी अल्ट्रिशियल कहते हैं, यानी ऐसे जीव जो जन्म के समय काफी निर्भर होते हैं. यही वजह है कि इंसानी बच्चे लंबे समय तक देखभाल चाहते हैं. यह लंबा बचपन उन्हें सीखने, बोलने और सोशल स्किल्स को डिवेलप करने में मदद करता है. इस तरह, न्यूबॉर्न की असहायता एक कमी नहीं, बल्कि बॉडी स्ट्रक्चर, एनर्जी लिमिट और ब्रेन ग्रोथ के बीच बैलेंस का रिजल्ट है.