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Surrogacy Law In India: भारत में सरोगेसी को लेकर क्या है विवाद, किराए पर कोख लेना क्यों हुआ मुश्किल?

सरोगेसी पर देश में बने सख्त कानूनों ने इसे पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण और विवादित बना दिया है. पिछले साल दिसंबर में ही सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल, 2021 राज्यसभा में पारित किया गया था. इससे पहले बिल लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा द्वारा गठित चयन समिति को भेजा गया था.

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भारत में सरोगेसी को लेकर क्या है विवाद, किराए पर कोख लेना क्यों हुआ मुश्किल? (Photo: Getty Images) भारत में सरोगेसी को लेकर क्या है विवाद, किराए पर कोख लेना क्यों हुआ मुश्किल? (Photo: Getty Images)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कई भारतीय हस्तियों ने बच्चे की चाह में सरोगेसी को अपनाया
  • भारत में नए कानूनों ने सरोगेसी को बनाया मुश्किल

बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा सरोगेसी के जरिए मां बनी हैं. बीते कुछ सालों में बॉलीवुड की तमाम बड़ी हस्तियों ने बच्चे की चाह में सरोगेसी का रास्ता अपनाया है, लेकिन भारत में अब इसकी प्रक्रिया आसान नहीं रह गई है. सरोगेसी पर देश में बने सख्त कानून ने इसे पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण और विवादित बना दिया है. पिछले साल दिसंबर में ही सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल, 2021 राज्यसभा में पारित किया गया था. इससे पहले बिल लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा द्वारा गठित चयन समिति के पास भेजा गया था.

क्यों लाया गया सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल?
सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल को राज्यसभा में पेश करते हुए केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया ने सरोगेट मदर का शोषण होने की बात सामने रखी थी. उन्होंने कहा था कि यह बिल कमर्शियल सरोगेसी पर रोक लागाता है, लेकिन परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है. ऐसे में विदेशी कपल भारत आएंगे और सरोगेट मदर की कोख किराए पर लेकर बच्चा वापस ले जाएंगे. भारत में टेस्ट ट्यूब से जन्मे पहले बच्चे का नाम कनुप्रिया था जिसका जन्म 3 अक्टूबर 1978 को हुआ था. तबसे भारत में IVF (इन विटरो फर्टिलाइजेशन) और सरोगेसी का चलन है.

मनसुख मंडाविया के मुताबिक, अविवाहित महिलाएं आर्थिक तंगी के चलते अपनी कोख किराए पर देती हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए. आंध्र प्रदेश में 74 साल की बुजुर्ग महिला ने दो जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था. यह स्वास्थ्य और नैतिकता के लिहाज से गलत है. उन्होंने कहा कि पूरे देश में IVF सेंटर्स खुले हैं जो अनियमित ढंग से सरोगेसी को अंजाम दे रहे हैं.

कमर्शियल इंडस्ट्री को रोकने का प्रावधान
मंडाविया ने कहा था कि यह प्रोग्रेसिव बिल महिलाओं के शोषण पर रोक लगाएगा. इसे लेकर चयन समिति ने कुल 64 सिफारिशें दी थीं जिसका सरकार ने मूल्यांकन किया था और उनमें से कई बातों को सरोगेसी बिल में शामिल भी किया गया. उन्होंने कहा था कि इस बिल का उद्देश्य सरोगेट मदर को सपोर्ट करना और कमर्शियल इंडस्ट्री के रूप में इसे उभरने से रोकना है. इसलिए सरकार ने किसी महिला के लिए केवल एक बार सरोगेट मदर बनने का प्रावधान किया है.

सरोगेट मदर के शोषण की सजा
सरोगेट मदर के लिए सरकार ने 36 महीने का बीमा करना अनिवार्य समझा है. ताकि बच्चे को जन्म देने के बाद शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतों में सरोगेट मदर का ख्याल रखा जा सके. इसके अलावा शोषण को रोकने के लिए दंड भी निर्धारित किया गया है. सेरोगेट मदर के साथ पहली बार किसी अनैतिक व्यवहार के लिए 5-10 लाख का जुर्माना देना पड़ सकता है. ये गलती दोबारा करने पर 10-20 लाख का जुर्माना या आठ साल के लिए जेल भी हो सकती है.

सरोगेसी बिल पर क्या है विवाद?
भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित और पार्लियामेंट के दोनों सदनों द्वारा पारित सरोगेसी (रेगुलेशन) बिल, 2021 पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मंजूरी दे चुके हैं. हालांकि इससे समस्या हल होने की बजाए अधिक जटिल और विवादित हो गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून उन लोगों के लिए सरोगेसी की राह मुश्किल बनाता है जो वास्तव में बच्चों की चाह रखते हैं. इससे बच्चों को ख्वाहिश रखने वाले सिंगल पैरेंट, तलाकशुदा, अविवाहित या मैरिड कपल्स के सामने चुनौतियां बढ़ेंगी.

दूसरा, यह बिल कमर्शियल सरोगेसी पर रोक लागाता है, लेकिन परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है जिसमें सरोगेट मदर को किसी तरह का मुआवजा मिलना अनिवार्य नहीं है. प्रेग्नेंसी के दौरान मेडिकल में आने वाले खर्च से लेकर इंश्योरेंस कवरेज तक के लाभ से उन्हें वंचित रखा जा सकता है. सरकार को लगता है कि आसमान छूती महंगाई के बीच महिलाएं बिना मुआवजे के सरोगेसी के लिए तैयार हो जाएंगी. इसका कहीं जिक्र नहीं है कि बिना आर्थिक समझौते के सरोगेसी के लिए तैयार होने वाली महिलाएं आखिर कहां मिलेंगी.

 

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