भारत में अब कई लोग पालतू जानवरों को महज घर की रखवाली करने वाले जानवर के रूप में नहीं देखते बल्कि उनको परिवार के सदस्य की तरह देखा जाने लगा है. खासकर संपन्न, शहरी वर्ग और अकेलेपन से जूझने वाले लोग कुत्तों और बिल्लियों को अपने बच्चों की तरह पाल रहे हैं जिसकी वजह से 'फर बेबीज' (फर वाले बच्चे) जैसा शब्द भी पॉपुलर हो गया है. यह बदलाव केवल भावनात्मक नहीं है बल्कि इसने भारत में पेट केयर इंडस्ट्री में निवेश और खर्च के नए रास्ते खोल दिए हैं और एक विशाल पेट केयर इकोनॉमी को जन्म दिया है.
बाजार में पेट केयर इंडस्ट्री में बूम
अब लोग जानवरों को घर का बचा-कुचा खाना देने के बजाय उनके लिए ऑर्गेनिक और कस्टमाइज्ड डाइट प्लान खरीद रहे हैं. फर बेबीज के लिए डिजाइनर कपड़े, कस्टमाइज्ड एसेसरीज और लग्जरी बिस्तरों की मांग बढ़ रही है.
शादियों और त्योहारों के सीजन में पालतू जानवरों के लिए खास एथनिक वियर की मांग भी देखी जा रही है. इतना ही नहीं पेट्स के लिए स्पेशलाइज्ड हेयर कट, थेरेपी, मसाज और मैनीक्योर-पेडीक्योर जैसे ट्रीटमेंट सेंटर्स भी खुल रहे हैं.
43 साल की मुंबई की एंटरप्रेन्योर नेहा बापना 'बीबीसी' के साथ बातचीत में कहती हैं कि दुनिया में उनके कुत्ते मफिन से ज्यादा कुछ भी जरूरी नहीं है.
'जब भी वो ट्रेन से पूरे भारत में ट्रैवल करती हैं तो चार साल का शिहत्जू उनके साथ फर्स्ट क्लास में होता है. वो सिर्फ हाइपोएलर्जेनिक खाना खाता है जिसकी कीमत अक्सर नॉर्मल डॉग फूड और ट्रीट से दोगुनी होती है.'
वो आगे बताती हैं, 'मैंने यह पता लगाने के लिए कई रातों तक सोई नहीं कि उसे कौन सा खाना सूट करता है. वो मेरा बच्चा है. मैं नहीं चाहती कि उसे कोई तकलीफ हो.'
अपने पालतू जानवर को लाड़-प्यार करना पहले सिर्फ बहुत अमीर लोगों के लिए एक लग्जरी थी. लेकिन अब नेहा बापना जैसी अमीर और मिडिल क्लास शहरी भारतीय अपने फर बेबीज पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं जिससे भारत की पेट केयर इंडस्ट्री में तेजी आई है जिसकी वैल्यू हाल के सालों में लगभग दोगुनी हो गई है.
कोरोना के दौरान पेट की डिमांड बढ़ी
टेक्नोपैक रिटेल कंसल्टेंसी के सीनियर पार्टनर अंकुर बिसन के अनुसार, कोविड महामारी ने इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाई है.
वो कहते हैं, 'कोविड ने लोगों के घर पर रहने के दौरान किसी के साथ की जरूरत पैदा की. इसलिए आप देख सकते हैं कि युवा माएं, अपनी पहली नौकरी करने वाले लोग और जिन्होंने अपनी मर्जी से बच्चे न करने का फैसला किया. इन सभी लोगों ने पालतू जानवर पालना शुरू कर दिया.'
कंसल्टिंग फर्म रेडसीर की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय घरों में पालतू जानवरों की संख्या 2019 में 2.6 करोड़ से बढ़कर 2024 में 3.2 करोड़ हो गई है और जैसे-जैसे शादी में देरी, छोटे परिवार और बदलते सामाजिक नियम शहरी इलाकों में पारिवारिक संरचनाओं को नया आकार दे रहे हैं. इन पालतू जानवरों को जगह वहां तेजी से डिमांड बढ़ रही है और उन्हें वही देखभाल और ध्यान मिल रहा है जो आमतौर पर बच्चों को दिया जाता है.
Pets ने ली बच्चों की जगह
राजधानी दिल्ली में रहने वाले निखिल भूषण और लक्षणा गुलाटी कहते हैं कि अपने पालतू जानवरों को पालने से उन्हें बिना किसी मुश्किल के माता-पिता होने का अनुभव मिलता है.
इस कपल के कोई बायोलॉजिकल बच्चे नहीं हैं और वो अपने घर में दो रेसक्यू किए हुए पालतू जानवरों के साथ रहते हैं. एक कुत्ता जिसका नाम मोगली है और एक बिल्ली जिसका नाम मार्मलेड है.
मिस्टर भूषण कहते हैं, जब हमारी पांच साल पहले शादी हुई थी तो हम बच्चे पैदा करने के लिए तैयार नहीं थे. लेकिन पालतू जानवरों को बचाने के तुरंत बाद हमारा घर सच में एक घर बन गया. कुछ कमी थी जो अब पूरी हो गई है. वो हमें खुशी देते हैं और उन्हें हर दिन देखकर हमारी जिंदगी रोशन हो जाती है.
मिस गुलाटी कहती हैं, हमें उन्हें लाड़-प्यार करना पसंद है. जब भी हम कोई ऐसा खिलौना देखते हैं जो उन्हें पसंद आ सकता है तो हम उसे तुरंत खरीद लेते हैं. यह जानते हुए भी कि वो कुछ ही समय में खराब हो जाएगा.
5 सालों में 23 प्रतिशत ग्रोथ
रेडसीर की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारतीयों ने अपने पालतू जानवरों के लिए प्रोडक्ट्स और सर्विसेज पर 3.6 अरब डॉलर खर्च किए जो 2019 के 1.6 अरब डॉलर से काफी ज्यादा हैं.
यह तेजी से बढ़ोतरी पेट बोर्डिंग, इंश्योरेंस और स्पेशलाइज्ड वेटनरी केयर जैसे नए ट्रेंड्स की वजह से हुई है.
पेट केयर कंपनी जिगली के चीफ एग्जीक्यूटिव पंकज पोद्दार कहते हैं, '20 साल पहले पेट केयर सिर्फ वैक्सिनेशन और वेटनरी केयर जैसी बेसिक सर्विसेज तक ही सीमित था.अब लोग अपने पालतू जानवरों के लिए बेस्ट चाहते हैं. चाहें व कपड़े हों, एक्सेसरीज हों या यहां तक कि स्पेशलाइज्ड सर्विसेज हों. मैंने कई कपल को अपनी इनकम का 10 प्रतिशत तक अपने पालतू जानवरों पर खर्च करते देखा है. चाहें उन्हें स्पेशल पार्टियों में ले जाना हो या रेगुलर चेकअप करवाना हो.
पालतू जानवरों पर हजारों खर्च कर रहे लोग
उदाहरण के लिए मिस बापना एक महीने में मफिन पर 25,000 से 40,000 रुपये खर्च करती हैं. ज्यादातर उसके ट्रैवल और स्पेशल डाइट पर.वो हर कुछ हफ्तों में अपने कुत्ते को ट्रिप पर ले जाती हैं.चाहें वो पास के फार्महाउस में एक दिन का आउटिंग हो या किसी रिजॉर्ट में लंबा स्टे. वो हमेशा पेट-फ्रेंडली जगहों पर रुकती हैं. ऐसी जगहें रेगुलर होटलों से ज्यादा महंगी होती हैं.
जब भी वो अपने माता-पिता से मिलने जोधपुर ट्रेन से जाती हैं तो मिस बापना फर्स्ट-क्लास टिकट खरीदती हैं जो जनरल टिकट की कीमत से दोगुने से भी ज्यादा होती है क्योंकि भारत में कुत्तों और बिल्लियों को सिर्फ फर्स्ट क्लास कोच में ही जाने की इजाजत है. मिस बापना को बड़े बिलों से कोई दिक्कत नहीं है. जब मफिन पर खर्च करने की बात आती है तो वो कहती हैं, 'यह एक ऐसा एरिया है जहां मैं कोई समझौता नहीं करती'