
डोसा वैसे तो साउथ इंडियन डिश है लेकिन अब ये केवल साउथ तक ही सीमित नहीं रहा, यह पूरी दुनिया के ब्रेकफास्ट मेन्यू का हिस्सा बन चुका है. हालांकि हर जगह इसके बनाने का तरीका, इंग्रेडिएंट अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन एक परफेक्ट डोसा वही माना जाता है जो बाहर से क्रिस्पी हो और जिस पर जालीदार बारीक छेद नजर आएं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि डोसे के बैटर गाढ़ा होता है लेकिन जब डोला तवे पर सिक जाता है तो उसमें छेद क्यों बन जाते हैं यानी वो जालीदार क्यों हो जाता है. अगर नहीं जानते तो आइए आज हम आपको डोसा के इन छेदों का सीक्रेट बताते हैं.
डोसा चावल और धुली उड़द की दाल से बनता है. जब डोसा का घोल यानी बैटर तैयार करते हैं तो उसे रात भर या 8 से 10 घंटे के लिए छोड़ दिया जाता है. ऐसा करने से उसमें नेचुरल फर्मेंटेशन यानी खमीर उठने की प्रक्रिया शुरू होती है.
इस दौरान बैटर में मौजूद बैक्टीरिया और यीस्ट एक्टिव हो जाते हैं और ये सूक्ष्म जीव उस घोल में मौजूद स्टार्च और शुगर को लैक्टिक एसिड और कार्बन डाइऑक्साइड में बदल देते हैं. यही कार्बन डाइऑक्साइड गैस घोल के अंदर बारीक बुलबुलों के रूप में फंस जाते हैं.
इसके बाद जब आप खमीर उठे हुए उस बैटर को गर्म तवे पर फैलाते हैं तो गर्म तवे के संपर्क में आने से घोल के अंदर फंसी हुई कार्बन डाइऑक्साइड गैस बाहर निकलने की कोशिश करती है.
फिर जब यह गैस सतह को फाड़कर बाहर निकलती है तो उससे बारीक-बारीक छेद बन जाते हैं. यही कारण है कि डोसा जालीदार नजर आता है. अगर बैटर सही से फर्मेंट न हुआ हो तो गैस नहीं बनेगी और आपका डोसा एकदम प्लेन बनेगा.

डोसा में छेद बनने का एक और बड़ा कारण दाल और चावल का सही मिश्रण है. आमतौर पर एक तिहाई चावल में 1 चौथाई हिस्सा उड़द की दाल मिलाई जाती है.
उड़द की दाल में 'म्यूसिलेज' (Mucilage) नाम का एक कंपाउंड होता है जो बैटर को चिपचिपापन और मजबूती देता है. यही मजबूती कार्बन डाइऑक्साइड के बुलबुलों को तब तक पकड़ रखती है, जब तक वे तवे पर जाकर छेद न बन जाएं. यदि दाल कम होगी तो बैटर गैस को रोक नहीं पाएगा और डोसा कुरकुरा नहीं बनेगा.