
दीवाली हो या कोई बड़ा जश्न, चांदी के वर्क से सजी 'काजू कतली' के बिना अधूरा लगता है. आज यह मिठाई भले ही स्टेटस सिंबल बन गई हो लेकिन इसकी शुरुआत किसी आलीशान महल या मशहूर हलवाई की दुकान से नहीं हुई थी. हालांकि इसकी आविष्कार की कई कहानियां प्रचलित हैं लेकिन सबसे फेमस जो कहानी है, उसके मुताबिक काजू कतली की जड़ें मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल और ग्वालियर के किले की एक जेल से जुड़ी हैं. तो आइए इसके आविष्कार की कौन-कौन सी कहानियां बताई जाती हैं, इस बारे में जानते हैं.
काजू कतली की उत्पत्ति का इतिहास लगभग 400-410 साल पुराना है, जो मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल और ग्वालियर के किले से जुड़ा है. GNTTV की रिपोर्ट के मुताबिक, दरअसल, 1617 से 1619 के बीच जब सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहब और 52 हिंदू राजा इस किले में नजरबंद थे, तब गुरु ने वहां कैदियों की दयनीय स्थिति को सुधारने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी.
गुरु के इस सेवा भाव से प्रभावित होकर जब जहांगीर ने उन्हें और उनके साथ उन राजाओं को रिहा करने का आदेश दिया, तो इस ऐतिहासिक मुक्ति और सम्मान के प्रतीक के रूप में जहांगीर के शाही रसोइए ने पहली बार काजू को पीसकर एक खास मीठा व्यंजन तैयार किया, जिसे आज हम 'काजू कतली' के नाम से जानते हैं.

भारत में काजू की एंट्री ब्राजील से हुई थी. दरअसल, 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारी ब्राजील से काजू के पौधे गोवा लाए थे. शुरुआत में इसका इस्तेमाल सिर्फ मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए किया जाता था, लेकिन भारतीय रसोइयों ने इस विदेशी मेवे को अपनी मिठाई बनाने की कला में शामिल कर लिया.
द बेटर इंडिया के अनुसार, मराठा रसोइयों ने इस मेवे को पीसकर और चाशनी में पकाकर इसे एक ठोस रूप दिया जो बाद में 'काजू बर्फी' कहलाई.
काजू कतली को इसका खास डायमंड शेप और चांदी का वर्क मुगल दस्तरख्वान से मिला. कैडबरी डेजर्ट्स कॉर्नर की रिपोर्ट के अनुसार, शाही रसोइयों ने इसे और आकर्षक बनाने के लिए इसमें केसर और चांदी के वर्क का इस्तेमाल शुरू किया. कतली नाम भी इसके काटने के खास अंदाज की वजह से पड़ा. आज यह मिठाई पूरी दुनिया में खाई जाती है. यह मिठाई हमें याद दिलाती है कि कैसे पुर्तगालियों का मेवा, मराठा रसोइयों की कला और मुगल काल का इतिहास मिलकर हमारी थाली का हिस्सा बन गए.