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'ना 10 मिनट में सामान, ना रात को भूख लगते ही ऑर्डर, मेड तो भूल ही जाओ', विदेश में सेटल भारतीयों ने बताई वहां की मुश्किलें

भारत में ब्लिंकिट, स्विगी और सस्ती होम डिलीवरी ने लोगों की जिंदगी बेहद आसान बना दी है. वहीं कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए ज्यादा पैसे और मेहनत करनी पड़ती है. विदेश में रहने वाले भारतीयों ने बताया कि असली शॉक वहां कम सुविधाओं के बीच बिताई गई जिंदगी है.

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भारत में आप देर रात आसानी से कुछ भी ऑर्डर कर सकते हैं. (Photo: AI Generated)
भारत में आप देर रात आसानी से कुछ भी ऑर्डर कर सकते हैं. (Photo: AI Generated)

इस सब की शुरुआत एक X (ट्विटर) पोस्ट से हुई. एक ऐसी पोस्ट जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम कितनी आसानी से कह देते हैं कि 'भारत में जिंदगी बहुत मुश्किल है, हमें विदेश चले जाना चाहिए.' पोस्ट में प्याज का एक बैग, चिप्स का पैकेट, कोल्ड ड्रिंक और बिस्कुट की फोटो थी और कैप्शन लिखा था 'भारत में सिर्फ 1 डॉलर में होम डिलीवरी के साथ इतना सामान मिल जाता है.'

न कोई प्लानिंग, न मेहनत, न बाहर निकलने की जरूरत. बस एक ऐप पर कुछ क्लिक्स और सामान आपके घर पर. आज भारत के शहरों में, खासकर टियर-1 और टियर-2 शहरों में, इस तरह ऐप्स से घर पर सामान मंगाना कोई बड़ी बात नहीं रह गई है. ये अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.

यही वजह है कि लोगों का 'विदेश में जिंदगी आसान होती है' वाला ये विचार थोड़ा कमजोर पड़ जाता है, जब आप इस इंस्टेंट फैसिलिटी वाली दुनिया से बाहर निकलते हैं. जहां आधी रात को ब्लिंकिट मिल जाता है, रात 3 बजे स्विगी से खाना आ जाता है और जरूरत पड़ने पर घंटेभर में घर का हेल्पर भी मिल जाता है. अगर आप कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, हॉन्ग कॉन्ग और साउथ अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों से बात करेंगे, तो जल्दी समझ आ जाएगा कि विदेश में जिंदगी भले ज्यादा इंडिपेंडेंट हो, लेकिन वहां हर काम के लिए बहुत ज्यादा मेहनत और बहुत ज्यादा पैसे लगते हैं.

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कीमत चुकाने पर मिलती है सुविधा

कनाडा के हैलिफैक्स में रहने वाले छात्र गेविन शर्मा बताते हैं कि वहां डिलीवरी सर्विस तो है, लेकिन उसे ऐसा चीज के तौर पर नहीं देखा जा सकता जिसे आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना सकें या फिर उसे आसान समझें. 

उबर इट्स और इंस्टाकार्ट जैसे वहां ऐप्स काफी नॉर्मल हैं, लेकिन वहां पर टिप देना जरूरी माना जाता है. कई बार अच्छी टिप न दो, तो कोई ऑर्डर उठाता ही नहीं है. ऊपर से वहां कम से कम मजदूरी करीब 16.75 कैनेडियन डॉलर (लगभग 1,115 रुपये) प्रति घंटा है और रहने लायक कमाई करीब 29 कैनेडियन डॉलर (करीब 2,021 रुपये) प्रति घंटा मानी जाती है. ऐसे में अगर आप सुविधा लेना चाहते हैं, तो उसके लिए बहुत सोचना-समझना जरूरी बन जाता है. घर की सफाई करवाना तो और भी महंगा है.

वो बताते हैं, 'एक दोस्त जब वो घर खाली कर रहा था, तब उसने सिर्फ एक कमरा साफ करवाने के लिए करीब 100 कैनेडियन डॉलर से 150 कैनेडियन डॉलर (करीब 6,972 रुपये से 10,458 रुपये) खर्चा किया था.'

साउथ अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में रिसर्चर तमोग्नी दास ने भी अपना कुछ ऐसा ही एक्सपीरियंस शेयर किया. वहां चेकर्स सिक्स्टी60 (Checkers Sixty60) जैसे ऐप्स से किराना के सामानों की डिलीवरी अच्छी तरह की जाती है, लेकिन इसका खर्चा बहुत ज्यादा है. अगर वो इसकी मदद से घर का सामना मंगाते हैं तो उनका खर्चा तेजी से बढ़ता है.

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वे कहते हैं, 'हर ऑर्डर पर करीब R35–R36 (करीब 210 रुपये) सिर्फ डिलीवरी चार्ज लगता है, उसके अलावा टिप भी देनी पड़ती है.' अगर बार-बार छोटे ऑर्डर करें, तो खर्च काफी ज्यादा हो जाता है.

हालांकि, हॉन्ग कॉन्ग में परेशानी कुछ और है. आईटी प्रोफेशनल हर्षिता माथुर कहती हैं, 'वहां डिलीवरी के लिए ऑर्डर कम से कम करीब $500–$600 (करीब 6,125 रुपये–7,350 रुपये) का होता है. अगर सिर्फ दो-चार चीजें चाहिए हों, तो डिलीवरी करवाने का मतलब ही नहीं बनता.' इसके मुकाबले भारत में 100 रुपये–200 रुपये का न्यूनतम ऑर्डर किसी दूसरी दुनिया जैसा लगता है.

आसान जिंदगी की चुकानी पड़ती है कीमत

अमेरिका में ये फर्क और ज्यादा साफ दिखता है. मिशिगन में रहने वाली गृहिणी रीमा मोइत्रा बताती हैं कि वहां मजदूरी का खर्च किसी की भी सोच बदल देता है. घर की सफाई करवाने के लिए किसी क्लीनर को बुलाओ, तो वो $15–$20 (करीब 1,439 रुपये–1,919 रुपये) प्रति घंटा लेता है और अक्सर कई घंटों का कम से कम समय भी पहले ही तय किया जाता है. वो कहती हैं, 'ऐसा लगता है जैसे आप किसी को अपनी ही सैलरी दे रहे हों.' न केवल सफाई कराने में पैसे खर्च करने होते हैं, बल्कि फूड डिलीवरी भी उतनी आसान नहीं होती, जितनी दिखती है.

वो बताती हैं, '$10 की डॉमिनोज पिज्जा डिलीवरी चार्ज और टिप के बाद $17 या $18 (करीब 1,727 रुपये) की पड़ती है. इसलिए ज्यादातर लोग खुद जाकर ले आते हैं.' यहां 'खुद जाकर' वाली बात बहुत मायने रखती है. क्योंकि विदेश में लगभग हर काम, चाहे वो खाना बनाना हो, सफाई करना हो, कपड़े धोना हो, ग्रॉसरी खरीदना, बच्चों की देखभाल तक सब कुछ खुद ही करना पड़ता है.

10 मिनट में सब मिलने वाली सोच हो जाती है खत्म 

भारत के लोग विदेश में जिस चीज को असुविधा समझते हैं, वहां वो नॉर्मल जिंदगी का हिस्सा माना जाता है. लंदन में घर के सामनों को डोरस्टेप पर डिलीवर जरूर किया जाता है, लेकिन वहां सब कुछ तय समय पर होता है, तुरंत नहीं. लोग हफ्तेभर का सामान एक साथ खरीदते हैं, आखिरी समय में छोटी-छोटी चीजें मंगवाने का कल्चर वहां कम है.

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कंसल्टेंट श्रेयाशी सरकार और राणा साहा बताते हैं, 'आप पूरे हफ्ते का सामान खरीदते हैं, खुद उठाकर लाते हैं और स्टोर करते हैं. वहां दुकानें भी भारत की तुलना में जल्दी बंद हो जाती हैं.' हॉन्ग कॉन्ग में सुविधाएं पास-पास जरूर हैं, लेकिन तुरंत वाला कल्चर वहां भी नहीं है.

हॉन्ग कॉन्ग में रहने वाली हर्षिता माथुर कहती हैं, 'हर जगह 2–5 मिनट की दूरी पर किराना स्टोर मिल जाता है. लेकिन भारत जैसी डोरस्टेप डिलीवरी वहां आम नहीं है.' इसके उलट भारत में धीरे-धीरे ऐसी संस्कृति बन गई है, जहां लोग अपनी जल्दबाजी तक को आउटसोर्स कर चुके हैं.

रिटर्न करना भी है मेहनत वाला काम

सबसे बड़ा फर्क किसी भी सामान को रिटर्न करने में दिखता है. भारत में अक्सर कोई आपके घर से सामान लेने आ जाता है, लेकिन विदेश में आपको खुद बाहर जाना पड़ता है.

कनाडा और अमेरिका में अमेजन रिटर्न आमतौर पर यूपीएस स्टोर, पोस्ट ऑफिस या सुपरमार्केट के अंदर बने काउंटर पर जाकर करना पड़ता है. सिस्टम अच्छा और सिस्टमैटिक है, लेकिन उसमें समय लगता है, घर से निकलकर बाहर जाना पड़ता है और प्लानिंग लगती है.

हॉन्ग कॉन्ग में तो घर से रिटर्न की सुविधा लगभग न के बराबर है. हर्षिता कहती हैं, 'आपको खुद नजदीकी पोस्ट ऑफिस या पिकअप पॉइंट तक जाना पड़ता है.' ये मुश्किल नहीं है, लेकिन आसान भी नहीं है.

आजादी ज्यादा, लेकिन सहारा कम

लगभग हर देश में रहने वाले भारतीय एक जैसी बात कहते हैं. विदेश में जिंदगी ज्यादा इंडिपेंडेंट है, लेकिन सुविधाजनक कम है. गेविन शर्मा कहते हैं, 'आप अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीते हैं, लेकिन हर जिम्मेदारी आपको खुद ही निभानी होती है.'

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इसमें वो चीजें भी शामिल हैं, जिनके बारे में भारत के शहरों में लोग ज्यादा सोचते तक नहीं हैं, जैसे कचरा अलग-अलग करके फेंकना, फर्नीचर खुद एसेंबल करना, बर्फीले मौसम में खुद कार साफ करना या किनारा का सामान लेने के लिए मीलों ड्राइव करना. इसके साथ ही सामाजिक व्यवहार भी बदल जाता है.

रीमा मोइत्रा कहती हैं, 'भारत में मेहमान सफाई नहीं करते. यहां हर कोई मदद करता है, क्योंकि सभी जानते हैं कि सारे काम खुद करने पड़ते हैं.'

भारत में सुविधा की असली ताकत

ये कोई भारत बनाम विदेश वाला मामला नहीं है. और सच कहें तो ऐसा हो भी नहीं सकता. हर देश में मजदूरी अलग है, आबादी अलग है और वर्क-लाइफ बैलेंस, काम करने के घंटे जैसी चीजें भी अलग हैं.

लंदन में शानदार पब्लिक ट्रांसपोर्ट है, हॉन्ग कॉन्ग में पैदल चलना आसान है और पश्चिमी देशों में काम करने वालों की मर्यादा को जिस तरह महत्व दिया जाता है, वो भारत में नहीं है. भारत अभी भी उस दिशा में संघर्ष कर रहा है. लेकिन रोजमर्रा की सुविधाओं की बात करें, तो भारत शायद बिना किसी शोरशराबे के काफी आगे निकल चुका है.

सस्ता इंटरनेट, घनी आबादी वाले शहर, बड़ा सर्विस सेक्टर और जबरदस्त कॉम्पिटिशन वाले ऐप्स ने मिलकर भारत में एक ऐसी लाइफस्टाइल बना दी है, जहां समय, मेहनत और छोटी-छोटी परेशानियां भी आसानी से आउटसोर्स की जा सकती हैं. इसलिए 100 रुपये की डिलीवरी सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि उस सुविधा की कीमत है जिसमें आपको खुद ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती.

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भारतीय के लिए असली शॉक क्या है?

कई भारतीयों के लिए विदेश जाकर सबसे बड़ा बदलाव संस्कृति से जुड़ा नहीं होता है. बल्कि रोजाना जीने के तौर-तरीकों में आए बदलाव होते हैं. भारत में वे लोग जिस तरह जीते हैं, विदेश में रहने का तरीका उससे बिल्कुल अलग है. 

अपने कनाडा या ब्रिटेन वाले रिश्तेदारों से पूछकर देखिए. उन्हें सबसे ज्यादा यही महसूस होता है कि रात में भूख लगे, तो खुद बाहर जाना पड़ता है. किराना का सामान पहले से प्लान करना पड़ता है. काम कराने के लिए अगर किसी हेल्पर को बुलाना पड़े तो वो महंगा होता है. और सुविधा की भी एक कीमत होती है. कभी-कभी विदेश में बसे भारतीयों को सिर्फ उस सुविधा की याद आती है कि रात 3 बजे भी आराम से समोसा ऑर्डर किया जा सकता है.

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