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Dum biryani origin: पेट भरने की मजबूरी में हुआ था 'दम बिरयानी' का आविष्कार, ऐसा है 242 साल पुराना लखनवी इतिहास

1784 के अकाल के दौरान नवाब आसफ-उद-दौला के काल में लखनऊ में दम बिरयानी का जन्म हुआ था. इस विधि से बिरयानी बनाने के तरीके को कैसे इजाद किया गया, उसमें कैसे-कैसे बदलाव हुए, इस बारे में जानेंगे.

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बिरयानी को काफी चाव से खाया जाता है. (Photo: ITG)
बिरयानी को काफी चाव से खाया जाता है. (Photo: ITG)

Dum biryani origin: बिरयानी का नाम जुबान पर आते ही उसकी खुशबू और जायके से मन खुश हो जाता है. भारत में बिरयानी सिर्फ लोकप्रिय डिश नहीं बल्कि सबसे ज्यादा खाई और ऑर्डर की जाने वाली डिश है. ऑनलाइन फूड डिलिवरी प्लेटफॉर्म के आधार पर 18-19 करोड़ बिरयानी प्लेट हर साल ऑनलाइन ऑर्डर होती हैं. वहीं इस आंकड़े में रेस्टोरेंट में खाई जाने वाली और घर में बनाई गई बिरयानी शामिल नहीं है इसलिए बिरयानी की वास्तविक खपत इससे कहीं अधिक है.

देश-विदेश में फेमस बिरयानी की कई किस्में मौजूद हैं जो अलग-अलग कीमत और खासियतों के साथ सर्व की जाती है लेकिन क्या आप जानते हैं शाही दावतों की शान और दुनिया भर में मशहूर 'दम बिरयानी' का जन्म किसी शाही किचन में नहीं बल्कि अकाल के दौरान मजदूरों का पेट भरने के लिए हुआ था. मिट्टी की हांडी में बंद भाप से बनी 'दम बिरयानी' को आज लोग बड़े चाव से खाते हैं. तो आइए दम बिरयानी का इतिहास क्या है, इस बारे में विस्तार से जानते हैं.

अकाल और बड़े इमामबाड़े से हुई शुरुआत

जानकारी के मुताबिक, 1784 में लखनऊ (अवध) में भयंकर अकाल पड़ा था जिससे रईस लोगों से लेकर आम जनता तक को खाने की दिक्कत आने लगी थी. ऐसे में तत्कालीन नवाब आसफ-उद-दौला अपनी प्रजा की मदद तो करना चाहते थे लेकिन उन्हें फ्री में खाना या खैरात देकर उनके आत्म सम्मान को भी ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे. ऐसे में उन्होंने लखनऊ में 'बड़े इमामबाड़े' का निर्माण कराना शुरू किया ताकि उनकी प्रजा काम भी करे और उसके बदल में उसे अनाज भी मिले. बताया जाता है कि उस समय कई रईस लोग भी रात में अपनी पहचान छिपाकर काम करते थे ताकि उन्हें अनाज मिल सके. 

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मिट्टी की हांडी और 'दम' का आविष्कार

द हिंदू के मुताबिक, इमामबाड़ा के निर्माण कार्य के दौरान हजारों लोगों के लिए एक साथ खाना पकाने की चुनौती सामने आई. ऐसे में खाना बनाने के लिए बड़े-बड़े बर्तनों की जरूरत थी. ऐसे में समय और संसाधनों की कमी को देखते हुए रसोइए मांस, चावल, सब्जियां और कुछ मसाले बड़े मिट्टी के बर्तनों (हांडी) में भरकर उन्हें आटे की लोई से सील कर देते थे. इन बर्तनों को धीमी आंच पर रख दिया जाता था ताकि वो पक सके. 

भोजन पकाने की इस विधि को 'दम देना' कहा गया जिससे भाप अंदर ही रहती थी और खाना धीरे-धीरे अपने ही रस में पकता था. इस तकनीक से कम मसालों में भी काफी स्वादिष्ट खाना तैयार होता था जो उस समय की 'दम बिरयानी' थी.

शेफ रणवीर बरार का भी कहना है कि बिरयानी का यह सफर मजबूरी और समझदारी का अनोखा कॉम्बिनेशन था जो लखनऊ में इजाद हुआ था. लखनऊ के इमामबाड़े के निर्माण के समय 'दम' तकनीक का इस्तेमाल इसलिए भी किया गया था ताकि मजदूरों को दिन भर के कठिन परिश्रम के बाद गर्म और ताजा खाना मिल सके. 

खुशबू ने खींचा नवाब का ध्यान

नवाब आसफ-उद-दौला एक दिन इमामबाड़े के निर्माण को देखने के लिए पहुंचे तो उन्हें मिट्टी के बर्तनों से आ रही सोंधी और बेहद लाजवाब खुशबू काफी पसंद आई. जब उन्होंने उस हांडी के बने खाने को खाया और जैसे ही चावल और मांस का निवाला मुंह में रखा तो उन्हें यह सादगी वाला खाना इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने शाही बावर्चीखाने के बावर्चियों को इस विधि को अपनाने और इसमें और सुधार करने का आदेश दिया. यहीं से वह 'मजदूरों का खाना' शाही किचन की शान बना.

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सादगी से शाही सफर तक

जब नवाब की रसोई में दम बिरयानी पहुंची तो उसमें केसर, खुशबूदार इत्र और खास मसालों को भी जोड़ा गया जिससे उसे और भी शाही रूप मिला और इसे ही आज के समय में 'लखनवी दम बिरयानी' के रूप में जानते हैं. बिरयानी का यह सफर इस बात का गवाह है कि कैसे एक मजबूरी ने दुनिया को सबसे बेहतरीन व्यंजनों में से एक तोहफा दिया. 

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